गणतंत्र दिवस: कब और कैसे लिखे गए भारतीय दिलों में जुनून भरने वाले देशभक्ति के तराने

BBC Hindi| Last Updated: मंगलवार, 26 जनवरी 2021 (09:25 IST)
प्रदीप सरदाना, वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक
और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर रेडियो, टेलीविज़न से लेकर विभिन्न कार्यक्रमों में देशभक्ति के बहुत से गीत सुनने को मिलते रहते हैं। जिनमें कुछ गीत ऐसे हैं जिनका इतिहास काफी पुराना है और जो बरसों बाद भी लोकप्रिय बने हुए हैं।
 
भारत में सबसे पहले जिस गीत ने देश प्रेम और देशभक्ति की अलख जगाई वह गीत है -'वंदे मातरम'।
 
यह गीत फ़िल्म 'आनंद मठ' में आज़ादी के सात बरस बाद 1952 में आया। लेकिन इस गीत की रचना सुप्रसिद्ध लेखक और उपन्यासकार बंकिमचंद्र बंदोपाध्याय ने 7 नवम्बर 1876 को की थी। इसे बाद में बंकिम बाबू ने 1882 में प्रकाशित अपने उपन्यास 'आनंद मठ' में लिया था।
 
इस गीत के पहले दो पद संस्कृत में हैं और बाद के पद बांग्ला भाषा में लिखे गए हैं। यह गीत गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर को पसंद आया तो उन्होंने खुद इसे स्वरबद्ध किया। उस दौर में कॉंग्रेस को भी यह गीत इतना पसंद आया कि उसने 1896 के कोलकाता अधिवेशन में इसे विशेष रूप से प्रस्तुत किया।
 
उसके बाद यह गीत देशभक्ति का एक बड़ा तराना बन गया। जब देश आज़ाद हुआ तो संविधान सभा में डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने 'वंदे मातरम' गीत के एक हिस्से को राष्ट्रीय गीत घोषित करके इसे राष्ट्र गान 'जन गण मन' के समकक्ष रखा।
 
लेकिन इस गीत को एक नई पहचान और बड़ी लोकप्रियता तब मिली जब चटर्जी लिखित इस गीत को हेमंत कुमार ने संगीतबद्ध करके, लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म 'आनंद मठ' फ़िल्म में शामिल किया। बरसों बाद यह गीत आज भी लोकप्रिय है।
 
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा साल 2002 में किए गए एक सर्वेक्षण में तो यह 'वंदे मातरम' गीत, विश्व के दस सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में दूसरे पायदान पर आया था।
 
फिल्मों में प्रदीप ने की देशभक्ति गीतों की पहल
 
फिल्मों में देशभक्ति गीतों की बड़ी शुरुआत का श्रेय कवि प्रदीप को जाता है। जिन्होंने सबसे पहले फ़िल्म 'बंधन' में 'चल चल रे नौजवान' गीत लिखा। उसके बाद प्रदीप के ही एक और गीत 'दूर हटो ए दुनिया वालों, हिंदुस्तान हमारा है' को फ़िल्म 'किस्मत' में लिया गया तो भारत में यह गीत आज़ादी के आंदोलन का एक अहम हिस्सा बन गया।
 
इन दोनों गीतों के लोगों पर पड़ते असर को देख सेंसर बोर्ड ने इन गीतों को फ़िल्म से निकाल दिया। साथ ही सरकार ने इन गीतों पर प्रतिबंध भी लगा दिया।
 
आज़ादी के बाद सबसे पहले देशभक्ति का जो गीत सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ, वह था दिलीप कुमार, कामिनी कौशल की 1948 में आई फ़िल्म 'शहीद' का - 'वतन की राह में, वतन के नौजवान शहीद हो'।
 
राजा मेहंदी अली ख़ान के लिखे इस गीत को मोहम्मद रफ़ी, ख़ान मस्ताना ने गाया था और ग़ुलाम हैदर ने इसका संगीत दिया था।
 
इसके बाद देश भक्ति के जिस गीत ने सभी को झकझोरा वह गीत था -'ए मेरे प्यारे वतन'। साल 1961 में प्रदर्शित बिमल राय की फ़िल्म 'काबुलीवाला' के इस गीत को अपने स्वर दिये थे मन्ना डे ने। जबकि पर्दे पर बलराज साहनी फ़िल्मांकित इस सदाबहार गीत के बोल प्रेम धवन ने लिखे और संगीत सलिल चौधरी ने संगीत दिया था।
 
इसके बाद जो गीत बच्चे-बच्चे की जुबान पर आया और आज भी लोकप्रिय है, वह है -'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ, झांकी हिंदुस्तान की'।
 
साल 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'जागृति' के इस गीत को प्रदीप ने लिखा भी और खुद ही गाया भी। इसका संगीत हेमंत कुमार ने दिया था।
 
इसके बाद प्रदीप देश प्रेम के गीतों के सबसे बड़े गीतकार बन गए। उसी का नतीजा था कि जब भारत-चीन युद्ध के बाद दिल्ली में, गणतंत्र दिवस पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने का विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ तो उसके लिए भी प्रदीप को ही विशेष गीत लिखने के लिए कहा गया।
 
'ऐ मेरे वतन के लोगों' का किस्सा
हुआ यूं कि इस कार्यक्रम के आयोजन का ज़िम्मा भारत सरकार ने सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार महबूब ख़ान को सौंपा। महबूब ने इसके लिए जहां राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार जैसे सितारों को आमंत्रित किया, वहीं मदन मोहन, हेमंत कुमार, शंकर जयकिशन और सी रामचन्द्र जैसे बड़े संगीतकारों को भी आमंत्रित किया।
 
कवि प्रदीप की बेटी मितुल प्रदीप बताती हैं, "महबूब साहब ने प्रदीप जी को इस मौक़े के लिए कोई ऐसा गीत रचने को कहा जो शहीदों को श्रद्धांजलि के रूप में दिल्ली में प्रस्तुत किया जा सके।"
 
"एक दिन प्रदीप जी सुबह सवेरे समुद्र किनारे घूम रहे थे तब उन्हें एक पंक्ति सूझी - 'जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी'। प्रदीप जी के पास उस समय कोई कागज़ नहीं था। सो उन्होंने अपनी जेब में रखी सिगरेट की डिब्बी निकालकर उसी पर ये पंक्तियाँ नोट कर लीं। उसके बाद बैठकर उन्होंने यह गीत पूरा किया।"
 
प्रदीप को लगा सी रामचन्द्र के संगीत में इसे लता मंगेशकर गायें, तब यह बेहद प्रभावशाली रहेगा। इस सिलसिले में लता, प्रदीप और रामचन्द्र मिले।
 
यह गीत तीनों के जीवन का सबसे अहम गीत बन गया। हालांकि लता तब इस गीत को गाना नहीं चाहती थीं।
 
लता मंगेशकर ने इस गीत के बारे में एक बार कहा - "असल में उन दिनों मैं अपनी बहन मीना की 11 फरवरी, 1963 को कोल्हापुर में होने वाली शादी में काफी व्यस्त थी। इसलिए मैंने 26 जनवरी को दिल्ली जाने और इस गीत को गाने में अपनी असमर्थता दिखाई तो पंडित जी (लता प्रदीप जी को पंडित जी कहती थीं) गुस्सा हो गए। वह बोले लता नहीं तो यह गीत नहीं।"
 
"तब मैंने कहा अच्छा मैं और आशा दोनों इसे गा देंगे। लेकिन पंडित जी इसी बात पर अड़े रहे कि मैं अकेली ही इसे गाउँ। तब मैंने इसके लिए हाँ की। इसकी धुन बनी जिसे मैंने पूरी तरह मुंबई से दिल्ली तक के सफर के दौरान ही सुना।"
 
जब 'ऐ मेरे वतन के लोगों' को लता ने 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के सम्मुख गाया गया तो सभी के रोम-रोम में देश प्रेम का ज्वालामुखी उफ़ान लेने लगा। पूरे कार्यक्रम में एक अजब-सा सन्नाटा था। सभी की आँखें भर आई थीं। यहाँ तक पंडित नेहरू की आँखें भी नम थीं।
 
पंडित नेहरू ने उस कार्यक्रम के बाद लता मंगेशकर को अपने पास बुलाकर उनकी काफी प्रशंसा की। लेकिन यह बात आज भी दुख देती है कि इस गीत के रचयिता प्रदीप को उस कार्यक्रम में आमंत्रित तक नहीं किया गया था।
 
इस गीत को आए अब 57 साल हो गए हैं। अभी तक यह गीत किसी फ़िल्म का हिस्सा भी नहीं बना है। लेकिन तब से आज तक यह गीत देशभक्ति के गीतों में सर्वाधिक लोकप्रिय बना हुआ है। इस गीत का आज भी कोई सानी नहीं है।
 
असल में प्रदीप के इस गीत से जहां शहीदों को श्रद्धांजलि दी गयी वहाँ चीन से हार के बाद सेना और लोगों का मनोबल भी बढ़ा। बाद में लता मंगेशकर और प्रदीप को भारत सरकार ने सर्वोच्च फ़िल्म सम्मान दादा साहब फाल्के से सम्मानित भी किया।
 
'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों'
 
देशभक्ति गीतों की चर्चा में 'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों' भी शीर्ष गीतों में आता है। इस गीत और इसकी फ़िल्म 'हकीकत' असल में गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' के ठीक बाद से शुरू होती है।
 
'ऐ मेरे वतन के लोगों' की लोकप्रियता और सभी पर इसके प्रभाव को देखकर ही फ़िल्म 'हकीकत' बनी और कैफ़ी आज़मी ने 'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों' गीत लिखा।
 
चीन के भारत के साथ धोखे से किए गए शर्मनाक युद्ध के बाद लोगों को भारत की हार की हकीकत बताने के लिए ही फ़िल्म 'हकीकत' बनाई गई थी, जिससे भारतीय सेना का पराक्रम भी बताया जा सके और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का गौरव भी बरकरार रहे।
 
चेतन ने अपनी इस फ़िल्म को पंडित नेहरू को ही समर्पित किया था। हालांकि साल 1964 में जब 'हकीकत' प्रदर्शित हुई उससे कुछ दिन पहले ही पंडित नेहरू का निधन हो गया।
 
हालांकि 'हकीकत' इतनी बेहतरीन फ़िल्म रही कि 'अब तुम्हारे हवाले' गीत ने सभी को रोमांचित कर दिया। रफ़ी के गाये इस गीत का संगीत मदन मोहन ने दिया था। गीत के फ़िल्मांकन में पंडित नेहरू को भी दिखाया गया।
 
'मेरे देश की धरती सोना उगले'
 
मनोज कुमार की फ़िल्म 'उपकार' को प्रदर्शित हुए भी अब आधी सदी से ज्यादा हो गया है। लेकिन जब देशभक्ति की फ़िल्मों की बात हो या गीतों की तो 'उपकार' और इस फ़िल्म के गीत 'मेरे देश की धरती' की सहज ही याद हो आती है।
 
'उपकार' के साथ मनोज कुमार की एक और फिल्म 'पूरब और पश्चिम' भी देश भक्ति के गीतों के मामले में शिखर पर आती है।
 
इसका गीत - 'भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ', आज भी देश विदेश में काफी लोकप्रिय है। इंदीवर के लिखे और कल्याणजी आनंद जी के संगीत में बने इस गीत को महेंद्र कपूर ने गाकर अमर कर दिया।
 
'मेरे देश की धरती की' गीत को गुलशन बावरा ने लिखा था और इसे संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने दिया था।
 
'उपकार' फ़िल्म का निर्माण मनोज कुमार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर उनके 'जय जवान, जय किसान' नारे पर किया था।
 
यह विषय, यह फ़िल्म और यह गीत तो जबर्दस्त लोकप्रिय हुए। लेकिन अफसोस 'उपकार' जब 1967 में प्रदर्शित हुई तब तक शास्त्री जी का निधन हो गया था।
 
यहाँ बता दें मनोज कुमार अपने होम प्रॉडक्शन की फ़िल्म बनाने से पहले अपनी एक फ़िल्म 'शहीद' के कारण देशभक्ति के रंग में आ गए थे। साल 1965 की निर्माता केवल कश्यप और निर्देशक एस राम शर्मा की 'शहीद' में मनोज कुमार ने शहीद भगत सिंह की भूमिका की थी।
 
इस फ़िल्म का गीत 'मेरा रंग दे बसंती चोला' ऑल टाइम हिट है। इसी गीत में एक और गीत भी समाहित है 'ऐ वतन, ऐ वतन हमको तेरी कसम' भी अच्छा खासा लोकप्रिय रहा।
 
प्रेम धवन के संगीतबद्ध इस गीत को तब मुकेश, महेंद्र कपूर और राजेन्द्र मेहता ने गाया था। गीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इससे भी होता है कि आज भी 'रंग दे बसंती चोला' को कितने ही स्कूलों में भी गाया जाता है। बाद में कुछ और फ़िल्मों में भी इसे और भी गायक गा चुके हैं।
 
यहाँ बता दें इसी 'शहीद' फ़िल्म का प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और कवि राम प्रसाद बिस्मिल का लिखा गीत 'सरफ़रोशी की तमन्ना' भी लंबे अरसे तक खूब गाया-बजाया जाता रहा।
 
'अब के बरस तुझे धरती की रानी'
 
देशभक्ति के गीतों में एक गीत फ़िल्म 'क्रान्ति' का भी है। संतोष आनंद के लिखे इस गीत के बोल हैं, "अब के बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे"।
 
संतोष आनंद बताते हैं, "यह गीत मैंने भारत-पाक युद्ध के दौरान लिखा था। साल 1965 से 1970 के दौरान मैंने इस गीत को पहले लाल किले के कवि सम्मेलन में गाया था। मनोज कुमार ने यह गीत सुना तो वह इस गीत पर लट्टू हो गए। तब उन्होंने इसे साल 1981 में 'क्रान्ति' में लिया। महेंद्र कपूर के गाये इस गीत का संगीत लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने दिया था।"
 
संतोष आनंद इसके अलावा फ़िल्म 'तिरंगा' का भी शीर्षक गीत, 'ये आन तिरंगा, ये शान तिरंगा' भी लिख चुके हैं जो तब काफी लोकप्रिय हुआ।
 
'दिल दिया है जान भी देंगे'
इधर पिछले करीब 35 बरसों से देशभक्ति के जिस एक और गीत ने अपना जादू चलाया हुआ है वह है सुभाष घई की साल 1986 में प्रदर्शित फ़िल्म 'कर्मा' से।
 
आनंद बख्शी के लिखे इस गीत के बोल हैं, 'हर करम अपना करेंगे, ए वतन तेरे लिए, दिल दिया है जान भी देंगे, ए वतन तेरे लिए'।
 
लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने इस गीत की धुनें इतनी कर्ण प्रिय बनायी हैं कि कविता कृष्णमूर्ति, सुरेश वाडेकर, मोहम्मद अज़ीज़ और मनहर उधास के सुरों में सजे इस गीत को सुनते ही समा-सा बांध जाता है।
 
पिछले कुछ बरसों से तो चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न दल भी इस गीत को चलाकर, देश के लिए मर मिटने के अपने अपने दावे प्रस्तुत करते प्रतीत होते हैं।
 
देश भक्ति का नया रंग 'चक दे इंडिया'
 
देशभक्ति और देश प्रेम सिर्फ देश के लिए ही नहीं देश के लिए अच्छे से खेले गए खेलों और जीत के लिए भी होता है। इस बात का बड़ा एहसास कराया फ़िल्म 'चक दे इंडिया' के गीत 'चक दे इंडिया' ने।
 
साल 2007 में प्रदर्शित यशराज फ़िल्म्स की यह फ़िल्म भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी पर थी। जो कॉमनवैल्थ गेम्स की एक महिला हॉकी टीम की प्रतियोगिता से प्रेरित थी।
 
इसमें सलीम-सुलेमान के संगीत में जयदीप साहनी के लिखे गीत 'चक दे' को सुखविंदर सिंह की आवाज़ में सुनते हैं तो देश के प्रति खेल भावना, 'स्पोर्ट्स स्पिरिट्स' का ऐसा जोश आता है कि सभी चक दे इंडिया बोलकर झूमने लगते हैं।
 
इन गीतों के अलावा भी देशभक्ति के कई गीत लोगों में देश प्रेम के रंग भरते रहे हैं। इनमें फ़िल्म 'बार्डर' का 'संदेशे आते हैं', फ़िल्म 'परदेश' का 'आई लव माइ इंडिया, फ़िल्म 'रोज़ा' का 'भारत हमको जान से प्यारा है', 'वीर ज़ारा' का 'ऐसा देश है मेरा'। 'स्वदेश' का 'ये जो देस है तेरा'। 'लगान' का 'चले चलो'।
 
ऐसे ही एआर रहमान के सुर और संगीत में गैर-फ़िल्मी गीत 'माँ तुझे सलाम' तो लगातार लोकप्रियता के नए शिखर छू रहा है।
 
ऐसे ही रहमान ने कुछ बरस पहले लता मंगेशकर के साथ 'वन्दे मातरम' गीत को भी नए भव्य और आकर्षक रूप में बनाया था, वह भी तब से सभी का मन मोह रहा है।
 
इधर यह अच्छी बात है कि पिछले वर्षों में भी एक अंतराल के बाद फिर से देश प्रेम के तराने में फ़िल्मकारों की दिलचस्पी बढ़ी है।
 
जैसे फ़िल्म 'राज़ी' का 'ऐ वतन', 'मणिकर्णिका' का 'मैं रहूँ या ना रहूँ, भारत यह रहना चाहिए' जैसे गीत भी अच्छे खासे लोकप्रिय हुए। इधर गीतकार मनोज मुंतशीर भी अपने ऐसे ही कुछ गीतों के लिए सुर्खियों में हैं जिनमें फिल्म 'केसरी' का गीत 'तेरी मिट्टी', तो लगातार लोकप्रियता की नयी उड़ान भर रहा है।
 
इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसे सभी गीत बरसों से लोगों के दिलों में देशभक्ति और देश प्रेम के प्रति उमंग और उत्साह बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते आ रहे हैं।
 
ये गीत देश प्रेम का पाठ बार-बार याद दिलाने के साथ हमको अपनी जड़ों से जुड़े रहने की नसीहत भी देते हैं। हम चाहे कितने ही आधुनिक रंगों में रंग जाएँ, लेकिन 'फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी'।

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