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बड़ी खामोशी से ‘राहत’ छिन गए हम सबसे

बुधवार,अगस्त 12, 2020
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एक मेहमान आने वाला है इस क़दर खुश है उसकी मां घर में जैसे भगवान आने वाला है
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सियासत की जाने कैसी ये आग है, आज़ाद है ’शाहीन’, कैद में बाग है। उन्हें सिखा रहे हो उसूल मुहब्बत के
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तुम को हम दिल में बसा लेंगे, तुम आओ तो सही। सारी दुनिया से छुपा लेंगे, तुम आओ तो सही। एक वादा करो अब हमसे न बिछड़ोगे कभी नाज़ हम सारे उठा लेंगे, तुम आओ तो सही। बेवफ़ा भी हो सितमगर भी जफ़ा-पेशा भी हम ख़ुदा तुम को बना लेंगे, तुम आओ तो सही।
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मकर संक्रांति पर युवाओं का उत्साह और उमंग देखते ही बनती है। पतंग पर शेरो शायरी का भी काफी प्रचलन है। हम लाए हैं पतंग पर 20 चुनींदा शायरी...
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मिर्ज़ा ग़ालिब उन बिरले कवियों में से हैं जिनको चाहे अभीष्ट प्रशंसा उनके जीवन में न मिली हो किंतु उनकी योग्यता और विद्वत्ता की धाक सभी पर जमी हुई थी।
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गालिब को उनके हासिद अक्सर फहश ख़त लिखा करते थे- किसी ने एक ख़त मे गालिब को मां की गाली लिखी। पढ़कर गालिब मुस्कुराए और कहने लगे- उल्लू को गाली देना भी नहीं आती
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आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे
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वो आजादी, मिली हमको बड़ी कुर्बानियां देकर। लुटाकर अपने मोती, लाजपत की पसलियां देकर। भगत, उधम, सुभाष, आजाद क्या खोए नहीं हमने। लहू से सींच दी 'जलियांवाला' की जमीं हमने
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एक बार कह दिया तो फिर करके दिखाने वाले 'पं. चंद्रशेखर आजाद' को बचपन में एक बार अंग्रेजी सरकार ने 15 कोड़ों का दंड दिया तभी उन्होंने प्रण किया कि वे अब कभी पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। वे गुनगुनाया करते थे
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होली पर रंगबिरंगी शेरो-शायरी, पढ़ें साहित्यकारों की नजर से।
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जब फागुन के रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की। और डफ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
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मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के एक ऐसे शहंशाह हैं जिनका शेर जिंदगी के किसी भी मौके पर इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत है गालिब की कुछ चुनिंदा शायरियां...
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मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1717 को काला महल, आगरा में हुआ था। उनकी कलम ने दिल की हर सतह को छुआ, किसी भी मोड़ पर कतराकर नहीं निकले।
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मिर्ज़ा उन बिरले शायरों में से हैं जिनको चाहे अभीष्ट प्रशंसा उनके जीवन में न मिली हो किंतु उनकी योग्यता और विद्वत्ता की धाक सभी पर जमी हुई थी। हिंदुस्तान के विभिन्न प्रदेशों में उनके शिष्य थे जिनमें उस समय के नवाब, सामंत, सरकारी पदाधिकारी सभी शामिल ...
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इंदौरी की शायरी एक खूबसूरत कानन है, जहां मिठास की नदी लहराकर चलती है। विचारों का, संकल्पों का पहाड़ है, जो हर अदा से टकराने का हुनर रखता है। फूलों की नाजुकता है,
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नज्म : मेरे महबूब !

सोमवार,जनवरी 9, 2017
मेरे महबूब ! तुम्हारा चेहरा मेरा कुरान है, जिसे मैं अजल से अबद तक पढ़ते रहना चाहती हूं...
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लगाया दांव पर दिल को जुआरी है, मगर हारा कि दिल क्या, जान हारी है। पयामे-यार आना था नहीं आया, कहें किससे कि कितनी बेकरारी है। झुकाकर सर खड़े होना जरूरी सा, जहां सरकार की निकली सवारी है। कभी इक पल नजर थी जाम पर डाली, अभी तक, मुद्दतें गुजरीं, खुमारी ...
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घबराइए मत…! अभी बारिश का मौसम शुरू नहीं हुआ है यह तो इंद्रदेव अपनी पिचकारी चेक कर रहे थे…होली आने वाली है रंगों से नहीं डरे...
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नज़्म - कली का मसलना देखा

सोमवार,मार्च 7, 2016
रात के पिछले पहर मैंने वो सपना देखा, खि‍लने से पहले, कली का वो मसलना देखा, एक मासूम कली, कोख में मां के लेटी, सिर्फ गुनाह कि नहीं बेटा, वो थी इक बेटी, सोचे बाबुल कि जमाने में होगी हेटी, बेटी आएगी पराए धन की एक पेटी
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