होली पर रंगबिरंगी रोमांटिक शेरो-शायरी


* होली पर रंगबिरंगी शेरो-शायरी, पढ़ें साहित्यकारों की नजर से
होली पर किसी ने कहा है-

खाके- शहीदे-नाज से भी होली खेलिए
रंग इसमें है गुलाब का बू है अबीर की।

* एक मशहूर शायर हुए हातिम उनकी नज़्में भी होली के रंग से बच नहीं पाईं। वे कहते हैं-

मुहैया सब है अब अस्बाबे होली।
उठो यारों भरों रंगों से झोली।
* उर्दू शायरी के स्वर्णिम युग के मशहूर शायर मीर की होली पर एक कृति है 'साकी नाम होली', जिसमें शायर का उन्माद और होली की उन्मुक्तता अधिक मुखरित हुई है-

आओ साकी, शराब नोश करें
शोर-सा है, जहां में गोश करें
आओ साकी बहार फिर आई
होली में कितनी शादियां लाई

* उर्दू शायरी में होली के रंग को निहारें तो सबसे पहले याद आते हैं फायज देहलवी। औरंगजेब के कथित कट्टरवादी सांप्रदायिक दौर में इस मशहूर शायर ने दिल्ली की होली अपनी शायरी में कुछ यूंं दोहराई है-
ले अबीर और अरगजा भरकर रुमाल
छिड़कते हैं और उड़ाते हैं गुलाल
ज्यूं झड़ी हर सू है पिचकारी की धार
दौड़ती हैं नारियां बिजली की सार

* आसफुद्दौला के समय में मीर लखनऊ में थे। उन्होंने उसके दरबार की होली का वर्णन करते हुए कहा है-

होली खेला आसफुद्दौला वजीर।
रंग सोहबत से अजब हैं खुर्दोपीर।
* अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने भी अपनी रचनाओं में पारंपरिक रंगों से फाग खेला है-

क्यों मो पे रंग की मारी पिचकारी
देखो कुंवरजी दूंगी मैं गारी...

* नज़ीर अकबराबादी ने होली पर करीब एक दर्जन नज़्में कही हैं और क्या खूब कही हैं-

गुलजार खिले हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो
कपड़ों पर रंग की छींटों से खुशरंग अजब गुलकारी हो
मुंह लाल गुलाबी आंखें हों और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो
तब देख नजारे होली के।
* एक मशहूर शायर हुए हातिम उनकी नज़्में भी होली के रंग से बच नहीं पाईं। वे कहते हैं-

मुहैया सब है अब अस्बाबे होली।
उठो यारों भरों रंगों से झोली।

* हरिवंशराय बच्चन क हते हैं होली है तो...

जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो! - हरिवंशराय बच्चन

 

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