फुकरे के दो कलाकार पुलकित सम्राट और वरुण शर्मा को साथ लेकर फिल्म 'राहु केतु' बनाई गई है। राहु केतु बड़े दिलचस्प आइडिया के साथ शुरू होती है, लेकिन अंत तक आते-आते वही आइडिया इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। फिल्म फैंटेसी, कॉमेडी और सोशल मैसेज का कॉकटेल बनने की कोशिश करती है, लेकिन सही संतुलन न बनने के कारण यह दर्शकों को पूरी तरह बांध नहीं पाती।
फिल्म की कहानी लेखक चुरू लाल शर्मा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक ऐसी किताब लिखता है जिसमें लिखा हर शब्द सच हो जाता है और बदला नहीं जा सकता। इसी किताब से जन्म लेते हैं राहु और केतु, जिनका मकसद है समाज से भ्रष्टाचार और बुराइयों का सफाया करना।
कहानी तब मोड़ लेती है जब यह किताब मीनू टैक्सी के हाथ लग जाती है। मीनू अपने फायदे के लिए कहानी को मोड़ देती है, जिससे हालात बेकाबू हो जाते हैं। यहां से फिल्म ड्रामा, कॉमेडी और क्राइम के रास्ते पर चल पड़ती है, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि दर्शक यह समझ ही नहीं पाता कि किरदार क्या करना चाहते हैं और क्यों।
फिल्म की पटकथा बिखरी हुई लगती है। कई सीन ऐसे हैं जो बिना किसी ठोस वजह के आगे बढ़ते हैं। राहु और केतु जैसे काल्पनिक किरदार असल दुनिया में कैसे आते हैं, इसका कोई स्पष्ट जवाब फिल्म नहीं देती। कई जगह दर्शक कंफ्यूज रहते हैं कि ये क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, यही कारण है कि दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाता।
कॉमेडी का दावा करने वाली फिल्म में हास्य ज्यादातर मौकों पर सपाट रह जाता है। हंसाने के बजाय कई दृश्य उबाऊ लगते हैं। पहला हाफ बेहद सुस्त है, जिससे फिल्म का असर शुरुआत में ही कमजोर पड़ जाता है। इंटरवल के बाद कहानी थोड़ी रफ्तार पकड़ती है, लेकिन जल्द ही फिर भटक जाती है।
वरुण शर्मा को राहु के रूप में अपेक्षाकृत मजबूत रोल मिला है और वह ईमानदारी से निभाते हैं। पुलकित सम्राट केतु के किरदार में अच्छे लगते हैं, लेकिन उनके हिस्से करने को ज्यादा कुछ नहीं है।
शालिनी पांडे मीनू टैक्सी के रूप में आत्मविश्वास से भरी नजर आती हैं, लेकिन उनका किरदार भी स्पष्ट तरह से लिखा नहीं गया।
पियूष मिश्रा हमेशा की तरह प्रभावशाली हैं और अमित सियाल पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में सबसे ज्यादा याद रहते हैं। चंकी पांडे का किरदार अधूरा रह जाता है, जिससे वह असर नहीं छोड़ पाते।
फिल्म का संगीत ठीक-ठाक है, लेकिन कोई भी गाना हिट बनने की क्षमता नहीं रखता। बैकग्राउंड स्कोर साधारण है। सिनेमैटोग्राफी अच्छी है और एडिटिंग भी तेज है, जो फिल्म को जरूरत से ज्यादा लंबा महसूस नहीं होने देती। एक्शन और प्रोडक्शन डिजाइन भी औसत स्तर पर हैं।
निर्देशक विपुल विग फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी साबित होते हैं। कहानी को रोचक ढंग से पेश करने और दर्शकों को जोड़े रखने में उनका निर्देशन असफल रहता है। न तो हास्य प्रभाव छोड़ता है और न ही फिल्म का संदेश स्पष्ट हो पाता है।
राहु केतु एक ऐसी फिल्म है जो अच्छे विचार के बावजूद कमजोर लेखन और ढीले निर्देशन के कारण दर्शकों को प्रभावित नहीं कर पाती। कुछ कलाकारों का अभिनय और तकनीकी पक्ष ठीक है, लेकिन कुल मिलाकर यह फिल्म मनोरंजन की कसौटी पर खरी नहीं उतरती और आसानी से नजरअंदाज की जा सकती है।
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RAHU KETU (2026)
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निर्देशक : विपुल विग
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गीत : अभिनव शेखर, तर्ष श्रीवास्तव, अमितोष नागपार, भृगु पाराशर, मट्टू ब्रदर्स, रोनाल्ड जॉन
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संगीत : विक्रम मॉट्रोज़, तर्ष श्रीवास्तव, अभिजीत वाघानी, मट्टू ब्रदर्स, अभिनव शेखर, दिलीप सुतार
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कलाकार : पुलकित सम्राट, वरुण शर्मा, शालिनी पांडे, पियूष मिश्रा, चंकी पांडे, मनु ऋषि, अमित सियाल
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सेंसर सर्टिफिकेट : UA16+ * 2 घंटे 20 मिनट
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रेटिंग : 1.5/5