देशभक्ति का जज़्बा और देश पर मर-मिटने का जुनून विरासत में मिला था क्रिस्टीन स्कारबेक को




: एक थी क्रिस्टीन की रोमांचक कहानी

सन् 1939, सितंबर का महीना था। केप टाउन से एक समुद्री जहाज इंग्लैंड के लिए आ रहा था। जहाज पर हर रोज गुमशुदा वस्तुओं की सूची एक तख़्ते पर लगती थी जैसे की लॉस्ट - रेड बैग, वन हैट...वगैरा वगैरा।

28 सितंबर की सुबह उस तख़्ते पर लगी सूची कुछ इस तरह थी।

1. लॉस्ट- वन शर्ट एंड...

2. लॉस्ट- वारसॉ!!!

1939 तक यूरोप भर में हिटलर ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया था। झेकोस्लोव्हाकिया तथा ऑस्ट्रिया दबोच कर जर्मन गिद्ध की नज़रे अब पोलैंड पर थी। कई वर्षों तक रूसी हुकूमत तले दबा पोलैंड बस अभी कुछ ही समय पहले स्वतंत्र हुआ था। स्वतंत्रता की किरणें सारे देश में उत्साह की नई उमंग लाई थी।

वारसॉ पूर्वी यूरोप के एक महत्वपूर्ण शहर के रूप में उभर रहा था। कला, साहित्य और संगीत एक बार फिर से पनपने लगा, व्यापार बढ़ने लगा। सब कुछ अच्छा हो रहा था के ऐसे में जर्मनों ने पोलैंड पर अचानक हल्ला बोल दिया। जर्मनी के साथ-साथ रूसी फौजे भी पूर्वी सीमा लांघ कर पोलैंड में आ धमकी। पुलिस सेना और जनता का प्रतिकार कमज़ोर पड़ गया। करीबन साठ हजार सैनिक मारे गए। जर्मन परचम आखिरकार पोलैंड पर लहराने लगा।

इंग्लैंड की ओर चले उस समुद्री जहाज पर एक पुलिस लड़की अपने पति के साथ सफ़र कर रही थी। उस लड़की का नाम था क्रिस्टीन स्कारबेक! वारसॉ हारने की ख़बर लाखों पुलिस लोगों की ज़िंदगी में उथलपुथल लाने जा रही थी। उनके जीवन का रुख़ बदलने वाली थी।

पोलैंड के एक नामी गिरामी ख़ानदान में क्रिस्टीन जन्म हुआ और बड़े लाड प्यार से उसकी परवरिश की गई। उसके पिता ने कभी उसे अपने बेटों से कम नहीं समझा। किताबी शिक्षा के साथ-साथ क्रिस्टीन घुड़सवारी, बंदूक चलाना, स्कीइंग और गिर्यारोहण में भी प्रशिक्षित हो रही थी। स्कीइंग और गिर्यारोहण में तो उसने अच्छी-खांसी महारत हासिल की। शानो-शौकत, पैसा और तालीम के साथ अपने पिता से क्रिस्टीन को देशभक्ति का भरपूर जज़्बा और देश के लिए मर-मिटने का जुनून भी विरासत में मिला था।

पोलैंड पर हिटलर के कब्ज़े की ख़बर क्रिस्टीन के लिए एक बड़ा धक्का थी। उस ख़बर ने उसे झंझोड़ के रख दिया। पर क्रिस्टीन टूट कर बिख़रने वालों में से नहीं थी। वे तो यह सोचने में व्यस्त हो गई कि अब क्या किया जाए। इंग्लैंड पहुंचते-पहुंचते क्रिस्टीन के दिमाग़ में एक प्लान बन गया।

लंदन में तुरंत ही उसने ब्रिटिश इंटेलिजंस सर्विस से संपर्क किया। वैसे तो इंग्लैंड जर्मनी के ख़िलाफ़ सैनिक कार्रवाई करने की फ़िराक़ में था ही, पर उनके पास कोई ठोस योजना नहीं थी। क्रिस्टीन ने गुप्तचर बन कर पोलैंड में घुसने का प्रस्ताव सिक्रेट इंटेलिजंस सर्विस (एस.आय.एस.) के सामने रखा। दो दिन के बाद नामक यह पुलिस लड़की ब्रिटिश सीक्रेट सर्विस एजेंट की तौर पर बूडापेस्ट के लिए रवाना हो गई।

पोलैंड भले ही नाज़ियों के चंगुल में था पर पड़ोसी देश हंगरी अभी तक आज़ाद था। पोलैंड में अपना खुफ़ियां काम कैसे करना हैं इसका प्लान लिए क्रिस्टीन बूडापेस्ट में आई थी। सीमा के उस पार हिटलर की ज्यादतियां दिन पर दिन बढ़ रही थी। क़त्ल, बलात्कार, फांसी ये सब तो आम बातें हो चुकी थी। जनता का मनोबल टूट चूका था। कही से कोई मदद आए ये उम्मीद भी नहीं बची थी। क्रांतिकारियों की थोड़ी-बहुत भूमिगत संगठनाएं थी जो गुप्त रूप से कार्यरत तो थी, पर उनमें न कोई सुसूत्रता थी और न लड़ने के लिए कोई हथियार।

क्रिस्टीन का उद्दिष्ट अब साफ़ था। पुलिस जनता का मनोबल बढ़ाना ये उनके कार्य की शुरुआत थी। इसके लिए जगह-जगह बिख़रे पड़े पुलिस देशभक्तों के संघटनों का आपस में और उनका और एस.आय.एस. से समन्वय जोड़ना बेहद जरूरी था।

पर ये सारे काम करने के लिए पोलैंड में कैसे पहुंचा जाएं? नाज़ी व्यस्त उस देश में कड़ी नाकाबंदी थी। जगह-जगह गेस्टापो की पुलिस चील की नज़र जमाए बैठी थी। लेकिन इस समस्या पर भी तोड़ निकालने के लिए एक अफ़लातून प्लान हमारी नायिका के पास तैयार था। बचपन से लेकर जवानी तक पोलैंड की टाट्रा पहाड़ियों में क्रिस्टीन ने खूब स्कीइंग और पर्वतारोहण किया था। बरसों का स्कीइंग का अनुभव अब उसके काम आने वाला था। टाट्रा की पहाड़ी राहें क्रिस्टीन को घर ले जाने के लिए तैयार थी।

सन् 1940 फरवरी का जानलेवा बर्फीला मौसम था। दो दिन लगातार चलते, स्कीइंग करते, चढ़ते, उतरते, बचते-बचाते आखिरकार क्रिस्टीन ने स्लोवाकिया के रास्ते पोलैंड की सीमा पार की और एक नया नाम, नई पहचान लिए छिपते-छिपाते वारसॉ आ पहुंची।


वारसॉ आने के बाद क्रिस्टीन क्रांतिकारियों के गुटों से संपर्क स्थापित करने में जुट गई। अगले कुछ ही महीनों में उसकी गतिविधियों ने अच्छा-खासा जोर पकड़ लिया। अलग-अलग संघटनों से मेलजोल बढ़ाकर उनको एक सूत्र में बांधना, नाज़ी टुकड़ियों के सरगर्मियों पर नज़र रखना, सेना की यातायात, उनके हथियार और गोला-बारूद के भंड़ार की ठिकानों का पता लगाना। सारी जानकारी क्रिस्टीन एक माइक्रो फिल्म में रिकॉर्ड करती थी। फिर दस्तानों की सीवन में उस माइक्रो फिल्म को छिपाकर फिर से पहाड़ी रास्तों से चढ़ते-उतरते वह हंगरी लेके आती थी। जान हथेली पर लिए क्रिस्टीन अपना काम कर रही थी। इस सफ़र में उनका कई लोगों ने साथ दिया। उनमें से सबसे महत्वपूर्ण थे आरजे (एंड्रयू) कोवल्स्की! यह निडर और बहादुर नौजवान पोलैंड के सेना में लेफ्टिनंट था। पोलैंड की हार उसके दिल में नासूर बन के चुभ रही थी। क्रिस्टीन की तरह एंड्र्यू भी अपने वतन के लिए जान न्यौछावर करने के लिए तैयार था। आनेवाले कुछ समय के लिए दोनों एक-दूसरे के लिए सब कुछ बन गए...। दोस्त, साथी, हमसफ़र और प्रेमी भी।

पोलैंड के पराजित सेना के हजारों युद्धबंदी हिटलर के कब्ज़े में थे। इन बंदियों की नियति तय थी। हिटलर के फायरिंग स्क्वाड्स बंदूक ताने होशियार थी। आने वाला कोई भी पल इन बहादुर सिपाहियों के लिए आखिरी पल हो सकता था। वायुसेना के कुशल पायलट्स, आधुनिक हथियार चलाने में प्रशिक्षित स्थल सेना के सिपाही, सारे बंदी बनकर अपनी मौत का इंतज़ार कर रहे थे। इन युद्धबंदियों को कैद से निकालकर पोलैंड से बाहर सुरक्षित स्थान पर ले जाना एंड्रयू ने अपना मिशन बना लिया। क्रिस्टीन ने इस मिशन में एंड्रयू का कंधे से कंधा मिलाए साथ दिया। ऐसी मान्यता हैं की एंड्रयू ने कुल मिलाकर लगभग पांच हज़ार से भी ज्यादा कैदियों को नाज़ी और गेस्टापो से बचाकर सुरक्षित रूप से बाहर निकाला।

एंड्रयू और क्रिस्टीन अपने काम में निडरता के साथ-साथ सावधानी बी बरत रहे थे लेकिन जैसे दिन-महीने गुजरतें रहे दोनों की गतिविधियां गेस्टापो की नज़र में आने लगी। दोनों का नाम मोस्ट वांटेड लिस्ट पर आ गया। एक दिन जिस बात का डर था वही हुआ, एंड्रयू और क्रिस्टीन को शक़ की बिनाह पर गिरफ़्तार कर लिया गया।

पुलिस घंटो उन्हें टार्चर करती रही पर दोनों के मुंह से उफ़ तक नहीं निकली, जानकारी उगलना तो बहुत दूर की बात थी। दोनों अपनी जुबां नहीं खोलेंगे यह तो तय था। अब या तो उनको वहीं गोली मार कर ख़त्म करना था या तो रवानगी होनी थी कंसंट्रेशन कैंप में। पुलिस सोच ही रही थी कि क्या किया जाए, उसी वक़्त क्रिस्टीन के तेज़ दिमाग़ में एक कल्पना बिजली की तरह चमक गई। गिरफ़्तार होने के वक़्त क्रिस्टीन को सर्दी और खांसी हुई थी, इस बात का फायदा उसने लिया। गार्ड का ध्यान बस एक सेकंड भर के लिए ही हटने की देर थी कि क्रिस्टीन ने अपनी जीभ दातों तले झटके से काटी। उनका मुंह खून से सन गया। मुंह से आता खून देख कर गार्ड्स चौंक गए। उन्हें डर लगा की कही इस लड़की और उसके साथी को टीबी तो नहीं हैं। टी बी जैसी संसर्ग की बीमारी का डर अकल पर भारी पड़ गया और क्रिस्टीन एंड्रयू के साथ जेल से रिहा कर दी गई।

इस बार जान तो बच गई पर दोनों का भेद अब खुल गया था। उनका पोलैंड ही नहीं बल्कि यूरोप के किसी भी शहर में रहना भी खतरा बन चुका था। कुछ समय तक उनका जंग के कार्यक्षेत्र से दूर रहना जरूरी था। हंगरी जो अब तक आज़ाद था, अब वह भी जर्मनी के साथ जुड़ गया था। क्रिस्टीन को अब बुडापेस्ट से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया। बहरहाल, एक दिन ब्रिटिश राजदूत की मदद से जैसे-तैसे क्रिस्टीन बुडापेस्ट से बाहर निकलने में कामयाब हो गई।

समय का पहिया एक बार फिर घुमा। क्रिस्टीन एक बार फिर अपनी मातृभूमि से दूर हो गई और एक बार फिर नई पहचान और नया पासपोर्ट लेकर वह अपने अगले मिशन का इंतज़ार करने लगी। क्रिस्टीन स्कारबेक अब क्रिस्टीन ग्रेनविले बन चुकी थी।

अगले दो साल तक क्रिस्टीन कैरो, इस्ताम्बुल, सिरिया, जेरूसलम सफ़र करती रहीं। अपना ठिकाना बदलती रही। उन दो सालों में उसके पास कुछ ख़ास काम, मिशन नहीं था। क्रिस्टीन नामक तूफ़ान को निष्क्रियता बर्दाश्त नहीं हो रही थी। वह बेताब हो रही थी किसी बवंडर से भिड़ने के लिए, बेक़रार थी फिर से जंग के मैदान में उतरने के लिए। ऐसे में एक सुनहरा मौका क्रिस्टीन के पास चल के आया। इंग्लैंड में प्रधानमंत्री के पद पर विंस्टन चर्चिल विराजमान हो चुके थे। उनका फ़ौलादी समर्थन पाकर ब्रिटिश इंटेलिएंस सर्विस और भी मज़बूत हो चली थी। 1940 में ब्रिटिश इंटेलिएंस सर्विस के तहत स्पेशल ऑपरेशन्स एग्जीक्यूटिव (एस.ओ.ई.) नामक एक संगठन की स्थापना की गई। दुश्मन के इलाकों में जासूसी करना, उनकी सैनिकी टुकड़ियों पर अचानक छापे मारना, क्रांतिकारी संघटनाओं का निर्माण करना, उनको हथियार सप्लाई करना ये एस.ओ.ई. का मुख्य कार्य था। एस.ओ.ई. और क्रिस्टीन , एक-दूसरे के लिए बिलकुल अनुरूप थे। परफेक्ट मैच!!

जल्द ही क्रिस्टीन का बाकायदा सैनिकी प्रशिक्षण शुरू हो गया। बंदूक चलाना, पैराशूटिंग, हैंड ग्रनेड का प्रयोग करना इसके साथ-साथ वायरलैस संदेश, सांकेतिक भाषा, जासूसी के लिए रूप बदलना इन सब में क्रिस्टीन माहिर होती चली गई।

गत दो वर्षों में फ्रांस सहित लगभग सारा यूरोप हिटलर ने अपने कब्ज़े में कर लिया था। लाखों लोग क़त्ल हो चुके थे और कई लाख बेग़ुनाह कंसन्ट्रेशन कैंपस में रोज मर रहें थे। फ़्रांस में फोर्सेस ऑफ द इंटीरियर (एफ.एफ.आय) जिनको रेजिस्टेंस ग्रुप्स भी कहा जाता था, नाज़ियों का कड़ा मुक़ाबला कर रहे थे। इन सैनिकों को एस.ओ.ई. अपना पूरा सहयोग दे रहा था। एस.ओ.ई. का फ़्रांसिसी एजेंट था फ्रांसिस कॉमेट।

स्थानीय लोगों से एफ.एफ.आय के रेजिस्टेंस ग्रुप्स के लिए सहयोग जुटाना और उनको स्वतंत्रता अभियान में जोड़ना, हथियार, गोला-बारूद इंग्लैंड से मंगवाना और उसको एफ.एफ.आय के सैनिकों के सुपुर्द करना इन कामों के लिए फ्रांसिस ने लंदन हेड क्वार्टर्स से अपने लिए एक साथी एजेंट की मांग की।

फ़रवरी 1944 की रात फ़्रांस के दक्षिणी क्षेत्र के किसी कोने में एक शख्स पैराशूट से लैंड हुआ। वह शख्स और कोई नहीं, वह थी हमारी क्रिस्टीन स्कारबेक। जो अब क्रिस्टीन ग्रेनविले नाम से जानी जाती थी। अगले कुछ समय के लिए क्रिस्टीन बन गई फ्रांसिस कॉमेट की नई सहायक, सहकर्मी और प्रेमिका भी।

क्रिस्टीन बड़ी सफ़ाई से फ्रेंच भाषा बोल लेती थी। कुछ ही दिनों में स्थानीय लोगों से वह अच्छी तरह घुल मिल गई। नाज़ी सैनिकों के यातायात के नक़्शे, उनके हवाई अड्डों की जानकारी हासिल करना, साथ ही साथ मित्र राष्ट्रों के पैराट्रूपर्स से मिली रसद रातोंरात इकठ्ठा करना और उसे सुरक्षित जगह पहुंचाना ये कार्य भी क्रिस्टीन बहुत जोश से करने लगी।

जब से फ़्रांस जर्मनी के कब्जे में आया था, हजारों फ़्रांसिसी सैनिक और नागरिक नाज़ियों के डर से ज़बरदस्ती जर्मन सेना में भर्ती हो गए थे। इन लोगों को अपने साथ करना और स्वतंत्रता संग्राम में जोड़ना क्रिस्टीन का एक अहम् कार्य था। अगले कुछ महीनों में क्रिस्टीन फ़्रांस के दक्षिण पूर्वी प्रदेश में हवा के तेज़ लहर-सी घूम रही थी। गेस्टापो की आंखों में धूल झोंक कर जंगल, पहाड़ियों के रास्ते क्रिस्टीन सैनिकों की टुकड़ियों से मिल रही थी, उनका मनोबल बढ़ाकर उन्हें अपने साथ कर रही थी। उसकी मेहनत आखिरकार रंग लाई और जल्द ही भारी मात्रा में फ़्रांसिसी सैनिक जर्मनी का साथ छोड़ अपने हथियारों के साथ रेजिस्टेंस ग्रुपके साथ जुड़ गए।

6 जून 1944 को मित्र राष्ट्रों की क़रीबन दो लाख की अलाइड फ़ौज नॉर्मैंडी के किनारे आ पहुंची और आज़ादी की निर्णायक जंग शुरू हो गई। इस जंग में अलाइड फ़ौज का जबरदस्त साथ दिया फ़्रांसिसी रेजिस्टेंस ग्रुप्स ने।

क़रीबन छह करोड़ लोगों की मृत्यु, खंडहर बने शहर, हताहत समाज, तहस-नहस वर्तमान और अंधकारमय भविष्य का बोझ समूचे विश्व पर डाल कर ये भयानक युद्ध अंतत: समाप्त हुआ।

ब्रिटिश सरकार ने क्रिस्टीन के अनुपम शौर्य के लिए उसे जॉर्ज मैडल तथा फ़्रांस सरकार ने Croix de guerre पुरस्कार देकर सम्मानित किया।

बेमिसाल ख़ूबसूरती, तेज तलवार-सी बुद्धि, जांबाज व्यक्तित्व और देश पर मर मिटने का जुनून..., क्रिस्टीन की जीवनगाथा किसी रोमांचकारी फिल्म से कम नहीं है।

कहा जाता हैं की सच्चाई कभी कभी कथा-उपन्यास से भी अधिक दिलचस्प होती है। क्रिस्टीन की जीवनी बिलकुल ऐसी ही है। किसी दंतकथा की तरह।
इतिहास के अनगिनत पन्नों में जाने ऐसी कितनी कहानियां कब की खो चुकी है। उन्हीं में से एक है यह कहानी। कहानी सच्चे देशप्रेम की, कहानी असामान्य शौर्य की, निडर साहस की। कहानी एक चमचमाते बिजली की, एक सनसनाते तूफ़ान की, यह कहानी है....क्रिस्टीन स्कारबेक-ग्रेनविले की !!!


 

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