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Durga Visarjan 2025: शारदीय नवरात्रि में विसर्जन का महत्व

पं. हेमन्त रिछारिया
मंगलवार, 30 सितम्बर 2025 (13:45 IST)
Navratri Visarjan 2025: हमारे सनातन धर्म में हर पर्व का एक ख़ास महत्त्व होता है। देवी विसर्जन या गणेश विसर्जन का भी बहुत गूढ़ अर्थ है। देवी या गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन हमारी साधना की प्रगति को इंगित करता है। जब साधना का प्रथम चरण होता है तब हमें किसी ना किसी आधार की; किसी ना किसी अवलम्बन की आवश्यकता होती है किन्तु जब साधना की पूर्णता होनी होती है तब हमें सारे आधार गिराने होने होते हैं, सारे आकार विसर्जित करने पड़ते हैं तभी हम उस निराकार को जान पाते हैं।ALSO READ: Shardiya navratri 2025: शारदीय नवरात्रि पर नवमी की देवी सिद्धिदात्री की कथा, मंत्र और पूजा विधि
 
निराकार से मेरा तात्पर्य है जिसका कोई एक निश्चित आकार ना हो अपितु सारे आकर उसी के हों, वही सच्चे अर्थों में निराकार है। यह विसर्जन की क्रिया उसी का संकेत मात्र है कि जिस देवी प्रतिमा की हमने इतने दिनों तक साकार रूप में पूजा की अन्तिम दिन उसी आकार को जाकर विसर्जित कर समष्टि से एकाकार कर आए।ALSO READ: Durga Navmi 2025: शारदीय नवरा‍त्र‍ि की नवमी कब है, जानें सही तिथि, पूजा मुहूर्त और विधि

पहले सिर्फ़ एक प्रतिमा हमारे लिए आराध्य थी किन्तु विसर्जन के पश्चात पूरी स्रष्टि ही हमारे लिए परमात्मा की प्रतिमा का प्रकट स्वरूप बन कर आराध्य हो जाती है। मेरे देखे जब क्षुद्र मिटता है तभी विराट मिलता है। देवी-विसर्जन के साथ ही नौ दिनों से चले आ रहे शारदीय नवरात्रि समाप्त जाएंगे। 
 
हमारी सनातन परंपरा में विसर्जन का विशेष महत्व है। विसर्जन अर्थात् पूर्णता, फ़िर चाहे वह जीवन की हो, साधना की हो या प्रकृति की। जिस दिन कोई वस्तु पूर्ण हो जाती है उसका विसर्जन अवश्यंभावी हो जाता है। आध्यात्मिक जगत् में विसर्जन समाप्ति की निशानी नहीं अपितु पूर्णता का संकेत है।ALSO READ: शारदीय नवरात्रि की अष्टमी नवमी की तारीख, तिथि, शुभ मुहूर्त और दशहरे पर रावण दहन के समय
 
देवी-विसर्जन के पीछे भी यही गूढ़ उद्देश्य निहित है। हम शारदीय नवरात्र के प्रारंभ होते ही देवी की प्रतिमा बनाते हैं, उसे वस्त्र-अलंकारों से सजाते हैं। नौ दिन तक उसी प्रतिमा की पूर्ण श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना करते हैं और फ़िर एक दिन उसी प्रतिमा को जल में विसर्जित कर देते हैं। 
 
विसर्जन का यह साहस केवल हमारे सनातन धर्म में ही दिखाई देता है, क्योंकि सनातन धर्म इस तथ्य से परिचित है कि आकार तो केवल प्रारंभ है और पूर्णता सदैव निराकार होती है। यहां निराकार से आशय आकारविहीन होना नहीं अपितु सम्रगरूपेण आकार का होना है। निराकार अर्थात् जगत के सारे आकार उसी परमात्मा के हैं। 
 
मेरे देखे निराकार से आशय है किसी एक आकार पर अटके बिना समग्ररूपेण आकारों की प्रतीती। जब साधना की पूर्णता होती है तब साधक आकार-कर्मकांड इत्यादि से परे हो जाता है। तभी तो बुद्ध पुरुषों ने कहा है- 'छाप तिलक सब छीनी तोसे नैना मिलाय के...।' नवरात्रि के नौ दिन इसी बात की ओर संकेत हैं कि हमें अपनी साधना में किसी एक आकार पर रूकना या अटकना नहीं है अपितु साधना की पूर्णता करते हुए हमारे आराध्य आकार को भी विसर्जित कर निराकार की उपलब्धि करना है। 
 
जब इस प्रकार निराकार की प्राप्ति साधक कर लेता है तब उसे सृष्टि के प्रत्येक आकार में उसी एक के दर्शन होते हैं जिसे आप चाहे तो परमात्मा कहें या फिर कोई और नाम दें, नामों से उसके होने में कोई फर्क नहीं पड़ता। साधना की ऐसी स्थिति में उपनिषद् का यह सूत्र अनुभूत होने लगता है- सर्व खल्विदं ब्रह्म और यही परमात्मा का एकमात्र सत्य है।
 
-ज्योतिर्विद् पं. हेमंत रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केंद्र 
संपर्क : astropoint_hbd@yahoo.com
 
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