ओ रोमियो रिव्यू: शाहिद-तृप्ति की दमदार एक्टिंग और विशाल पर एनिमल का हैंगओवर
एनिमल की मेकिंग का हैंगओवर अब सिर्फ नए-नवेले डायरेक्टर्स तक सीमित नहीं रहा। विशाल भारद्वाज जैसे फिल्ममेकर पर भी यह चढ़ गया है और ओ रोमियो का पहला ही सीन देख कर दिमाग में एनिमल की परछाई उतर आती है। बात सिर्फ टोन तक सीमित नहीं रहती। स्लो मोशन, स्टाइलिश हिंसा और जरूरत से ज्यादा खून-खराबे वाले सीक्वेंस… जिनसे विशाल आमतौर पर दूरी बनाते रहे हैं, वही इस बार ओ रोमियो में खुलकर मौजूद हैं। ऐसा लगता है जैसे विशाल ने दर्शकों की नब्ज़ पकड़ने के लिए इस बार “सेफ गेम” नहीं, बल्कि “ट्रेंड वाला गेम” खेलने का फैसला किया है।
फिल्म की कहानी हुसैन जैदी की किताब माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई से प्रेरित बताई गई है। केंद्र में है हुसैन उस्तरा (शाहिद कपूर), एक ऐसा लड़का जो कभी बाल काटने की दुकान पर काम करता था, लेकिन पिता की हत्या के बाद उसका बदला उसे क्रूरता की उस हद तक ले जाता है, जहां वह अपने पिता के हत्यारे को उस्तरे से गर्दन से जांघ तक चीर देता है। पोस्टमार्टम करने वाला डॉक्टर लाश देखकर कहता है यह किसी आर्टिस्ट का काम है। यहीं से फिल्म अपने किरदार को साधारण नहीं रहने देती। हुसैन रंडीबाज से रोमियो बन जाता है जो दिल से भी चलता है और उस्तरे से भी।
हुसैन की जिंदगी में अफशां (तृप्ति डिमरी) की एंट्री चार लोगों की सुपारी के साथ होती है। और यहीं फिल्म का सबसे दिलचस्प हिस्सा जन्म लेता है, यह प्रेम कहानी फूलों वाली नहीं, गोली-बारूद और जिद वाली है।
अफशां की बैकस्टोरी फिल्म के प्रति उत्सुकता पैदा करती है। उसकी बदला लेने की जिद, उसकी दबंगता और उसके फैसलों की बेखौफी उसे हुसैन के सामने सीधे खड़ा कर देती है। यह रिश्ता रोमांस से ज्यादा “टकराव” से बनता है और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी है।
फिल्म में पुलिस का ट्रैक भी है, जहां पुलिस ऑफिसर इस्माइल खान (नाना पाटेकर) हुसैन से अपराधियों के मर्डर करवाता रहता है ताकि “समाज से गंदगी साफ” होती रहे। यह आइडिया कागज़ पर बेहद दमदार है, क्योंकि यह नैतिकता की लाइन को धुंधला कर देता है।
लेकिन कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह ट्रैक उतना गहराई से एक्सप्लोर नहीं होता जितना होना चाहिए था। इस्माइल, हुसैन और अफशां का जलाल (अविनाश तिवारी) दुश्मन बन जाता है, लेकिन इस दुश्मनी की जड़ें उतनी तीखी नहीं बन पातीं जितनी विशाल के सिनेमा में उम्मीद की जाती है।
विशाल भारद्वाज ने निर्देशन के साथ-साथ स्क्रीनप्ले और डायलॉग भी लिखे हैं और संगीत भी खुद ही दिया है। यह वही विशाल हैं जो अपनी ट्रीटमेंट के लिए जाने जाते हैं, जहां कहानी सिर्फ संवादों से नहीं, माहौल से भी कही जाती है।
उनके सिनेमा में संगीत हमेशा एक किरदार की तरह मौजूद रहता है और ओ रोमियो में भी यही सबसे मजबूत पक्ष बनकर सामने आता है। कई जगह वे बिना भाषण दिए बहुत कुछ कह जाते हैं। बस एक फ्रेम, एक धुन और एक सन्नाटा… और दर्शक समझ जाता है।
कहानी 1995 में सेट है। उस दौर की क्रिकेट और राजनीति की खबरें, और हिट गानों के जरिये विशाल ने उस समय को क्रिएट किया है। लेकिन सच कहें तो विशाल भारद्वाज से इससे कहीं ज्यादा की उम्मीद थी। यह दुनिया पूरी तरह “जिंदा” लगने से कुछ कदम पीछे रह जाती है। फिर भी फर्स्ट हाफ में उस्तरा का एटीट्यूड, उसका लाइफस्टाइल और अफशां का रहस्यमयपन दर्शकों को बांध कर रखता है। हाँ, फिल्म की गति कई जगह धीमी लगती है और कुछ दृश्य गैर जरूरी भी महसूस होते हैं, लेकिन विशाल अपने प्रेजेंटेशन के दम पर फर्स्ट हाफ में पकड़ बनाए रखते हैं।
ओ रोमियो का दूसरा हाफ फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष है। यहां फिल्म ज्यादा बिखरती है और सिनेमैटिक लिबर्टी जरूरत से ज्यादा लेती है। क्लाइमैक्स स्पेन में फिल्माया गया है और वहां तू या मैं यानी हीरो-विलेन की लड़ाई साफ तौर पर एनिमल के क्लाइमैक्स की याद दिलाती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विलेन के पास उस्तरा को सीधे मारने का मौका है, तो वह आमने-सामने की लड़ाई क्यों लड़ता है? इस तरह के “सिनेमा वाले लॉजिक” की उम्मीद विशाल जैसे निर्देशक से नहीं रहती। वैसे भी क्लाइमैक्स अगर कमजोर पड़ जाए, तो पूरी फिल्म का असर नीचे आ जाता है।
फिल्म उस्तरा के किरदार के बारे में ज्यादा बात नहीं करती। वह लोगों को क्यों मार रहा है? पुलिस के लिए क्यों काम कर रहा है? वह जानवरों जैसा बर्ताव क्यों करता है? ये सवाल फिल्म देखते समय लगातार कौंधते रहते हैं। और अफसोस की बात यह है कि इनके जवाब मामूली से या आधे-अधूरे से मिलते हैं।
बतौर निर्देशक विशाल भारद्वाज ने अपनी शैली में ओ रोमियो को पेश किया है। रंगों का संयोजन, आकर्षक सिनेमाटोग्राफी और शॉट कम्पोजिशन, इन सबके जरिये वे दर्शकों को आकर्षित तो करते हैं।
लेकिन स्क्रीनप्ले और एडिटिंग में टाइटनेस की ओर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। यही वजह है कि फिल्म कहीं प्रभाव छोड़ती है, तो कहीं अचानक फिसल जाती है। एक बेहतर एडिट और थोड़ा ज्यादा सधा हुआ स्क्रीनप्ले इसे “अच्छी फिल्म” की कैटेगरी में आराम से ला सकता था।
फिल्म के लीड एक्टर्स शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी ने उम्दा अभिनय किया है। तृप्ति के करियर का यह अब तक का बेस्ट परफॉर्मेंस कहा जा सकता है। अफशां के रूप में उन्होंने एक बेखौफ लड़की को सशक्त रूप से स्क्रीन पर पेश किया है, उसकी आंखों में डर नहीं, जिद और बदला नजर आता है। शाहिद कपूर उस्तरा के रूप में प्रभावित करते हैं। उन्होंने किरदार को अच्छे से जिया है, खासकर बॉडी लैंग्वेज और आंखों के जरिये।
नाना पाटेकर को और स्क्रीन टाइम दिया जाना चाहिए था। हालांकि उम्र उन पर हावी लगती है, फिर भी उनकी मौजूदगी स्क्रीन पर वजन बढ़ाती है। दिशा पटानी, तमन्ना भाटिया और विक्रांत मैसी ने इतने छोटे रोल के लिए हां क्यों की समझ से परे है। अविनाश तिवारी भी बहुत असर नहीं छोड़ पाए।
फिल्म तकनीकी रूप से सशक्त है। सिनेमाटोग्राफी लाजवाब है, हालांकि कई दृश्यों में लाइट बहुत कम रखी गई है, जिससे कुछ जगह दृश्य खूबसूरत होने के बावजूद देखने में कठिन लगते हैं। विशाल द्वारा संगीतबद्ध किए गाने और बैकग्राउंड म्यूजिक शानदार है। कई सीन में बीजीएम फिल्म का असली ड्राइविंग फोर्स बन जाता है।
कुल मिलाकर ओ रोमियो एक ऐसी फिल्म है जो अच्छी और बुरी फिल्म के बीच की पतली रेखा पर खड़ी नजर आती है। इसमें विशाल भारद्वाज का स्टाइल, संगीत और कुछ शानदार परफॉर्मेंस हैं, लेकिन कमजोर दूसरा हाफ, ढीली एडिटिंग और सवालों के अधूरे जवाब इसे “बहुत अच्छी” फिल्म बनने से रोक देते हैं। फिर भी अगर आप विशाल भारद्वाज के सिनेमा, स्टाइलिश क्राइम ड्रामा और शाहिद-तृप्ति की जोड़ी के लिए तैयार हैं तो ओ रोमियो एक बार देखी जा सकती है।
O ROMEO (2026)
निर्देशक: विशाल भारद्वाज
गीत: गुलजार
संगीत: विशाल भारद्वाज
कलाकार: शाहिद कपूर, तृप्ति डिमरी, नाना पाटेकर, तमन्ना भाटिया, दिशा पटानी, फरीदा जलाल, अविनाश तिवारी, विक्रांत मैसी
सेंसर सर्टिफिकट : A (केवल वयस्कों के लिए) * 2 घंटे 58 मिनट 41 सेकंड