इतिहास की जरूरत किसे है?

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हमारे अपने यहाँ लोग तरह-तरह के कम्प्यूटर कोर्स करके नौकरियाँ पा रहे हैं। ये लोग आज और बिल्कुल अभी वाली स्थिति में जीना चाहते हैं। बेशक वे अपने भविष्य के बारे में भी सोचते हैं, लेकिन अपने अतीत के बारे में बहुत कम सोचते हैं।

ठीक है आदमी को अपने अतीत का बंधक नहीं बनना चाहिए, लेकिन समूची मनुष्य जाति के अतीत में भी दिलचस्पी रखना चाहिए कि हम कौन थे, कहाँ से आए थे, किन-किन पड़ावों से गुजरे थे और किस-किस मिट्टी, पानी, हवा और आग ने हमें गढ़ा था। इतिहास से हमें इसका जवाब मिलता है। यही कारण है कि इतिहास पढ़ा और पढ़ाया जाना चाहिए।

हाल ही में इतिहास में रुचि पैदा करने के लिए वीडियो गेम्स का विचार रखा गया है, क्योंकि विद्वानों को लगता है कि यह तरीका बच्चों को इतिहास की तरफ आकर्षित करेगा। हालाँकि वीडियो-गेम्स के जरिए इतिहास की मोटी-मोटी जानकारी तो मिल जाएगी, लेकिन इतिहास नहीं पढ़ाया जा सकेगा।

वह संभव ही नहीं है। उसके लिए तो शिक्षाविदों को नए तरीके ढूँढने होंगे। बहरहाल, यह अपने आप में एक सुखद बात है कि इतिहास और उसे पढ़ाए जाने की जरूरत के बारे में सोचा जा रहा है।

इतिहास हमारा परिचय चंद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, अशोक और अकबर आदि महान सम्राटों से कराता है तो यह भी बताता है कि वे भी थे तो मनुष्य ही और उनमें मनुष्य की दया और करुणा थी, तो हिंसा और प्रतिहिंसा भी थी। दीनता भी थी तो क्रूरता भी थी।
इतिहास पढ़ना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इतिहास मनुष्य जाति के संघर्ष, उसकी सिफत और उसके व्यवहार के बारे में हमें बताता है, जो हमारे बौद्धिक विकास के लिए जरूरी है। इतिहास से हम जानते हैं कि जिस दुनिया को आज हम देख रहे हैं, वह अपने मौजूदा रूप में कैसे हमारे सामने आई। हमारा देश कैसे बना? उसमें कहाँ-कहाँ से लोग आए? कैसे धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और सभ्यताओं ने जन्म लिया और कैसे वे मिट गईं?

इतिहास से हमें पता चलता है कि पाषाण युग में आदमी कैसे रहता था? कैसे पत्थर के औजारों का प्रयोग होता था? कैसे मिट्टी और काली मिट्टी के बर्तन बनाए जाते थे? कैसे शिकार किया जाता था? उस युग के आदमी का प्रकृति से क्या संबंध था? कैसे तांबे और लोहे के प्रयोग ने मनुष्य के जीवन में क्रांति ला दी? कैसे खेती शुरू हुई, पशुओं को पालतू बनाया गया, कबीले और समाज बने?

कैसे आग, पहिए और भाषा का अविष्कार हुआ? चित्रकला और संगीत का आविष्कार हुआ? मनुष्य सभ्य होना शुरू हुआ? राष्ट्र और राज्य बने? युद्ध लड़े गए और साम्राज्य बने? कैसे राजाओं ने आतंक पैदा किया और दूसरे राज्यों को जीतने के अभियान जारी रखे? कैसे इन युद्धों में बेकसूर मारे और लूट लिए जाते थे?

कैसे राजमहलों में षड्यंत्र होते थे, निष्ठाएँ खरीदी और बेची जाती थीं? राजाओं के रनवास और बादशाहों के हरम होते थे। स्वयंवर रचाए जाते थे और अपहरण किए जाते थे और आदिवासी समाजों में बराबर का दर्जा रखने वाली स्त्री बाद में कैसे वस्तु में बदल गई थी। इतिहास पढ़ना किसी जासूसी नॉवेल पढ़ने की तरह रोमांचक भी होता है। इतिहास गुत्थियों को सुलझाता है और हमें एक तरह से रोशनी भी देता है।

इतिहास हमारा परिचय चंद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, अशोक और अकबर आदि महान सम्राटों से कराता है तो यह भी बताता है कि वे भी थे तो मनुष्य ही और उनमें मनुष्य की दया और करुणा थी, तो हिंसा और प्रतिहिंसा भी थी। दीनता भी थी तो क्रूरता भी थी। अन्याय था तो न्याय के लिए चाह भी थी। ऐश्वर्य था तो दासता भी थी।

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-मधुसूदन आनंद आज की पीढ़ी की में दिलचस्पी कम से कम होती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण तो यह है कि इतिहास पढ़ने से आपको जैसे देश में अध्यापक की ही नौकरी मिल पाती है और वह भी मुश्किल से।
आज दुनियाभर में मानविकी अर्थात साहित्य, भाषा, इतिहास और दर्शन पढ़ने वाले छात्रों की संख्या कम होती जा रही है, जबकि साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित विषयों की बेहद माँग है।
दुनियाभर में शताब्दियों तक दास प्रथा कायम थी। दासों के बाजार लगते थे। उन्हें खरीदा और बेचा जाता था। बांदियाँ और लौंडियाँ होती थीं जो चुटकी बजाते ही आदाब बजा ले जाती थीं। इतिहास हमारी आँखें खोलता है। मानवीय गतिविधियाँ कई तरह से कई स्तरों पर चलती रहती हैं। इतिहास उनके अर्थ खोलता है और उनमें रुझान और प्रवृत्तियाँ ढूँढता है। वह तमाम घटनाओं को तरतीब से इकट्ठा करता है, उन्हें आपस में जोड़ता है और उनकी व्याख्या करता है।

 

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