हिन्दू धर्म की कहानी-8
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वैवस्वत मनु के काल के प्रमुख ऋषि:- वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, भारद्वाज, मार्कंडेय, अगस्त्य आदि।
वैवस्वत मनु की शासन व्यवस्था में देवों में 5 तरह के विभाजन थे- देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व। दरअसल ये 5 तरह की मानव जातियां थीं। प्रारंभ में ये सभी जातियां हिमालय से सटे क्षेत्रों में ही रहती थीं फिर धीरे-धीरे वहां से नीचे फैलने लगीं।
जहां तक सवाल यूरोपीय, चीन और अफ्रीकी मूल के लोगों का है कि इनकी सभी के रूप, रंग और शारीरिक संरचना भिन्न है। लेकिन भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, अरब, इसराइल आदि और उसके आसपास के देशों के लोग एक ही मूल से निकले हैं।
तब हिमालय से सिंधु, सरस्वती नदी और ब्रह्मपुत्र निकलती थी जिसकी कई सहायक नदियां होती थीं, जो संपूर्ण अखंड भारत को उर्वर प्रदेश बनाती थीं। यमुना उस काल में सरस्वती की सहायक नदी थी। गंगा का अवतरण भागिरथ के काल में हुआ। मानव प्रारंभ में इन नदियों के आसपास ही रहा, फिर उसके कुछ समूह ने पश्चिम एशिया की ओर कदम बढ़ाकर अरब, मिश्र, इराक और इसराइल में अपना नया ठिकाना बनाया।
वैवस्वत मनु के कुल के लोग जब धरती पर फैल गए, तब उन्होंने अपने-अपने अलग- अलग कुल की शुरुआत की और उनमें से कुछ लोग अपने मूल धर्म और संस्कृति को छोड़कर मनमाने देव और देवता निर्मित करने लगे और अपने अलग पुरोहित नियुक्त करने लगे। तब पहली बार मानवों में धर्म के आधार पर विभाजन शुरू हुआ।
वे लोग जो खुद को वैदिक धर्म का मानते थे उन्होंने खुद को आर्य कहना शुरू कर दिया, तब स्वाभाविक ही दूसरे अनार्य घोषित हो गए। यह वैदिक और स्थानीय संस्कृति व परंपरा की लड़ाई की शुरुआत थी। इस लड़ाई के चलते ही बना आर्यावर्त, ब्रह्मदेश और भारत बंटने लगा जनपदों में। लेकिन इस बंटवारे और लड़ाई को ऋषियों ने अच्छी तरह से संचालित किया। लड़ाई के और भी कई कारण होते थे। युद्ध नहीं होता तो अन्य दर्शन, धर्म और विज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती। उस काल में गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र के विचारों की लड़ाई दशराज्ञ युद्ध में बदल गई और इससे दो तरह की सभ्यताओं का जन्म हुआ। एक वह जो लोकतंत्र में विश्वास रखती थी और दूसरी वह जो एकतंत्र में विश्वास रखती थी। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वाले विश्वामित्र इस युद्ध में हार गए।

