गुरुवार, 16 अप्रैल 2026
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शतायु चिरायु: मंच पर इतिहास की परतें, विचारों की विरासत और समय का संवाद

Shatayu Chirayu
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संघ की यात्रा को नए-नए माध्यमों से सामने लाने की कोशिशें तेज हुई हैं। हाल ही में आई फिल्म ‘शतक’ के बाद अब रंगमंच ने भी इस सिलसिले को आगे बढ़ाया है। ‘शतायु चिरायु’ नाट्य प्रस्तुति इसी सिलसिले को आगे बढ़ाती है, जिसे इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के सहयोग से मंचित किया गया। यह केवल एक नाटक नहीं, बल्कि विचार, इतिहास और संवाद का संगम है, जो संघ से जुड़े बहुचर्चित प्रश्नों के जवाब के तौर पर मंच पर जीवंत करने का प्रयास करता है।
 
डॉ. सोनाली नरगुंदे द्वारा लिखित इस सवा घंटे की प्रस्तुति में संघ से जुड़े उन प्रश्नों को केंद्र में रखा गया है, जो अक्सर जनचर्चा का हिस्सा रहते हैं। संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि, उसकी कार्यप्रणाली, आर्थिक व्यवस्था और उससे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की गई है। 
 
महात्मा गांधी की संघ पर राय, सुभाष चंद्र बोस की हेडगेवार से मिलने की इच्छा, महिलाओं की भागीदारी और माधव गोलवलकर के नेतृत्व तक की यात्रा को नाटक में सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत किया गया है। खास बात यह है कि पूरी कथा को भगवा ध्वज के प्रतीक के जरिए आगे बढ़ाया गया, जो नाटक की वैचारिक धुरी बनकर उभरता है।
 
करीब 35 कलाकारों की टीम ने इस ‘महानाट्य’ को जीवंत बनाने में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी है। केशव हेडगेवार का किरदार निभाने वाले कलाकार ने अपने प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों का ध्यान खींचा। लुक और कॉस्ट्यूम पर की गई मेहनत साफ दिखाई देती है, जिसमें मेकअप टीम का योगदान उल्लेखनीय रहा। हालांकि, माधव गोलवलकर के चरित्र में उम्र के बदलाव के बावजूद दाढ़ी का रंग स्थिर रहना एक छोटी लेकिन ध्यान खींचने वाली चूक के रूप में सामने आता है।
 
तकनीकी स्तर पर यह प्रस्तुति प्रभावशाली बनती है। मंच के पीछे लगे एलईडी स्क्रीन ने विजुअल अपील को नया आयाम दिया, जहां एआई-जनित वीडियो और इमेज के माध्यम से बीते समय को पुनर्जीवित करने की कोशिश की गई। हालांकि, इन तकनीकी प्रयोगों में कुछ असंगतियां भी दिखीं। उदाहरण के तौर पर 'आलमआरा' फिल्म दिखा रहे सिनेमाघर के क्लोजअप में आसपास कोई मकान नजर नहीं आता, लेकिन लांग शॉट में आसपास कई घर नजर आते हैं। माधव गोलवलकर जब बीमार होते हैं और उन्हें कमरे से बाहर जाने की इजाजत नहीं मिलती तो कमरे में लगा कैलेंडर सन 1942 दिखाता है जबकि यह बात काफी बाद की है। 
 
निर्देशक सुनील गणेश मतकर और सतीश मुंगरे ने कलाकारों से गहन अभ्यास करवाया है, जिसका असर मंच पर उनकी सहजता में दिखता है। प्रस्तुति के दौरान कहीं भी हड़बड़ाहट नजर नहीं आती और घटनाएं क्रमबद्ध तरीके से आगे बढ़ती हैं। हालांकि, प्री-रिकॉर्डेड डायलॉग्स के साथ अभिनय करने के कारण कुछ जगहों पर टाइमिंग का अंतर महसूस होता है, जहां कलाकार डायलॉग का इंतजार करते या उसके साथ तालमेल बैठाते दिखते हैं। लेकिन ये कमी जितने ज्यादा नाटक के मंचन होंगे दुरुस्त होती जाएगी। संवाद उम्दा है। गीत-संगीत प्रभाव को गहरा करता है। 
 
नाटक का अंतिम हिस्सा थोड़ा और कसाव मांगता है, जहां गति और प्रभाव दोनों को और सशक्त किया जा सकता था। इसके बावजूद, ‘शतायु चिरायु’ अपने मूल उद्देश्य, संघ की विचारधारा और इतिहास को संवाद के रूप में प्रस्तुत करने, में सफल नजर आता है। यह प्रस्तुति दर्शकों को बांधने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करती है, जो किसी भी रंगमंचीय कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
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WD Entertainment Desk
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