आमिर खान का नाम आमतौर पर समझदार सिनेमा और क्वालिटी कंटेंट की गारंटी माना जाता है। लेकिन अगर सिर्फ आमिर खान का नाम देखकर आप हैप्पी पटेल: खतरनाक जासूस देखने का मन बना रहे हैं, तो एक पल ठहर जाइए। इस बार आमिर से बड़ी चूक हो गई है। वीर दास ने फिल्म के नाम पर कुछ ऐसा बना दिया है, जिसे देखकर यही लगता है कि शायद स्क्रिप्ट सुनते वक्त आमिर को देल्ही बेली वाली फील आ गई होगी, लेकिन स्क्रीन पर मामला पूरी तरह उल्टा निकलता है।
वीर दास एक शानदार स्टैंडअप कॉमेडियन हैं और एक अच्छे अभिनेता भी। लेकिन बतौर लेखक और निर्देशक हैप्पी पटेल उनकी कमजोर कोशिशों में गिनी जाएगी। फिल्म का लेखन और निर्देशन खुद वीर दास ने किया है, जिसमें उनका साथ दिया है कवि शास्त्री ने निर्देशन में और अमोघ रणदीवे ने लेखन में। समस्या यह नहीं है कि आइडिया खराब है, बल्कि दिक्कत यह है कि उस आइडिया को स्क्रीन पर मजेदार बनाने की कोशिश ही अधूरी रह गई है।
फिल्म की कहानी पुरानी मसाला फिल्मों की याद दिलाती है। एक भारतीय बच्चा, जिसकी मां गैंगवॉर में मारी जाती है। दो अंग्रेज एजेंट उसे लंदन ले जाकर पालते हैं। अंग्रेजी माहौल में पला-बढ़ा यह लड़का एमआई-7 का एजेंट बनना चाहता है, लेकिन 7 बार फेल हो जाता है।
कहानी तब आगे बढ़ती है जब उसे एक मिशन मिलता है, एक अंग्रेज महिला को किडनैपर्स से छुड़ाने के लिए भारत जाने का। भारत आने से पहले वह हिंदी फिल्में देखकर भाषा और देसी माइंडसेट सीखने की कोशिश करता है। यहीं से फिल्म कॉमेडी बनने की कोशिश करती है, लेकिन यही कोशिश फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।
भारत पहुंचकर हैप्पी की टक्कर गैंगस्टर मामा से होती है, जिसका किरदार मोना सिंह ने निभाया है। यहीं से फिल्म स्पाई-कॉमेडी का रास्ता पकड़ती है, लेकिन कहानी कभी रफ्तार नहीं पकड़ पाती। मिशन पूरा कैसे होता है, यही फिल्म का सार है, लेकिन इसे इतने ढीले ढंग से दिखाया गया है कि दर्शक बीच-बीच में फिल्म से कटने लगता है।
वीर दास ने फिल्म को कूल और यंग बनाने की कोशिश की है। अंग्रेजी-हिंदी का मिक्स, अपशब्द, अजीब हरकतें और अटपटे डायलॉग, सब कुछ डाला गया है। चार-पांच संवाद ऐसे हैं, जिन पर हंसी आ सकती है, लेकिन सिर्फ इन्हीं के दम पर दो घंटे की फिल्म नहीं चल सकती।
सबसे बड़ी चूक यह है कि फिल्म सिचुएशनल कॉमेडी के मौके होने के बावजूद उन्हें भुना नहीं पाती, जबकि कहानी में भरपूर गुंजाइश थी।
करीब दो घंटे की यह फिल्म देखने में पांच घंटे जैसी लगती है। खासकर सेकंड हाफ जरूरत से ज्यादा खिंचा हुआ और थकाने वाला है। कॉमेडी के नाम पर बेसिर-पैर की हरकतें दिखाई गई हैं, जिनका कहानी से कोई ठोस रिश्ता नहीं बनता। दर्शक फिल्म से कभी कनेक्ट ही नहीं कर पाता।
यहीं वीर दास सबसे बड़ी चूक कर बैठते हैं। स्टैंडअप कॉमेडी के पांच मिनट और फिल्म के दो घंटे, इन दोनों की जरूरतें अलग होती हैं। हर सीन को एक्सपेरिमेंट के नाम पर छोड़ दिया गया है, लेकिन ठोस कहानी और मजबूत स्क्रीनप्ले की जरूरत को नजरअंदाज कर दिया गया।
वीर दास की एक्टिंग औसत रही है। कुछ सीन में वे ठीक लगते हैं, लेकिन पूरी फिल्म को अपने कंधों पर उठाने में नाकाम रहते हैं। मोना सिंह अपने किरदार में मिसफिट नजर आती हैं। मिथिला पालकर जरूर स्क्रीन पर फ्रेशनेस लाती हैं और अच्छा काम करती हैं। शरीब हाशमी जैसे दमदार कलाकार का ठीक से उपयोग नहीं किया गया है। श्रुति तावड़े की एक्टिंग उम्दा है।
स्पेशल अपीयरेंस में आमिर खान और इमरान खान कुछ मिनटों के लिए आते हैं, लेकिन उनका कैमियो भी कोई खास असर नहीं छोड़ पाता।
कुल मिलाकर हैप्पी पटेल: खतरनाक जासूस एक बड़ा मिसफायर है। न कहानी में दम है, न कॉमेडी में जान। वीर दास ने एक सुनहरा मौका गंवा दिया है और दर्शकों को निराश किया है। यह फिल्म न दिमाग को छूती है, न दिल को और यही इसकी सबसे बड़ी हार है।
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HAPPY PATEL KHATARNAK JASOOS (2026)
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निर्देशक: वीर दास - कवि शास्त्री
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गीत: वीर दास, आईपी सिंह, अनिमेष पाणिग्रही, Mxrzi, सुचिता शिरके, नीरज पांडे
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संगीत: अचिंत ठक्कर, अक्षय एंड आईपी, अजय जयंती एंड पार्थ पारेख, एलियन चटनी
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कलाकार: वीर दास, मोना सिंह, मिथिला पालकर, शरीब हाशमी, श्रुति तावड़े, इमरान खान और आमिर खान (स्पेशल अपियरेंस)
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सेंसर सर्टिफिकट : केवल वयस्कों के लिए * 2 घंटे 1 मिनट 42 सेकंड
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रेटिंग : 1/5