एक्सप्लेनर: बंगाल में ममता के समर्थन में महिलाओं और मुस्लिम वोटरों का आखिर क्यों हुआ ध्रुवीकरण?

Author विकास सिंह| Last Updated: सोमवार, 3 मई 2021 (16:12 IST)
बंगाल में ममता बनर्जी ने सत्ता में धमाकेदार वापसी की है। भाजपा के लाख दावों के बाद ममता बनर्जी ने अकेले दम पर पिछली बार से अधिक सीटें जीतकर भाजपा को चारों खाने चित्त कर दिया। बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी ने रिकॉर्ड 47.93 फीसदी वोटों के साथ 213 सीटों पर अपना कब्जा जमाया है। टीएमसी को मिला वोट प्रतिशत 2019
के लोकसभा चुनाव की तुलना में लगभग आठ फीसदी अधिक है। वहीं 2016 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को 44.91 फीसदी वोट मिले थे।

बंगाल की चुनावी राजनीति के जानकर कहते हैं कि ममता की प्रचंड जीत में महिला और मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी भूमिका थी। 2011 और 2016 के विधानसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी को सबसे ज्यादा वोट इन्हीं मतदाताओं का मिला था। ‘बंगाल को चाहिए अपनी बेटी’ के नाम पर चुनावी मैदान में
उतरने वाली ममता बनर्जी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है।
बंगाल की 7 करोड़ 32 लाख कुल वोटरों में से महिला मतदाताओं की संख्या करीब 3 करोड़ 59 लाख है, जबकि मुस्लिम मतदाताओं की तादाद लगभग 2 करोड़ 46 लाख है। चुनाव नतीजों का फौरी तौर का आंकलन करे तो टीएमसी को 84 फीसदी के आसपास महिलाओं ने वोट दिए। 2011 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें,तो टीएमसी को 84.45 फ़ीसदी महिला वोट पड़े,जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में 82.06 फ़ीसदी महिला वोट पड़े, जिनमें टीएमसी को 34 सीटों पर और बीजेपी को 2 सीटों पर जीत मिली। वर्ष 2016 में महिला वोट शेयर 83.13 रहा और टीएमसी फिर से सत्ता में आई, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में यह वोट शेयर 81.7% रहा। जिसके चलते टीएमसी को 22 सीटों पर दी जीत दर्ज हुई, जबकि बीजेपी 18 सीटें जीतने में कामयाब रही।
दरअसल ममता बनर्जी ने बंगाल की आधी आबादी वाले महिला मतदाताओं को साधने के लिए इस बार 50 महिला उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा। टीएमसी ने महिलाओं के लिए राज्य में कन्याश्री, रुपाश्री, साबुज साथी और मातृत्व शिशु अवकाश जैसी तमाम योजनाएं शुरू की। जिनका लाभ बड़े पैमाने पर यहाँ की महिलाओं को हुआ। जहां कन्याश्री योजना में 13-18 वर्ष की लड़कियों को ₹1000 की छात्रवृत्ति मिलती है,तो वहीं रुपाश्री स्कीम में गरीब लड़कियों को ₹25000 की धनराशि दी जाती है, जबकि साबुज साथी स्कीम के तहत लड़कियों को साइकिल और मातृत्व शिशु अवकाश के लिए सरकारी कर्मचारी महिलाओं को 2 साल की छुट्टी देने का प्रावधान भी ममता सरकार किया है। चुनाव परिणा बताते हैं कि महिला वोटर एक साथ टीएमसी के साथ नजर आया।

बंगाल में ममता की जीत में मुस्लिम और मतुआ समुदाय का वोटबैंक एक साथ टीएमसी के साथ जाना है। चुनाव नजीतों का
विश्लेषण बताता है कि ममता के पक्ष में वोटरों का ध्रुवीकरण हुआ और मुस्लिम बाहुल्य मालदा ,मुर्शिदाबाद,उत्तर व दक्षिण दिनादपुर में टीएमसी ने 36 सीटों पर जीत हासिल की। बंगाल चुनाव में मुस्लिम वोटरों का ममता की पार्टी
के समर्थन में ध्रुवीकरण में CAA
की
भी अहम रोल माना जा रहा है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान ममता खुलकर अपने मंचों से CAA को बंगाल में नहीं लागू करने का एलान करते हुई दिखाई दी।

अगर पिछले चुनाव के
आंकड़ों को देखे तो साल 2006 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे को मुस्लिमों का 46 फीसदी, कांग्रेस को 25 फीसदी और टीएमसी को 22 फीसदी मत हासिल हुआ,जिसमें टीएमसी ने 30 सीटें जीती।वर्ष 2011 में टीएमसी और वामदल के बीच 7 फीसदी मुस्लिम मतों का अंतर रहा, लेकिन ममता को 294 में से 184 सीटों पर जीत हासिल हुई,वहीं वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी को 40 फीसदी मुस्लिम मतों के साथ 34 सीटों पर जीत मिली,लेकिन 2016 में वाम मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन को मात्र 38 फीसदी ही वोट मिले, तब टीएमसी ने 211 सीटों पर जीत हासिल की थी। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी को मुसलमानों का 70 फीसदी वोट हासिल हुआ, लेकिन उसे 42 में से मात्र 22 सीटों पर जीत मिल सकी।
बंगाल के 30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं को साधने के लिए 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया । इसके अलावा 79 अनुसूचित जाति और 17 अनुसूचित जनजाति उम्मीदवारों को टिकट देकर ममता ने अपनी सियासी रणनीति के आसरे हर वर्ग को साधने की कोशिश की । चुनाव नतीजे बताते है कि ममता की जीत में महिलाओं और मुस्लिम वोटरों का ध्रुवीकरण होने के साथ सॉप्ट हिंदुत्व के कार्ड का सीधा लाभ मिला और अब एक बार फिर
पश्चिम बंगाल में टीएमसी की सरकार बनने जा रही है।




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