इस कोरोना संकट काल में जीवन कैसा जिएं

सचमुच घातक है, लेकिन इससे संक्रमित लोग ठीक भी हो गए हैं। यदि आपने लोगों से मिलना-जुलना और भीड़ वाले क्षेत्र में जाना छोड़ दिया है तो सबसे बड़ा बचाव यही है। मास्क लगाना और दो गज की दूरी बनाए रखना भी जरूरी है। इस में कैसा जीएं आओ जानते हैं इस संबंध में संक्षिप्त में जानकारी।

तपस्वी-सा जीवन : एक तपस्वी ना तो ज्यादा खाता है और ना कम। न तो ज्यादा सोता है और ना कम। सप्ताह में एक बार उपवास करता है। उत्तम भोजन ही ग्रहण करता है। प्राणायाम, योग और ध्यान करता है। आपको भी यह करना चाहिए। एक दिन का पूर्ण उपवास या व्रत हमारे भीतर के रोगाणु और विषैले पदार्थ को बाहर निकालकर हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।

रस को ज्यादा अपनाएं : अन्य से बढ़कर रस को ब्रह्म माना है। तुलसी, अदरक, नारियल, संतरा, नीम, धनिया, हल्दी, नींबू, शहतूत, शहद, बेल आदि का ज्यूस लेते रहने से सभी तरह के विटामिन और मिनरल मिलते रहते हैं। आप चाहे तो गिलोय, कड़वा चिरायता को मिलाकर काढ़ा भी बनाकर सप्ताह में 2 बार पी सकते हैं। प्राचीन भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल के लोग समय समय पर इसका सेवन करते रहते थे। संकट के इस काल में इम्युनिटी बढ़ाए रखने के लिए यह जरूरी है।

अन्न-जल : पूर्ण रूप से शाकाहार जीवनशैली अपनाएं और सूर्यास्त के पूर्व ही भोजन कर लें। मिताहार करें, मिताहार का अर्थ सीमित आहार। मिताहार के अंतर्गत भोजन ताजा, अच्छी प्रकार से घी आदि से चुपड़ा हुआ होना चाहिए। मसाले आदि का प्रयोग इतना हो कि भोजन की स्वाभाविक मधुरता बनी रहे। फल और हरी ताजा सब्जियों का प्रयोग करें। गेहूं की रोटी का कम ही प्रयोग करें। मक्का, जो और ज्वार के आटे की रोटी भी खाएं। उत्तम भोजन ही हमें रोगाणु से लड़ने की सुरक्षा और गारंटी देता है।

उषापान करें : उषा पान का आयुर्वेदिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। हमारे ऋषि-मुनि और प्राचीनकाल के लोग उषा पान करके सेहतमंद बने रहते थे। प्राचीन भारत के लोग जल्दी सोते थे और जल्दी उठते थे। वे सभी सूर्योदय के पूर्व ही उठ जाते थे। आठ प्रहरों में से एक रात्रि के अंतिम प्रहर को उषा काल कहते हैं यह सूर्योदय के पूर्व का समय होता है। उस दौरान उठकर पानी पीने को ही उषा पान कहते हैं। इस काल में जानने पर जहां शुद्ध वायु मिलती है वहीं पानी पीने से शरीर में जमा मल तुरंत ही बाहर निकल जाता है। उषापान करने से कब्ज, अत्यधिक एसिडिटी और डाइस्पेसिया जैसे रोगों को खत्म करने में लाभ मिलता है।

तांबें में पीए पानी और पीतल या चांदी में खाएं खाना : तांबे के लोटे में पीए पानी। रात में तांबे के बरतन में रखा पानी सुबह पीएं तो अधिक लाभ होता है। वात, पित्त, कफ, हिचकी संबंधी कोई गंभीर रोग हो तो पानी ना पीएं। अल्सर जैसे कोई रोग हो तो भी पानी ना पीएं। पीतल के बर्तन में खाना खाने से खाने की गुणवत्ता बढ़ जाती है।

सौ दवाई और एक घुमाई : पहले के लोग प्रात: जल्दी उठते और जल्दी सो जाते थे। इसीलिए वे प्रात: काल का भ्रमण करते थे। प्रात: यदि दौड़ नहीं सकते तो तेज कदमों से चले, परंतु ध्यान रखें कि रात में किसी भी प्रकार से कसरत, व्यायाम ना करें बल्कि रात में टहलना सेहत के लिए फायदेमंद रहता है। खासकर भोजन करने के बाद थोड़ा टहल लें। कहते भी हैं कि सौ दवाई और एक घुमाई।

संयम और साहस : संकट काल में व्यक्ति में घबराहट बढ़ जाती है। घबराहट से बुद्धि खो जाती है और व्यक्ति निर्णय शक्ति को खो देते है। ऐसे में संयम, संकल्प, धैर्य, साहस और शांति का परिचय देना होता है। संयम और साहस से हर संकट पर विजय प्राप्त की जा सकती है। इसीलिए कभी भी संयम ना खोएं।

आत्मनिर्भर बनें : पुराने लोग कहते थे कि कोना, सोना, मौना और धोना जिसने भी अपनाया वह सुखी रहा। कोना अर्थात घर का एक कोना पकड़ लो वहीं रहो, ज्यादा इधर उधर मत घुमो, सोना अर्थात वहीं सोएं और नींद से समझौता ना करें। मौना अर्थात अधिक से अधिक मौन रहो, मौन रहने से मन की शक्ति बढ़ती और व्यक्ति विवादों से भी बचा रहता है। धोना अर्थात अपने कपड़े और शरीर को अच्छे से साफ सुधारा रखें। प्रतिदिन अच्छे से स्नान करें। पुराने लोग नाक, मुंह, घुटने, कोहनी, कान के पीछे, गर्दन के पीछे सहित सभी छिद्रों को अच्छे से साफ करते थे और अपना काम खुद ही करते थे।

योजनाओं भरा जीवन : संकट काल में भविष्य को ध्यान में रखते हुए आपके पास बेहतर प्लान होना चाहिए। प्रभु श्रीराम के पास बेहतर योजना थी लेकिन रावण के पास नहीं। योजना से ही संकट काल से निपटा जा सकता है। यदि आपके पास कोई योजना नहीं है तो आप जीवन में अपने लक्ष्य को नहीं भेद सकते हो। लक्ष्य तभी भेदा जा सकता है जबकि एक बेहतर योजना हो जिस पर आप कार्य कर सकें।

रिश्तों का सम्मान और सेवा : संकट के इस दौर में हर रिश्ता महत्वपूर्ण है। पारिवारिक सदस्यों और रिश्तों का सम्मान करना सीखें। संकट काल में आपके संबंध ही आपके काम आते हैं पैसा या रुतबा नहीं। आप लोगों की मदद करेंगे तो लोग आपकी भी मदद करेंगे।

सकारात्मकता : संकट के काल में खुद की सोच को सकारात्मक बनाकर रखें। नकारात्मक विचार हमारे मस्तिष्‍क में स्वत: ही आते हैं उन्हें सोचना नहीं पड़ता है, जबकि सकारात्मक बातों को सोचने के लिए जोर लगाना होता है। जब भी आपके मस्तिष्क में कोई नकारात्मक विचार आए तो आप तुरंत ही एक सकारात्मक विचार सोचे। यह प्रक्रिया लगातार दोहराते रहेंगे तो एक दिन नकारात्मक विचार आना बंद हो जाएंगे। नकारात्मक विचार आपके संकट को बढ़ाते हैं और सकारात्मक विचार संकट को घटाते हैं।

हर परिस्थिति के लिए रहें तैयार : आप हर परिस्थिति के लिए पहले से ही तैयार रहें। अच्छी या बुरी कैसी भी परिस्थिति हो उसे स्वीकार करें। परिस्थिति कैसी भी हो भय और चिंता को छोड़कर मानसिक रूप से दृढ़ हो जाएं। गीता में कहा गया है। न जन्म तुम्हारे हाथ में है और न मृत्यु। न अतीत तुम्हारे हाथ में है और न भविष्य। तुम्हारे हाथ में है तो बस ये जीवन और ये वर्तमान। इसलिए जन्म और अतीत कर शोक मत करो और मृत्यु एवं भविष्य की चिंता मत करो। निर्भिक होकर बस कर्म करो। निष्काम कर्म करो। तुम्हारा कर्म ही तुम्हारा भविष्य है। सबकुछ ईश्‍वर पर छोड़ दो।

हमारा दिमाग और हमारा मन अर्थात बुद्धि और मन यदि इसने मान लिया की मैं बीमार हूं तब बीमारी नहीं होगी फिर भी आप बीमारी हो जाएंगे, क्योंकि दिमाग वही काम करना है जिसे मन स्वीकार कर लेता है। दिमाग शरीर का हिस्सा है और मन आपके सूक्ष्म शरीर का हिस्सा है। आप अंगूठा तभी हिला पाते हैं जबकि दिमाग के तंत्र को मन आदेश देता है। मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। इसलिए मन की शक्ति को समझे।



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