ओरायन नक्षत्र तारामंडल के 6 रहस्य, रहस्यमयी है यह लोक

orian constellation
मृगशिरा का अर्थ है मृग का शीष। आकाश मंडल में मृगशिरा 5वां नक्षत्र है। यह सबसे महत्वपूर्ण नक्षत्र माना जाता है। आकाश में यह हिरण के सिर के आकार का नजर आता है। शास्त्रों के अनुसार मार्गशीर्ष महीने का संबंध मृगशिरा नक्षत्र से भी है। इन्हीं 27 नक्षत्रों में से एक नक्षत्र का नाम है मृगशिरा नक्षत्र। मगसर महीने की पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र से युक्त होती है इसलिए इस महीने को मार्गशीर्ष मास कहा जाता है। श्रीमद्भागवत में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहां हैं 'मासानां मार्गशीर्षोऽहम्' अर्थात् समस्त महिनों में मार्गशीर्ष मेरा ही स्वरूप है।


'महीनों में मैं मार्गशीर्ष व ऋतुओं में वसंत हूं'- (गीता, 10-35)

1. भारतीय शब्द : लोकमान्य तिलक के अनुसार ओरायन (मृगशीर्ष, मृगशिरा) नक्षत्र के साथ जु़ड़ी ग्रीक, पारसी व भारतीय कथाओं का अद्भुत साम्य, तीनों जातियों के एक ही मूलस्थान का प्रमाण है। ओरायन ग्रीक शब्द का मूल संस्कृत में है। मृग में वसंत बिंदु से वर्षारंभ होता है, अतः इसे अग्रहायन, अग्रायन यानी पथारंभ कहा है। 'ग' के लोप से यह अग्रायन, ओरायन बनता है। इसी तरह पारसी शब्द, पौरयानी है जो 'प' लोप करके, ओरायन बनता है। अग्रहायन, अग्रायन का अपभ्रंश 'अगहन' है जो मार्गशीर्ष मास में किसी समय, वर्षारंभ का प्रतीक है।
2. धरती से संबंध : वैज्ञानिकों ने कई सालों की रिसर्च के बाद यह पता लगाया कि 'ओरायन' एक ऐसा नक्षत्र है जिसका हमारी धरती से कोई गहरा संबंध है। भारतीय, मिश्र, मोसोपोटामिया, माया, ग्रीक और इंका आदि सभ्यताओं की पौराणिक कथाओं और तराशे गए पत्थरों पर अंकित चित्रों में इस 'नक्षत्र' संबंधी जो जानकारी है वह आश्चर्यजनन ढंग से एक समान है। वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे पूर्वज या कहें कि हमें दिशा-निर्देश देने वाले लोग 'ओरायन' नक्षत्र से आए थे। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी ने हर्बल के द्वारा इस ओरायन के सटिक चित्र खींचे और बाद में वे दुनियाभर में प्रचारित किए।

3. क्या है ओरायन कॉन्स्टलेशन (orian constellation) : भारत में 'ओरायन' नक्षत्र को 'मृगशिरा' कहा जाता है। हिंदू धर्म में मार्गशीर्ष माह और मृगशिरा नक्षत्र बहुत पवित्र माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष के नवम माह का नाम मार्गशीर्ष है। इस माह को अगहन भी कहा जाता है। सतयुग में देवों ने मार्गशीर्ष मास की प्रथम तिथि को ही वर्ष प्रारम्भ किया।

4. ओरायन के तारे : हमारी धरती से 1500 सौ प्रकाशवर्ष दूर 'ओरायन' में वैसे तो दर्जनों तारे हैं लेकिन प्रमुख 7 तारे हैं। इस तारामंडल में तीन तेजी से चमकने वाले तारे एक सीधी लकीर में हैं, जिसे 'शिकारी का कमरबंद (ओरायन की बेल्ट) कहा जाता है। सात मुख्य तारे इस प्रकार हैं- आद्रा (बीटलजूस), राजन्य (राइजॅल), बॅलाट्रिक्स, मिन्ताक़, ऍप्सिलन ओरायोनिस, ज़ेटा ओरायोनिस, कापा ओरायोनिस। इसमें आद्रा तारा, राजन्य तारा और बॅलाट्रिक्स तारा सबसे कांतिमय और विशालकाय है जो धरती से स्पष्ट दिखाई देते हैं। मृगशिरा तारामंडल में हमारी पृथ्वी जैसी हजारों पृथवियों के होने का अनुमान है।

4. भारतीय मान्यता : मृगशिरा नक्षत्र आकाश में काफी फैला हुआ है। इसके तीन चमकीले छोटे तारे एक सीधी रेखा में हैं और बड़े खूबसूरत हैं। उन्हें त्रिकांड कहते हैं। उनके कारण मृगको पहचानना बहुत सरल है। त्रिकांड के चारों ओर आयताकार चार तारे हैं और नीचे की ओर तीन छोटे-छोटे तारे हैं। त्रिकांड की बाई ओर व्याध तथा दाईं ओर रोहिणी का बड़ा तारा है और ये पांच एक सीधी रेखा में हैं। व्याध से थोड़ा ऊपर पुनर्वसु नक्षत्र के चार चमकीले तारे हैं। पुनर्वसु, रोहिणी, व आर्द्रा, नक्षत्रों की पहचान भी कर सकते हैं।

5. इस समय देखें यह ग्रह-नक्षत्र : आजकल मृगशिरा या सूर्यास्त के बाद से ही पूर्व दक्षिण क्षितिज में देखा जा सकता है। धीरे-धीरे ऊपर आकर दूसरे दिन भोर में दक्षिण पश्चिम दिशा में इसके एक-एक तारे ढलने लगते हैं। उनसे दोस्ती बढानी है तो रात में अलग-अलग समय उठकर देखते चलो कि यह आकाश में कहां कहां कैसे भ्रमण करते हैं।

6. इस नक्षत्र के अनुसार ही पनपी प्राचीन सभ्यता : इस तारामंडल के अनुसार ही धरती पर भारत, चीन, ईजिप्ट, ग्रीस, अमेरिका आदि जगह पर शहर बने हैं और आश्चर्यजनक रूप से प्राचीनकाल के हैलीपैड और एयरपोर्ट भी। ऐसे हैलीपैड जिस पर शोध करते वक्त वैज्ञानिक हैरान रह गए कि आखिर इन्हें कौनसी टेक्नोलॉजी से बनाया गया होगा, क्योंकि यह तो बस आज की आ‍धुनिक टेक्नोलॉजी से ही संभव है।



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