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Written By BBC Hindi
Last Modified: शुक्रवार, 5 मई 2023 (09:22 IST)

शरद पवार : 82 साल की उम्र, 63 साल की राजनीति और 8 निर्णायक घटनाएं

शरद पवार : 82 साल की उम्र, 63 साल की राजनीति और 8 निर्णायक घटनाएं - sharad pawar : 82 years age, 63 years in politics
मयूरेश कोन्नूर, बीबीसी मराठी संवाददाता
"एक मई, 1960 से 1 मई, 2023 तक सार्वजनिक जीवन में लंबा समय बिताने के बाद अब कहीं रुकने पर विचार करने की आवश्यकता है। इसलिए, मैंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने का फ़ैसला किया है।"
 
शरद पवार के इन दो वाक्यों ने यशवंतराव चव्हाण केंद्र के सभागार को सचमुच हिला कर रख दिया। यह इत्तेफ़ाक़ ही है कि शरद पवार को राजनीति में लाने वाले, पालने-पोसने वाले और अपना बेटा जैसा ही मानने वाले यशवंतराव चव्हाण के नाम पर बने हॉल में पवार ने अपने इस्तीफ़े की घोषणा की।
 
शरद पवार से अपना इस्तीफ़ा वापस लेने की मांग को लेकर नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम स्थल पर धरना दिया। प्रत्येक नेता ने अपना पक्ष रखा और पवार से इस्तीफ़ा वापस लेने का अनुरोध किया। इस मौके पर एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल, जितेंद्र अवहाद जैसे वरिष्ठ नेता भावुक हो गए।
 
वहीं अजित पवार ने ये भी कहा है कि शरद पवार अपने इस्तीफ़े के फ़ैसले पर फिर से विचार करने को तैयार हो गए हैं।
 
शरद पवार 1 मई 1960 से राजनीति में सक्रिय हैं। पिछले छह दशकों की महाराष्ट्र की राजनीति उनके इर्द-गिर्द घूमती रही।
 
वह सत्ता में हों या न हों, बहुमत में हों या न हों, महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार 'फैक्टर' को सबसे अहम फैक्टर माना जाता है।
 
साढ़े तीन साल पहले जब कहा जाता था कि शरद पवार राजनीति के दूसरे चरण के अंत तक पहुंच गए हैं, तो उन्होंने राज्य में एक अभूतपूर्व 'महाविकास अघाड़ी' बनाकर साबित कर दिया कि 'मैं अब भी सक्रिय हूं'।
 
पवार का राजनीतिक जीवन एक तरह से महाराष्ट्र समकालीन राजनीतिक इतिहास है। उनके राजनीतिक जीवन की 8 महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएं या फ़ैसले, जिनका महाराष्ट्र और देश की राजनीति पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ा, उस पर एक नज़र डालते हैं:
 
राजनीतिक करियर पर एक नज़र
  • शरद पवार ने 1960 में शुरू की राजनीति और छह दशकों तक महाराष्ट्र की राजनीति की बने धुरी रहे।
  • आपातकाल के बाद कांग्रेस में दो फाड़ हो गया और पवार 'रेड्डी कांग्रेस' के साथ चले गए।
  • जुलाई 1978 में उन्हें महाराष्ट्र के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला।
  • साल 1986 में कांग्रेस में वापसी और 1988 में महाराष्ट्र के दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
  • साल 1993 में, पवार तीसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने।
  • पवार 1996 से ही केंद्र की राजनीति में अहम किरदार बन गए।
  • 1999 में पवार ने सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया और कांग्रेस से अलग होकर 'राष्ट्रवादी कांग्रेस' बनाई।
  • महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी गठबंधन का श्रेय मुख्य रूप से पवार को ही दिया जाता है।
  • पवार बीसीसीआई और आईसीसी की लंबे समय तक अध्यक्ष रहे।
  • कहा जाता है कि शरद पवार प्रधानमंत्री पद के क़रीब दो बार पहुंचे थे।
 
महाराष्ट्र का सबसे युवा मुख्यमंत्री बनने की कहानी
1978 में पवार को राजनीति में यशवंतराव से हाथ मिलाए और खुद को स्थापित किए काफ़ी समय हो गया था।
 
तब तक वे राज्य में मंत्री भी बन चुके थे। लेकिन एक घटना ने उन्हें महाराष्ट्र का सबसे युवा मुख्यमंत्री बना दिया और महाराष्ट्र की राजनीति को भी बदल कर रख दिया।
 
1977 में आपातकाल के बाद कांग्रेस दो गुटों में विभाजित हो गई, 'इंदिरा कांग्रेस' और 'रेड्डी कांग्रेस'। यशवंतराव के साथ, वसंतदादा पाटिल, शरद पवार सहित महाराष्ट्र के कई नेता 'रेड्डी कांग्रेस' में चले गए थे।
 
1978 में जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव हुए तो दोनों कांग्रेस अलग-अलग लड़ीं। जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन बहुमत से पीछे रह गई।
 
फिर दोनों कांग्रेस एक साथ आईं और इस गठबंधन सरकार के वसंतदादा पाटिल मुख्यमंत्री बने, जबकि नासिकराव तिरपुडे उपमुख्यमंत्री बने। लेकिन इस सरकार में कई नेता असहज थे। सरकार में विवाद बढ़ने लगे।
 
अंत में शरद पवार 40 समर्थक विधायकों के साथ बाहर चले गए और साढ़े चार महीने में गठबंधन सरकार गिर गई। पवार की इस पहली बग़ावत का कई तरह से विश्लेषण किया गया।
 
यह भी कहा गया कि 'वसंतदा की पीठ में खंजर भोंका गया'। यह भी कहा गया कि यशवंतराव ने गोविंद तलवलकर की भविष्यवाणियों का हवाला देकर पवार का समर्थन किया। बाहर आए पवार ने अपनी 'सोशलिस्ट कांग्रेस' की ओर से सरकार बनाने के लिए पहल की।
 
अंत में जुलाई 1978 में शरद पवार 38 साल की उम्र में 'प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक पार्टी' यानी 'प्रलोद' की सरकार बनने के साथ महाराष्ट्र के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने। यह सरकार डेढ़ साल से ज़्यादा चली।
 
इस बीच देश के समीकरण भी बदले। जनता पार्टी में फूट पड़ गई। अंत में इंदिरा गांधी की सिफ़ारिश पर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया और पवार की पहली सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया गया।
 
पवार की कांग्रेस में वापसी और दूसरी बार मुख्यमंत्री बनना
1980 में महाराष्ट्र में सरकार के विघटन के बाद, वह लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहे। लेकिन इस दौरान कांग्रेस पार्टी और महाराष्ट्र में भी कई चीज़ें बदलीं। पंजाब में अस्थिरता का मुद्दा प्रमुख हो गया और अंत में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई।
 
राजीव गांधी ने देश और पार्टी की कमान संभाली। राजीव के बाद कांग्रेस में एक नई पीढ़ी बनने लगी। जैसा कि पवार ने खुद अपनी राजनीतिक आत्मकथा में लिखा है, "राजीव गांधी ने कांग्रेस में वापस आने और साथ काम करने की इच्छा जताई थी।"
 
महाराष्ट्र और कांग्रेस के कुछ नेता पवार की वापसी के ख़िलाफ़ थे। इसी दौरान, राजीव गांधी की आंधी के सामने पवार अपनी पार्टी से लोकसभा के सदस्य भी बने, 1984 में वे पहली बार बारामती से लोकसभा पहुंचे थे।
 
लेकिन वे जल्द ही महाराष्ट्र लौट आए। यह राजीव गांधी की इच्छा थी, लेकिन कांग्रेस को उनकी ज़रूरत भी थी ताकि महाराष्ट्र में शिवसेना के बढ़ते प्रभाव के सामने युवा नेतृत्व कांग्रेस को संभाले रखे।
 
राजनीतिक विश्लेषक नितिन बिरमल अपनी पुस्तक 'पॉवर स्ट्रगल' में लिखा है, 'वसंतदादा पाटिल का गुट भी तब तक नेतृत्व विहीन हो चुका था।'
 
केंद्रीय नेतृत्व ने महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री का पद एआर अंतुले, बाबासाहेब भोसले, नीलांगेकर पाटिल और शंकरराव चव्हाण को दिया, लेकिन इनमें से किसी के पास पूरे महाराष्ट्र में जन समर्थन नहीं था।
 
उस दौर में शरद पवार की सोशलिस्ट कांग्रेस आगे बढ़ रही थी, लेकिन यह भी स्पष्ट होता जा रहा था कि कांग्रेस के बिना सरकार नहीं बन सकती। इसकी वजह यह थी कि राजीव गांधी के नेतृत्व को भारी जन समर्थन हासिल था। इसे भांपते हुए पवार ने कांग्रेस में लौटने का फ़ैसला लिया था।
 
उन्होंने 1986 में औरंगाबाद में इस निर्णय की घोषणा की। 1988 में, राजीव गांधी ने शंकरराव चव्हाण को अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया और शरद पवार दूसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने।
 
जब प्रधानमंत्री बनने के क़रीब थे पवार
शरद पवार के राजनीतिक जीवन में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है। क्योंकि उनके करियर के इन्हीं दिनों के बारे में कहा जाता है कि पवार के हाथों से प्रधानमंत्री बनने का मौका निकल गया।
 
90 के दशक की शुरुआत तक, पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर पवार की स्थिति महत्वपूर्ण हो गई थी क्योंकि वे कांग्रेस में लौट आए थे और मुख्यमंत्री बने। 1991 में राजीव गांधी की हत्या में हो गई थी और कांग्रेस में नेतृत्व का सवाल एक बड़ा मुद्दा बन गया। सोनिया तब राजनीति में नहीं आयीं थीं।
 
जैसा कि पवार ने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है, "कांग्रेस में कई लोग, ख़ासकर युवा, चाहते थे कि पवार पार्टी का नेतृत्व करें।"
 
राजीव की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला लेकिन वह उसके क़रीब पहुंच गई थी।
 
प्रधानमंत्री पद की दौड़ में पवार उतरे, लेकिन वोटिंग में पी। वी नरसिम्हा राव को ज़्यादा वोट मिले और पवार के हाथों से मौका निकल गया।
 
हालांकि उस सरकार में वो रक्षा मंत्री बने। नरसिम्हा राव की इस सरकार को कुछ वर्षों से शुरू हुए राम जन्मभूमि आंदोलन के निर्णायक दौर का सामना करना पड़ा था।
 
6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने अयोध्या की बाबरी मस्जिद को गिरा दिया और देश में सांप्रदायिक तनाव का माहौल बन गया। इस तनाव का सबसे ज़्यादा असर मुंबई में दिखा।
 
मुंबई में दंगे भड़क उठे और देश की आर्थिक राजधानी आग की लपटों में घिर गई। उस मुश्किल दौर में मार्च 1993 में, पवार तीसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने।
 
वैसे तो यह बदलाव मुंबई दंगों के मद्देनजर हुआ, लेकिन कई लोगों ने इसकी राजनीतिक व्याख्या की नरसिम्हा राव दिल्ली में पवार के रूप में कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने उन्हें वापस मुंबई भेज दिया।
 
वहीं पवार ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "अनिच्छा से सही लेकिन महाराष्ट्र के हित के बारे में सोचते हुए, मैंने मुख्यमंत्री बनना स्वीकार किया।"
 
दूसरी बार प्रधानमंत्री पद के क़रीब
1995 में महाराष्ट्र की सत्ता से हटने वाले शरद पवार 1996 में गठबंधन राजनीति का दौर शुरू होने के बाद दिल्ली की राजनीति में अहम नेता बन गए। बाद में, वह कांग्रेस की ओर से लोकसभा में विपक्ष के नेता बने। कहा गया कि गठबंधन के इस दौर में पवार दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की दौड़ में क़रीब पहुंचे थे।
 
कांग्रेस बहुमत में नहीं थी, लेकिन उसके समर्थन से सरकारें बन रही थीं। सोनिया गांधी के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण रहे। इसमें कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं की एक कतार पवार के ख़िलाफ़ काम करती रही। सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में आने का फ़ैसले किया और फिर कांग्रेस के अंदर का गणित भी बदल गया।
 
एक बड़े वर्ग की यह भी राय थी कि सोनिया को प्रधानमंत्री बनना चाहिए। अंतत: 1999 में शरद पवार ने सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया और पीए। संगमा और तारिक अनवर के साथ मिलकर 'राष्ट्रवादी कांग्रेस' की स्थापना की। कांग्रेस में पवार की यह दूसरी बग़ावत थी।
 
1999 में लोकसभा और विधानसभा के एक साथ हुए चुनाव में राज्य में कांग्रेस और एनसीपी अलग-अलग चुनाव लड़ीं। लेकिन चुनाव के बाद दोनों पार्टियों के बीच महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए गठबंधन भी हो गया।
 
इस बीच केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तीसरी बार आई और पांच साल तक चली।
 
लेकिन 2004 में सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन सोनिया ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया।
 
सोनिया की पसंद के तौर पर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। जिस मुद्दे पर पवार को आपत्ति थी, वह सोनिया के फ़ैसले से जाती रही। उस वक्त कहा जाता था कि अगर शरद पवार कांग्रेस में होते तो उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना होती।
 
बहरहाल, 'राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी' कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा रही और पवार नई सरकार में शामिल हुए। वे अगले 10 वर्षों तक कृषि मंत्री बने रहे।
 
महाविकास अघाड़ी बनने की कहानी
उतार चढ़ाव वाले राजनीतिक सफ़र में 2019 में उन्होंने जो गठबंधन बनाया, वह सबसे नाटकीय माना जा सकता है।
 
मोदी सरकार के दूसरी बार भारी बहुमत से वापसी हो गई। देवेंद्र फडणवीस ने शिवसेना की मदद से पांच साल तक महाराष्ट्र की सरकार चला चुके थे।
 
हालांकि चुनाव से पहले सभी विश्लेषक बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की सरकार की वापसी की भविष्यवाणी कर रहे थे और पवार के कई साथी पार्टी भी छोड़कर बीजेपी के खेमे में जा रहे थे।
 
ऐसे समय में शरद पवार ने चुनावी अभियान की धुरी अपने हाथों में ले ली और गठबंधन के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का फ़ैसला अपने हाथों में रखा।
 
केंद्रित किया, पवार स्थानीय मुद्दों को उठाते रहे। इस चुनाव अभियान में सतारा की बारिश में उनका भाषण वायरल हो गया।। जब नतीजे आए तो बीजेपी की सीटें 122 से 105 हो गई थीं।
 
एनसीपी और कांग्रेस की सीटें बढ़ी थीं। शिवसेना तो सिमट गई, लेकिन बीजेपी के साथ उनके पास स्पष्ट बहुमत था।
 
यहां पवार की राजनीतिक रणनीति ने खेल बदल दिया। मुख्यमंत्री पद की मांग को लेकर शिवसेना ने बीजेपी से किनारा करना शुरू कर दिया है। शिवसेना ने पवार से बातचीत शुरू की।
 
लेकिन सवाल यही था कि शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी एक साथ कैसे आएंगे जब वे राजनीतिक रूप से, वैचारिक रूप से एक-दूसरे के विरोधी हैं? यहां पर पवार की इतने सालों की कूटनीति अहम हो गई।
 
शिवसेना के एनडीए छोड़ने और गठबंधन में आने के लिए शरद पवार ने सोनिया गांधी को भी मना लिया था। इस दौरान महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा। जब नए 'महाविकास अघाड़ी' के सत्ता में आने की संभावना बनी तो अजित पवार ने बग़ावत की और बीजेपी के साथ मिल गए। लेकिन पवार के मराठी दांव से फडणवीस और अजीत पवार की 84 घंटे की सरकार गिर गई। 28 नवंबर को उद्धव ठाकरे ने 'महाविकास अघाड़ी' के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
 
क्रिकेट में करियर
कहा जाता है कि शरद पवार कभी हारते नहीं हैं। जब वो खुद चुनाव लड़ते हैं तो जीत उनकी होती है, जब जीत पक्की न हो तो वो नहीं लड़ते हैं।
 
लेकिन फिर भी उन्हें एक चुनाव में हार का सामना करना पड़ा और वह उनके चुनावी करियर की एकमात्र हार थी। बेशक वह राजनीतिक क्षेत्र में नहीं बल्कि क्रिकेट के मैदान में थी।
 
2004 में उन्हें तत्कालीन अध्यक्ष जगमोहन डालमिया के हाथों 'भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड' यानी 'बीसीसीआई' के चुनाव में बेहद कड़े मुक़ाबले में हार माननी पड़ी थी।
 
इससे पहले 2001 में, उन्होंने 'मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन' के चुनाव में अजीत वाडेकर को हराया था। भारत में क्रिकेट प्रबंधन पर उनका प्रभाव तेजी से बढ़ा।
 
लेकिन 2004 में मिली हार ने उन्हें झकझोर दिया था, लेकिन अगले ही साल उन्होंने डालमिया को हरा दिया और 'बीसीसीआई' के अध्यक्ष बन गए।
 
उसके बाद, पवार और उनके गुट ने कई वर्षों तक भारतीय क्रिकेट को नियंत्रित किया। 2010 में वे 'इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल' यानी 'आईसीसी' के अध्यक्ष बने।
 
उनके समय में ही टी-20 क्रिकेट की 'इंडियन प्रीमियर लीग' शुरू हुई, जिसने भारतीय क्रिकेट का चेहरा ही बदल दिया।
 
हालांकि 2016 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लोढ़ा समिति की सिफ़ारिशों को स्वीकार करने के बाद, क्रिकेट प्रबंधन में पवार की पारी का अंत हो गया।
 
जब एक विश्वविद्यालय का परिवर्तन बना बड़ा मुद्दा
औरंगाबाद के मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बदलकर 'डॉ बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय' करने का प्रस्ताव 1978 में पवार के नेतृत्व में 'प्रलोद' सरकार आने से पहले से हो रही थी।
 
'प्रलोद' सरकार के सत्ता में आने पर पवार ने मुख्यमंत्री के रूप में विधान सभा में प्रस्ताव पेश किया था, जो पारित भी हो गया।
 
लेकिन उसके बाद मराठवाड़ा में सवर्ण और दलितों के बीच दंगे हुए। इस फ़ैसले पर रोक लग गई लेकिन 1988 में जब पवार फिर से मुख्यमंत्री बने तब भी बात आगे नहीं बढ़ी। आखिरकार 14 जनवरी 1994 को, जब पवार तीसरी बार मुख्यमंत्री बने, तो नाम बदला गया।
 
2008 में किसानों की कर्ज़ माफ़ी का निर्णय
महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हज़ारों कर्ज़दार किसानों की आत्महत्याएं राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गईं थीं, इसे लेकर सरकारों की आलोचनाएं भी हो रही थीं।
 
2008 में केंद्रीय कृषि मंत्री रहते हुए उन्होंने किसानों की कर्ज़ माफ़ी का फैसला लिया। सरकार ने इससे पहले इस तरह की कर्ज माफ़ी नहीं की थी।
 
देशभर के किसानों और उनके कृषि आधारित उद्योगों का क़रीब 72 हज़ार करोड़ रुपये माफ़ कर दिया गया।
 
हालांकि इस बात की आलोचना भी हुई क्योंकि सरकार ने सीधे बैंकों को भुगतान किया, इसलिए समृद्ध किसानों के कर्ज़ भी माफ़ कर दिए गए।
 
उसके बाद ही किसानों की कर्ज़ माफ़ी राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में दिखाई देने लगी। 2009 में यूपीए सरकार की वापसी के पीछे यह भी एक कारक रहा है।
 
जब शरद पवार ने संन्यास की घोषणा की थी...
17 दिसंबर 2016 को मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन की बैठक में शरद पवार ने कहा था कि वह क्रिकेट प्रशासन से संन्यास ले रहे हैं। पवार के उस फ़ैसले की उम्मीद तो थी लेकिन वह भी थोड़ा चौंकाने वाला फ़ैसला था।
 
वास्तव में, वह समय भारतीय क्रिकेट प्रशासन के लिए एक बहुत ही मुश्किल दौर था और लोढ़ा समिति की सिफ़ारिशों के अनुसार, यह तय था कि पवार को उम्र और कार्यकाल दोनों के आधार पर पद छोड़ना होगा। लेकिन कोर्ट का अंतिम फ़ैसला आने के पहले ही पवार ने संन्यास की घोषणा कर दी।
 
इस घटना को छह साल से भी ज़्यादा हो गए हैं। लेकिन क्रिकेट में पवार का दबदबा पिछले एमसीए चुनाव में साफ़ दिखा था।
 
अक्टूबर 2022 में हुए उस चुनाव में आशीष शेलार ने अपना पैनल उतारा और फिर वो शरद पवार से मिलने गए, इसकी काफ़ी चर्चा हुई।
 
अंत में इसी शेलार-पवार पैनल के अमोल काले ने एमसीए के अध्यक्ष बनने के लिए पूर्व क्रिकेटर संदीप पाटिल को हराया। ज़ाहिर सी बात है कि पवार के समर्थन के बिना वह यह चुनाव नहीं जीत पाते।
 
भले ही वह अब राजनीति से संन्यास ले लें, पवार सामाजिक कारणों से जुड़े रहेंगे और महाराष्ट्र की राजनीति पर उनका प्रभाव जल्द ख़त्म नहीं होगा।
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