शर्मिला टैगोर : अभिजात्य वर्ग का साधारणीकरण

Last Updated: गुरुवार, 3 दिसंबर 2020 (14:29 IST)
सत्यजीत रे की फिल्मों में काम करने से (ठाकुर) पर श्रेष्ठता की छाप ऐसी लगी कि बंबइया फिल्मी दुनिया की काजल-कोठरी में भी वह उजली बनी रहीं। आराधना, सफर, अमर प्रेम, अनुपमा, दूसरी दुल्हन शर्मिला की उम्दा फिल्में हैं। बंगाल नायिकाओं की शालीनता को शर्मिला बंगाली की खाड़ी से खींचकर अरब-सागर तक लाई हैं।

सन 1957 में मात्र 13 वर्ष की आयु में शर्मिला ने सत्यजीत रे की 'अपूर संसार' में अभिनय कर अंतरराष्ट्रीय ख्याति अजित की और इसके बाद सत्यजीत रे की 'देवी', 'अरण्येर दिन रात्रि', 'नायक' और 'सीमाबद्ध' में शर्मिला ने उच्च श्रेणी का अभिनय किया। 1964 में 20 वर्ष की आयु में शक्ति सामंत की 'कश्मीर की कली' शर्मिला की पहली थी। बंगाली दर्शकों ने तो शर्मिला की अभिनय प्रतिभा की प्रशंसा की तो हिंदी दर्शकों को शर्मिला के सौंदर्य ने प्रभावित किया। उसके गाल में धंसने वाले भंवर में युवा दर्शक डूब गए।

शर्मिला का आविर्भाव उस समय हुआ जब साधना, आशा पारेख, सायरा बानो ने दर्शकों को नरगिस, मधुबाला और मीना की याद से छुड़ाने के सारे प्रयास कर लिए थे। दर्शकों ने शर्मिला में नरगिस की प्रतिभा की झलक देखी और सायरा बानो का सौंदर्य। नायिकाओं के इतिहास के दृष्टिकोण से शर्मिला में पुरानी पीढ़ी की प्रतिभा थी और वर्तमान की चपलता भी।

शर्मिला ने आते ही व्यावसायिक सिनेमा के दिग्गजों जैसे यश चोपड़ा की फिल्में की, तो दूसरी ओर ऋषिकेश मुखर्जी तथा गुलजार की फिल्में भी कीं। यह शर्मिला का कमाल है कि उसने सत्यजीत रे से लेकर सूरज प्रकाश (आमने-सामने) तक निर्देशकों के साथ काम किया और हर स्कूल के मानदंडों के अनुरूप सफल रही। सत्यजीत रे अगर 'कश्मीर की कली' या 'एन इवनिंग इन पेरिस' देखते तो 'नायक' या 'सीमाबद्ध' में उसे काम ही नहीं देते।

शर्मिला ने अभिनय में विविधता के नए मानदंड स्थापित किए हैं। ऋषिकेश मुखर्जी के साथ 'अनुपमा', 'सत्यकाम' जैसी गंभीर फिल्मों के अलावा 'चुपके-चुपके' जैसी हास्य फिल्म भी की। यश चोपड़ा के साथ 'वक्त' के मामूली रोल के साथ 'दाग' जैसी फिल्म में अत्यंत नाटकीय भूमिका भी अभिनीत की। राजेश के साथ 'आराधना' में असीम लोकप्रियता पाई तो 'सफर' में असाधारण अभिनय भी किया। 'अमर प्रेम' में दर्शकों को शर्मिला ने मंत्रमुग्ध कर दिया।

8 दिसम्बर 1944 को जन्मीं शर्मिला अभिजात्य वर्ग से आई थीं और अभिनेत्रियों में भी उसका विशिष्ट स्थान ही रहा। वह अकेली ऐसी अभिनेत्री हैं जिन्होंने गंभीर भूमिकाओं की चुनौती स्वीकार करने के साथ ही कपड़े उतारने वाली भूमिकाएं भी कीं और इसके बावजूद भी उसके खिलाफ प्रेस या दर्शकों ने कभी कुछ नहीं किया। 'इवनिंग इन पेरिस', 'आमने-सामने' आदि कितनी ही फिल्में हैं जिसमें उन्होंने तैरने की पोशाक पहनी है। गुलजार की 'मौसम' में मर्दों की तरह बीड़ी पीना और भद्दी गालियां देने वाली भूमिका भी की है। 'मौसम' में एक युवा प्रेमिका भी थीं, अनंत विरहणी भी, पागल बुढ़िया भी और एक तवायफ भी। राखी के पति गुलजार से ऐसे बहुमुखी आयाम वाली भूमिका ले लेना कोई आसान कार्य नहीं था।

शर्मिला ठाकुर का कद छोटा था, परंतु अपार अभिनय क्षमता के कारण वह अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों से ऊपर उठ गईं। अध्ययन की दृष्टि से शर्मिला शायद वनमाला को छोड़कर सभी अभिनेत्रियों से ऊपर हैं और इस गहन अध्ययन का फायदा उन्होंने अपने अभिनय में उठाया है। पात्र के अंतर्द्वंद्व की उन्हें अच्छी समझ है। संवाद की अदायगी में ठहरने (पॉज) की कला में शर्मिला वैसे ही निष्णात हैं जैसे पुरुषों में दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और नसीरुद्दीन शाह। अगर शर्मिला ठाकुर का फिल्म उद्योग में महत्व वर्णन करने के लिए एक शब्द का प्रयोग करना हो तो कहेंगे कि वह अभिजात्य वर्ग की प्रतिनिधि हैं। शर्मिला और अभिजात्य शब्द समानार्थी हो जाते हैं। शर्मिला ने अभिजात्य वर्ग की सारी विशेषताओं के बावजूद आम दर्शक से तादात्म्य स्थापित किया है।

प्रमुख फिल्में : कश्मीर की कली (1964), अनुपमा (1966), सत्यकाम, आराधना (1969), सुहाना सफर (1970), अमर प्रेम (1971), छोटी बहू (1971), दास्तान (1972), राजा रानी, दाग, आविष्कार (1973), अमानुष (1975), चुपके-चुपके, मौसम, अमानुष, फरार (1975), आनंद आश्रम, त्याग (1977), दूरियां (1979), देश प्रेमी, नमकीन (1982), दूसरी दुल्हन (1983), न्यू देहली टाइम्स (1986)

- परदे की परियां से साभार



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