राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर बनी फिल्म शतक: संघ के 100 वर्ष अपने शीर्षक से ही यह स्पष्ट कर देती है कि यह एक विचारधारा-आधारित सिनेमा है। नाम सुनते ही दर्शक लगभग तय कर लेते हैं कि उन्हें यह फिल्म देखनी है या नहीं। क्योंकि यह सिर्फ एक संगठन की कहानी नहीं, बल्कि एक वैचारिक यात्रा है, जिससे कुछ लोग गहराई से सहमत हैं तो कुछ उतनी ही तीव्र असहमति रखते हैं। यही वजह है कि फिल्म रिलीज से पहले ही चर्चा और बहस के घेरे में आ जाती है।
फिल्म का मूल उद्देश्य स्पष्ट दिखाई देता है, नई पीढ़ी को संघ के इतिहास से परिचित कराना, पुराने स्वयंसेवकों और समर्थकों को गौरव का अनुभव कराना और संघ से जुड़े विवादों या भ्रमों पर अपना पक्ष रखना। लेकिन इतने बड़े और जटिल इतिहास को सीमित समय में समेटने की कोशिश में फिल्म कई जगह जल्दबाजी का शिकार हो जाती है।
संघ के सौ वर्षों की यात्रा को परदे पर उतारना आसान काम नहीं है। फिल्म के अंत में दूसरे भाग का संकेत भी दिया गया है, लेकिन इसके बावजूद कहानी इतनी तेज गति से आगे बढ़ती है कि कई बार दर्शक घटनाओं को ठीक से आत्मसात नहीं कर पाते। निर्देशक आशीष मल्ल ने घटनाओं की श्रृंखला को बहुत तेजी से जोड़ा है, मानो वे यह मानकर चल रहे हों कि दर्शकों को संघ के इतिहास की पहले से गहरी जानकारी है।
फिल्म का भावनात्मक और वैचारिक केंद्र दो व्यक्तित्व हैं, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर। हेडगेवार के जीवन को विस्तार से दिखाया गया है। उनके बचपन, युवावस्था, कांग्रेस में सक्रियता और फिर अलग संगठन खड़ा करने की आवश्यकता, इन सभी पहलुओं पर अपेक्षाकृत अधिक रोशनी डाली गई है।
फिल्म यह समझाने की कोशिश करती है कि हेडगेवार ने आरएसएस को सीधे राजनीतिक दल बनने से क्यों दूर रखा और किस तरह उन्होंने शाखाओं के माध्यम से लोगों को जोड़ा। यह हिस्सा फिल्म का सबसे सशक्त भाग बन सकता था, यदि इसे थोड़ी और गहराई और ठहराव के साथ प्रस्तुत किया जाता।
इसके विपरीत, गोलवलकर का चरित्र उतनी मजबूती से उभर नहीं पाता। उनका प्रभाव और वैचारिक योगदान फिल्म में मौजूद तो है, लेकिन वह प्रभावशाली छाप नहीं छोड़ता जो इतिहास में उनके स्थान को देखते हुए अपेक्षित था।
फिल्म में आजादी के दौर में संघ की भूमिका, विभाजन के समय स्वयंसेवकों द्वारा राहत कार्य, कश्मीर संकट के दौरान सहयोग, युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मदद जैसे प्रसंगों को प्रमुखता से दिखाया गया है। इन घटनाओं के माध्यम से फिल्म यह स्थापित करने की कोशिश करती है कि संगठन ने समय-समय पर राष्ट्रहित में कार्य किया।
साथ ही महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं द्वारा संघ के प्रति सकारात्मक टिप्पणियों का भी उल्लेख किया गया है। इससे फिल्म एक सकारात्मक नैरेटिव गढ़ती है कि संगठन का मूल भाव राष्ट्र प्रथम है।
हालांकि, संघ पर लगे प्रतिबंधों, महात्मा गांधी की हत्या के बाद के विवादों और आलोचनाओं जैसे संवेदनशील विषयों को बहुत हल्के ढंग से छुआ गया है। इन पहलुओं पर संतुलित और गहराईपूर्ण चर्चा होती तो फिल्म अधिक विश्वसनीय और परिपक्व प्रतीत होती।
फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष उसका तकनीकी और विजुअल ट्रीटमेंट लगता है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विजुअल्स और डिजिटल बैकग्राउंड का व्यापक उपयोग किया गया है। कई दृश्यों में पात्रों के पीछे के सेट इतने कृत्रिम प्रतीत होते हैं कि वे कहानी से ध्यान भटका देते हैं।
लगातार आउट ऑफ फोकस बैकग्राउंड, अत्यधिक चटक रंग और अत्यधिक स्मूद टेक्सचर फिल्म को सिनेमाई यथार्थ से दूर ले जाते हैं। कई बार तो किरदारों की प्रस्तुति भी ऐसी लगती है जैसे वे एआई से जनरेट किए गए हों उनके चेहरे पर भाव हैं, लेकिन उनमें वो इम्परफेक्शन नहीं दिखती जो वास्तविकता का एहसास कराती है।
यही कारण है कि फिल्म में ह्यूमन टच और भावनात्मक गहराई की कमी महसूस होती है। दर्शक इतिहास देख तो रहे होते हैं, लेकिन उसे महसूस नहीं कर पाते। अगर वास्तविक लोकेशंस, कम डिजिटल हस्तक्षेप और अधिक नैसर्गिक प्रकाश का उपयोग किया जाता तो यह कहानी कहीं अधिक प्रभावशाली बन सकती थी।
शतक: संघ के 100 वर्ष एक महत्वाकांक्षी प्रयास है, जो एक शताब्दी की वैचारिक यात्रा को परदे पर उतारने की कोशिश करता है। फिल्म अपने उद्देश्य में स्पष्ट है, लेकिन प्रस्तुति में जल्दबाजी और तकनीकी प्रयोगों की अधिकता इसकी प्रभावशीलता को सीमित कर देती है।
बेहतर निर्देशन और अधिक मानवीय संवेदना के साथ यह फिल्म कहीं अधिक सशक्त दस्तावेज बन सकती थी। फिलहाल यह एक विचारधारा-समर्थित सिनेमाई प्रस्तुति ज्यादा लगती है, गहरे मानवीय अनुभव वाली फिल्म कम।