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POCSO कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, कहा- लड़का-लड़की को भागने से सरकार कैसे रोकेगी

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सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) अधिनियम के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि कई मामलों में जब किशोर-किशोरियां आपसी सहमति से घर छोड़कर चले जाते हैं, तो माता-पिता अपने तथाकथित 'सम्मान' की रक्षा के लिए उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज करा देते हैं। 
 
जस्टिस बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा कि सरकार किसी लड़के और लड़की को साथ भागने से कैसे रोक सकता है? 15 से 18 साल की उम्र बेहद संवेदनशील और नई चीजें आजमाने की उम्र होती है। यह प्रयोग और भावनात्मक समझ विकसित होने का भी दौर होता है।
 
अदालत ने सोमवार को कहा कि जब किसी लड़के और लड़की के बीच संबंध हो और वे साथ चले जाएं, तो हर मामले को स्वतः पॉक्सो का केस नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि 15 से 18 वर्ष की उम्र बेहद संवेदनशील होती है और यह प्रयोग एवं भावनात्मक समझ विकसित होने का दौर होता है। ऐसे में हर मामला POCSO का मामला माना जाना उचित नहीं हो सकता। अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।

किशोरों की निजता से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई

 
सुप्रीम कोर्ट किशोरों के निजता के अधिकार (Right to Privacy of Adolescents) से जुड़े स्वत: संज्ञान (Suo Motu) मामले की सुनवाई कर रहा था। यह मामला कलकत्ता हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले के बाद शुरू हुआ था, जिसमें किशोरियों से अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने और "दो मिनट के सुख" के लिए रिश्तों में न पड़ने जैसी टिप्पणी की गई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को रद्द कर दिया था।
 

किस मामले से शुरू हुआ विवाद

वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि मूल मामला एक नाबालिग लड़की और 25 वर्षीय युवक के साथ भाग जाने का था। उन्होंने कहा कि अब वह मामला सुलझ चुका है। अदालत द्वारा गठित समिति और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लड़की से बातचीत की थी। रिपोर्ट में POCSO मामलों में व्यवस्था की कई खामियों की ओर संकेत किया गया। दीवान ने बताया कि लड़की अपनी इच्छा से युवक के साथ रहना चाहती थी और दोनों का एक बच्चा भी है।
 
 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 6 से 18 वर्ष की उम्र में कई किशोर-किशोरियां आपसी संबंध बनाते हैं और साथ चले जाते हैं। ऐसे मामलों में माता-पिता अपने सम्मान की रक्षा के लिए आपराधिक मुकदमे दर्ज करा देते हैं। बाद में अदालतों को आरोपियों को बरी करना पड़ता है।"

किशोरों के लिए जागरूकता जरूरी

माधवी दीवान ने अदालत से कहा कि किशोरों के कल्याण और बाल संरक्षण के लिए प्रभावी व्यवस्था की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार 17-18 वर्ष के युवाओं को जेल भेज दिया जाता है, इसलिए कम उम्र से ही जागरूकता और संवेदनशीलता विकसित करना जरूरी है।

कक्षा 6 से POCSO जागरूकता की तैयारी

केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि यदि उसकी सिफारिशें स्वीकार होती हैं तो सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कक्षा 6 से चरणबद्ध तरीके से POCSO और किशोर शिक्षा (Adolescent Education) शुरू की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक हाईकोर्ट में पहले से ही बाल अधिकारों से जुड़ी समितियां मौजूद हैं, इसलिए मामलों की निगरानी राज्य सरकारें भी कर सकती हैं। अदालत ने केंद्र सरकार द्वारा अलग से निगरानी की आवश्यकता पर सहमति नहीं जताई।
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