ग़ालिब का ख़त-38
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असदुल्ला
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क़ाज़ी अब्दुलजमील जुनून
मख़दूम-ए-मुकर्रम व मुअ़ज़्ज़म जनाब मौलवी अब्दुलजमील साहिब की ख़िदमत में बाद इबलाग़-ए-सलाम-ए-मसलून उल इस्लाम अर्ज़ किया जाता है।
मुशाअ़रा यहाँ शहर में कहीं न होता। क़िला में शहज़ादगान-ए-तैमूरिया जमा होकर कुछ ग़ज़ल लिखकर कहाँ पढ़िएगा। मैं कभी उस महफ़िल में जाता हूँ और कभी नहीं जाता। और यह सोहबत खुद दंज रोज़ा है। इसको दवाम कहाँ? क्या मालूम है अब ही न हो, अब के हो तो आइंदा न हो।
1845 ई. असदुल्ला
