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त्रिशूर पूरम 2026: केरल की सांस्कृतिक विरासत पूरमों के पूरम का भव्य शंखनाद

thrissur pooram The picture depicts decorated elephants within the temple courtyard, with devotees celebrating in front of them.
Thrissur Pooram 2026: जब दक्षिण भारत के केरल राज्य में 'मेदम' का महीना आता है और चंद्रमा 'पूरम' नक्षत्र के साथ अपनी जुगलबंदी शुरू करता है, तब त्रिस्सूर की धरती पर उतरता है- त्रिशूर पूरम। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि रंगों, संगीत, आस्था और हाथियों की शाही शान का ऐसा महाकुंभ है, जिसे 'सभी पूरमों का राजा' (The Mother of all Poorams) कहा जाता है। त्रिस्सूर के हृदय में स्थित ऐतिहासिक वडक्कुनाथन मन्दिर इस दिव्य महोत्सव का साक्षी बनता है।

1. देवताओं का दिव्य मिलन

त्रिशूर पूरम की सबसे सुंदर परंपरा इसकी समावेशी भावना है। उत्सव के दौरान त्रिस्सूर के आसपास के सभी प्रमुख मंदिरों और उनके देवी-देवताओं को भगवान वडक्कुनाथन (शिव) को अपनी पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। यह एक ऐसा दृश्य होता है मानो पूरा देवलोक धरती पर एक साथ उत्सव मनाने उतर आया हो।
 

2. संगीत की गूँज: चेंडा मेलम और पञ्चवाद्यम्

इस पर्व की आत्मा यहाँ का संगीत है। जब सैकड़ों कलाकार एक साथ 'चेंडा मेलम' और 'पञ्चवाद्यम्' (केरल के पारंपरिक वाद्य यंत्र) की थाप छेड़ते हैं, तो पूरा शहर एक जादुई कंपन से भर जाता है। ढोल और मंजीरों की ये लयबद्ध गूँज हज़ारों की भीड़ के दिल की धड़कन बन जाती है, जिसे सुनकर रोम-रोम पुलकित हो उठता है।

3. स्वर्ण मंडित गजराज: वैभव का प्रतीक

त्रिशूर पूरम की पहचान है- इसकी विशाल और भव्य शोभायात्रा। इस उत्सव में 50 से भी अधिक हाथियों को सम्मिलित किया जाता है। इन हाथियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वे इंद्र के ऐरावत हों।
स्वर्णाभूषण: हाथियों को 'नेट्टिपट्टम' (माथे पर पहने जाने वाले सुनहरे आभूषणों) से सजाया जाता है।
कुडामट्टम: सजे हुए हाथियों के ऊपर रंग-बिरंगी रेशमी छतरियों को बदलने की प्रतियोगिता (कुडामट्टम) दर्शकों की साँसे रोक देती है।
 

4. आसमान में रंगों की होली (आतिशबाजी)

त्रिशूर पूरम का समापन केवल जमीन पर नहीं, बल्कि आसमान में भी होता है। यहाँ की आतिशबाजी (Vedikkettu) पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। घंटों तक चलने वाला यह प्रकाश का खेल अंधकार को चीरते हुए विश्वास और विजय का संदेश देता है।
 

5. मुख्य जानकारी (Quick Facts):

स्थान: वडक्कुनाथन मन्दिर परिसर, त्रिस्सूर, केरल।
प्रमुख आकर्षण: हाथियों की कतारें, पारम्परिक वाद्य संगीत, और भव्य आतिशबाजी।
महत्व: यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि केरल की समृद्ध कला और संस्कृति का सबसे बड़ा प्रदर्शन मंच भी है।
निष्कर्ष: यदि आप भारत की असली भव्यता और अध्यात्म के संगम को महसूस करना चाहते हैं, तो 2026 का त्रिशूर पूरम आपके जीवन का सबसे यादगार अनुभव साबित हो सकता है।
 
स्वामीये शरणम अय्यप्पा!
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