दही जमाने की तरक़ीब किसकी खोज है?

पुनः संशोधित सोमवार, 22 जनवरी 2018 (10:57 IST)
माधवी रमानी (बीबीसी ट्रैवल)

दही हमारे खान-पान का अहम हिस्सा है। दही के बहुत से फ़ायदे गिनाए जाते हैं। इसमें कोई शक भी नहीं। दुनिया भर में बड़े पैमाने पर दही का इस्तेमाल होता है। बड़ा सवाल ये है कि दही को किसने किया?
हिंदुस्तान की बात करें तो न जाने कब से हम दही जमाते और खाते आ रहे हैं। कृष्ण भगवान तो माखनचोर और दहीचोर के तौर पर मशहूर ही हुए। लेकिन, पश्चिमी देशों में दही की शुरुआत कहां से और कब से हुई, इस पर विवाद है।

दही जमाने की शुरुआत
यूरोप में एक देश ऐसा है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने पश्चिमी सभ्यता को दही की नेमत का तोहफा दिया। कहा जाता है कि दही पूर्वी यूरोपीय देश बुल्गारिया की देन है। दही का उतना ही पुराना है जितना ख़ुद बुल्गारिया देश का इतिहास। यहां दही कई रूपों में खाई जाती है। यहां कोई भी खाना दही के बिना अधूरा है।
बहुत से बुल्गारियाई लोगों का दावा है कि अब से चार हज़ार साल पहले घुमक्कड़ जाति के लोगों ने दही जमाने की तरक़ीब निकाली थी। ये ख़ानाबदोश अपने छोटे बच्चों के साथ एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे।

ऐसे में इनके पास दूध को बचा कर रखने का कोई तरीक़ा नहीं था। लिहाज़ा उन्होंने दूध को जमाकर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इस काम के लिए वो जानवरों की खाल का इस्तेमाल करते थे। दूध को एक निश्चित तापमान पर रखा जाता था जिससे दूध में उसे जमाने वाले जीवाणु पैदा हो जाते थे। लगभग इसी तरीक़े को अपनाते हुए दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी दही जमाने का सिलसिला शुरू हुआ।
दही के बैक्टीरिया की खोज
जानकारों का ये मानना है कि दही बनाने का काम मध्य एशिया और मध्य पूर्व के इलाक़ों में अलग-अलग समय पर शुरू हुआ। बुल्गारिया, यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप में स्थित है। यहां दही के इस्तेमाल का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। यहां पर दही जमने के लिए ज़रूरी बैक्टीरिया की एक ख़ास नस्ल मिलती है। यहां का माहौल भी दही जमाने के लिए बेहद मुफ़ीद है।

दलीलें चाहे जो हों, इस बात में शक नहीं है कि बुल्गारिया ने ही पश्चिमी देशों को दही से रूबरू कराया। उसे एक कमर्शियल प्रोडक्ट बनाया। बुल्गारिया के एक वैज्ञानिक ने ही सबसे पहले दही जमने के तरीक़े पर रिसर्च की थी। वो बुल्गारिया के ट्रन इलाक़े का रहने वाला था। वैज्ञानिक का नाम था स्टामेन ग्रीगोरोव।
बुल्गारिया के इस वैज्ञानिक के नाम पर ट्रन इलाक़े में दही म्यूज़ियम भी बनाया गया है जो दुनिया में अपनी तरह का एक ही म्यूज़ियम है। ग्रिगोरोव स्विटज़रलैंड की जेनेवा यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे। वो अपने गांव से दही की एक हांडी लेकर गए और वहां रिसर्च की जिसमें दही जमने के पीछे जो बैक्टीरिया है, उसकी खोज हुई। इसका नाम दिया गया लैक्टोबैसिलस बुल्गारिकस।

लंबी उम्र का राज़
ग्रिगोरोव की रिसर्च को आधार बनाते हुए रूस के नोबेल पुरस्कार विजेता बायोलोजिस्ट एली मेचनिकॉफ ने बुल्गारिया के किसानों की लंबी उम्र का राज़ जाना। दरअसल बुल्गारिया के किसान ख़ूब दही खाते थे। उनकी उम्र भी काफ़ी हुआ करती थी। बुल्गारिया के रोडोप पर्वत पर जितने लोग रहते थे उसमें ज़्यादातर की उम्र सौ साल से ज़्यादा थी। ज़िंदगी के सौ साल पूरे करने वाले लोगों की सबसे बड़ी आबादी पूरे यूरोप में यहीं पर पाई जाती थी।
जैसे ही लोगों के बीच ये बात आम हुई कि दही खाने वालों की उम्र बढ़ जाती है, तो फ़्रांस, जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड, स्पेन, और ब्रिटेन में इसका क्रेज़ अचानक बढ़ गया। इन देशों में बुल्गारियाई दही की मांग बढ़ने लगी। देखते ही देखते यहां के लोगों के खाने का एक अहम हिस्सा बन गया।

रिवायती तौर पर बुल्गारिया में दही घरों में जमाई जाती थी। इसे मिट्टी के मटकों में ही जमाया जाता था, जैसे भारत में होता है। इन मिट्टी के मटकों को बुल्गारिया में रुकाटका कहते हैं। यहां की घरेलू औरतों की अपनी देसी तकनीक थी। लेकिन मांग पूरी करने के लिए जैसे-जैसे तकनीक का इस्तेमाल होने लगा, रवायती स्वाद भी जाता रहा।
आज हालत ये है कि हर तरह के डिब्बों में इसे पैक करके बेचा जा रहा है। बुल्गारिया के घुमक्कड़ लोग पूरे साल मौसम के मुताबिक़ कई तरह के दूध से दही तैयार करते थे। कभी भेड़ के दूध से, तो कभी गाय के दूध से, तो कभी भैंस के दूध से दही तैयार करते थे। लेकिन आज दही का एक ही मतलब है, जो भैंस के दूध से तैयार होता है।

पारंपरिक दही बनाने का काम
साल 1949 तक भी बुल्गारिया के बहुत से घरों में पारंपरिक तरीक़ों से दही बनाने का काम जारी था। लेकिन जब बुल्गारिया की दही की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग बढ़ गई तो सरकार ने डेयरी उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर लिया। बुल्गारिया की सरकार चाहती थी कि उसकी पहचान सोवियत संघ के दूसरे सहयोगी देशों से जुदा रहे और उसे ये पहचान दिला सकता थी बुल्गारिया में पारंपरिक तरीकों से तैयार किए जाने वाली दही।
इस मक़सद के लिए बुल्गारिया के अलग-अलग इलाक़ों में जाकर घरेलू दही के सैंपल लिए जाते थे। फिर उन पर नए तजुर्बे करके ज़्यादा ज़ायक़ेदार दही तैयार किया जाता था। इस तरह बाज़ार में बुल्गारिया की एक और तरह की दही उपलब्ध होने लगी। सरकार ने इसी ब्रैंड को निर्यात करना शुरू कर दिया।

दही बनाना एक कला
आज भी बुल्गारिया की सरकारी कंपनी एलबी बुल्गेरिकम अपने सहयोगी देशों जैसे जापान और दक्षिण कोरिया को बुल्गारियाई दही का कारोबार करने का लाइसेंस देती है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि बुल्गारिया के दही में जो जीवाणु हैं वो सेहत के लिए बहुत फ़ायदेमंद हैं और किसी भी एशियाई देश में उस जीवाणु की मदद से दही तैयार नहीं हो सकती। इसलिए हर साल इन बैक्टीरिया की खेप बुल्गारिया से कोरिया और जापान भेजी जाती है।
1989 में जब बुल्गारिया में कम्युनिस्ट शासन का ख़ात्मा हुआ तो बुल्गारिया में दही का कारोबार धीमा पड़ गया। पहले के दौर में पारंपरिक दही तैयार करने वाली डेयरियों की संख्या भी काफ़ी कम हो गई थी। ये संख्या तीन हज़ार से घट कर 28 इलाक़ों तक ही सिमट कर रह गई थी।

हालांकि अब स्थानीय उत्पादक अपने पारंपरिक कारोबार को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी ही एक कंपनी है हरमोनिका जो ऑर्गेनिक दही बनाकर उसका निर्यात करती है।
बुल्गारिया में दही की बहुत क़िस्में नहीं पाई जातीं, लेकिन ज़ायक़ा कई क़िस्म का मिल सकता है। यहां तक कि अगर एक ही परिवार की दो महिलाएं दही तैयार करती हैं तो दोनों की तैयार की गई दही का स्वाद अलग होगा। दही बनाना यहां के लोगों के लिए एक कला है और ये फ़न एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया जाता है।

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