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राम जन्मभूमि मंदिर केस फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, निर्मोही अखाड़े ने दाखिल की याचिका

ayodhya ram mandir trust meeting
​Ram Janmabhoomi Temple Case: श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के प्रबंधन, वित्तीय लेन-देन और धार्मिक परंपराओं को लेकर एक बार फिर मामला देश की शीर्ष अदालत में पहुंच गया है। श्री पंच रामानंदी निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पुनर्गठन, वित्तीय लेनदेन के फोरेंसिक ऑडिट और रामानंदी परंपरा के तहत पूजा-सेवा बहाल करने की मांग की है।
 
​अखाड़े का सीधा आरोप है कि मौजूदा ट्रस्ट एक निजी संस्था की तरह काम कर रहा है और केंद्र सरकार ने 2019 के ऐतिहासिक फैसले की मूल भावना का पूरी तरह पालन नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 27 जुलाई को होगी। 
 
​निर्मोही अखाड़े के अधिवक्ता तरुणजीत वर्मा (दिवंगत अधिवक्ता रणजीत लाल वर्मा के पुत्र) ने जानकारी दी कि 18 जुलाई की देर शाम यह एप्लिकेशन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है। यह आवेदन 'मोहम्मद सिद्दीकी बनाम सुरेश दास' (सिविल अपील नंबर 10866 और 10867) के अंतर्गत दर्ज कराया गया है।
 
​याचिका में 8 मुख्य बिंदुओं पर राहत मांगी गई है, जिनमें प्रमुख हैं- 9 नवंबर 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का सही ढंग से पालन किया जाए। विगत दिनों मंदिर में चढ़ावे और चंदे से जुड़ी अनियमितताओं व चोरी की घटनाओं को देखते हुए पूरे वित्तीय लेन-देन का फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए। इसके साथ ही याचिका में यह भी कहा गया है कि 5 जनवरी 1950 और 16 फरवरी 1982 की घटनाओं के दौरान कुर्क (Attach) की गई भगवान रामलला की अष्टधातु व चांदी की मूर्तियों सहित सभी वस्तुओं को एक स्थान पर रखकर पूजा कराई जाए। यदि इसमें कोई कठिनाई हो, तो वे वस्तुएं निर्मोही अखाड़े को सौंपी जाएं।
 
अखाड़े ने मांग की है कि ट्रस्ट के कामकाज की निगरानी के लिए हाईकोर्ट के स्तर की एक मॉनिटरिंग कमेटी गठित की जाए जो यह देखे कि ट्रस्ट सही ढंग से कार्य कर रहा है या नहीं। इसके साथ ही राम मंदिर में सभी धार्मिक अनुष्ठान, सेवा, भोग और पूजा 'रामानंदी संप्रदाय' की प्राचीन परंपराओं के अनुसार हों और रामानंदी बैरागी संप्रदाय के संतों को ट्रस्ट के निर्णयों की निगरानी का अधिकार मिले।

​2019 के फैसले के किन निर्देशों का दिया गया हवाला?

​याचिका में नवंबर 2019 के संविधान पीठ के फैसले के पैराग्राफ 804 और 805(4) का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। अखाड़े का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश दिया था कि विवादित स्थल पर निर्मोही अखाड़े की ऐतिहासिक उपस्थिति को ध्यान में रखते हुए, उसे मंदिर के प्रबंधन में उचित भूमिका और ट्रस्ट में उपयुक्त प्रतिनिधित्व दिया जाए। अब अदालत के रुख के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि शीर्ष अदालत ट्रस्ट के पुनर्गठन और प्रबंधन को लेकर कोई नया दिशा-निर्देश जारी करती है या नहीं।
लेखक के बारे में
संदीप श्रीवास्तव
संदीप श्रीवास्तव करीब 25 वर्ष से ज्यादा समय से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वेबदुनिया के लिए उत्तर प्रदेश में स्ट्रिंगर के रूप में कार्य करते हैं। .... और पढ़ें
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