0

जश्न-ए-आजादी : जमाने को नया रास्ता दिखा दिया हमने

गुरुवार,अगस्त 8, 2019
india
0
1
एक बार कह दिया तो फिर करके दिखाने वाले 'पं. चंद्रशेखर आजाद' को बचपन में एक बार अंग्रेजी सरकार ने 15 कोड़ों का दंड दिया तभी उन्होंने प्रण किया कि वे अब कभी पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। वे गुनगुनाया करते थे
1
2
होली पर रंगबिरंगी शेरो-शायरी, पढ़ें साहित्यकारों की नजर से।
2
3
जब फागुन के रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की। और डफ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
3
4
मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के एक ऐसे शहंशाह हैं जिनका शेर जिंदगी के किसी भी मौके पर इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत है गालिब की कुछ चुनिंदा शायरियां...
4
4
5
मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1717 को काला महल, आगरा में हुआ था। उनकी कलम ने दिल की हर सतह को छुआ, किसी भी मोड़ पर कतराकर नहीं निकले।
5
6
मिर्ज़ा उन बिरले शायरों में से हैं जिनको चाहे अभीष्ट प्रशंसा उनके जीवन में न मिली हो किंतु उनकी योग्यता और विद्वत्ता की धाक सभी पर जमी हुई थी। हिंदुस्तान के विभिन्न प्रदेशों में उनके शिष्य थे जिनमें उस समय के नवाब, सामंत, सरकारी पदाधिकारी सभी शामिल ...
6
7
इंदौरी की शायरी एक खूबसूरत कानन है, जहां मिठास की नदी लहराकर चलती है। विचारों का, संकल्पों का पहाड़ है, जो हर अदा से टकराने का हुनर रखता है। फूलों की नाजुकता है,
7
8

नज्म : मेरे महबूब !

सोमवार,जनवरी 9, 2017
मेरे महबूब ! तुम्हारा चेहरा मेरा कुरान है, जिसे मैं अजल से अबद तक पढ़ते रहना चाहती हूं...
8
8
9
लगाया दांव पर दिल को जुआरी है, मगर हारा कि दिल क्या, जान हारी है। पयामे-यार आना था नहीं आया, कहें किससे कि कितनी बेकरारी है। झुकाकर सर खड़े होना जरूरी सा, जहां सरकार की निकली सवारी है। कभी इक पल नजर थी जाम पर डाली, अभी तक, मुद्दतें गुजरीं, खुमारी ...
9
10
घबराइए मत…! अभी बारिश का मौसम शुरू नहीं हुआ है यह तो इंद्रदेव अपनी पिचकारी चेक कर रहे थे…होली आने वाली है रंगों से नहीं डरे...
10
11

नज़्म - कली का मसलना देखा

सोमवार,मार्च 7, 2016
रात के पिछले पहर मैंने वो सपना देखा, खि‍लने से पहले, कली का वो मसलना देखा, एक मासूम कली, कोख में मां के लेटी, सिर्फ गुनाह कि नहीं बेटा, वो थी इक बेटी, सोचे बाबुल कि जमाने में होगी हेटी, बेटी आएगी पराए धन की एक पेटी
11
12

नज़्म - कली क्यूं झरे

सोमवार,मार्च 7, 2016
मां मेरे कत्ल की तू हां क्यूं भरे? खि‍लने से पहले इक कली क्यूं झरे ?मेरे बाबुल बता, मेरी क्या ख़ता? मेरे मरने की बददुआ क्यूं करे ?
12
13
चांद तन्हा है आसमां तन्हा...चांद तनहा है आसमां तन्हा, दिल मिला है कहां-कहां तनहा, बुझ गई आस, छुप गया तारा, थरथराता रहा धुआं तन्हा
13
14
हिन्दी से जो लोग उर्दू मंचों पर आ रहे हैं, उनकी शायरी में एक अलग ही ताज़गी और अलग ही चमक है।
14
15
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता, बुझा सका है भला कौन वक्त के शोले, ये ऐसी आग है जिसमें धुआं नहीं मिलता
15
16

गजल : छलकते जाम

बुधवार,अक्टूबर 7, 2015
गोया वो मदहोश होकर मेरी कसमों से यूं मुकर से जाते हैं जब मयकदे में उनके आगे आशि‍की में जाम छलक जाते हैं इक पल को मुस्करा जाता है चेहरा मेरा बोतल की साकी में और प्याला हाथों से उलझ जाता है फिर यारि‍यां निभाने में
16
17
नई दिल्ली। उर्दू की नामचीन लेखिका हमीदा सालिम का आज निधन हो गया। वह 93 साल की थीं। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि हमीदा ने यहां जामिया नगर में अपने आवास पर दिन में करीब साढ़े तीन बजे अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। सोमवार को ...
17
18
वो आजादी बहिश्तों की हवाएं दम भरें जिसका। वो आजादी फरिश्ते अर्श पर चरचा करें जिसका। वो आजादी शराफत जिसकी खातिर जान तक दे दे। जवानी जीस्त के उभरे हुए अरमान तक दे दे। वो आजादी, परिन्दे जिसकी धुन में गीत गाते हैं। वो आजादी, सितारे जिसकी लौ में जगमगाते ...
18
19
'बहुत इंतिहाई आकर्षक आँखें, बिल्कुल हीरे की तरह चमकती हुईं। लंबे-लंबे बाल, जिन्हें वो निहायत ही दिलचस्प अंदाज़ से बार-बार पीछे की तरफ कर लेते और साथ ही एक बहुत दिलकश ज़हीन मुस्कुराहट के मालिक।' किसी शख़्स की तारीफ़ में कभी ये तमाम दिलफ़रेब बातें कही ...
19