कार चलाने के शौकीन हैं पंडित भीमसेन जोशी

मुंबई/नई दिल्ली (भाषा)| भाषा|
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शास्त्रीय गायिकी, कार चलाने और फुटबॉल के बीच संबंध को तलाशना है तो खयाल गायक पंडित भीमसेन जोशी की ओर देखिए। उनके बारे में बहुत कम लोगों को पता होगा कि वे कार चलाने से लेकर सुधारने तक में माहिर हैं।


उनके दोस्त तो यहाँ तक कहते हैं कि पंडित भीमसेन जोशी यदि शास्त्रीय गायक नहीं होते तो गैरेज में मोटर गाड़ियों को दुरुस्त कर रहे होते।

कुछ वर्ष पहले की बात है। मुंबई से पुणे तक का सफर टैक्सी से करते समय पंडितजी ने टैक्सी ड्राइवर को अपनी तान से मंत्रमुग्ध कर दिया, लेकिन टैक्सी ड्राइवर को क्या पता था कि पंडितजी बिगड़ी गाड़ी को सुधारने में भी उतने ही माहिर हैं। घाट पर चढ़ते समय गाड़ी का इंजन बंद हो गया। ड्राइवर उस समय हक्का-बक्का रह गया, जब गाड़ी ठीक करने में पंडितजी ने उसकी मदद की और गाड़ी एकदम दुरुस्त होकर चल पड़ी।

पंडित भीमसेन जोशी को कार चलाने का बड़ा शौक है और वे अपने कार्यक्रम पेश करने देश में विभिन्न स्थानों पर किसी अन्य साधन के बजाय कार से जाना पसंद करते हैं। खेलों में फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम जगजाहिर है और फुटबॉल में वे उसी तरह खो जाते हैं जैसे अपने संगीत में।


अपने पिता ब्रह्मानंद का भजन 'जो भजे हरि को सदा वही परम पद पाएगा' पंडित भीमसेन जोशी को बेहद पसंद है। बाद में पंडित जोशी का गाया यह भजन लोगों को भी खूब भाया।
भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुनर्जागरण की अगुआई करने वाले किराना घराने के 86 वर्षीय पंडित भीमसेन जोशी ने गायिकी की विभिन्न विधाओं को अपनाया और अद्भुत तरीके से पेश किया।

पद्म सम्मान समेत कई सम्मान हासिल कर चुके पंडित जोशी वैसे तो किराना घराने के गायक हैं, लेकिन अन्य घरानों की शैली को आत्मसात करते हुए उन्होंने अपनी एक अलग ही शैली विकसित की।
पंडित जोशी अपने भजनों में गायिकी की विधा खयाल के लिए जाने जाते हैं, लेकिन बुलंद आवाज होने के बावजूद उन्होंने ठुमरी भी गाई है, जिन्हें गाने के लिए बेहद महीन आवाज सबसे अच्छी मानी जाती है।

लता मंगेशकर और बाल मुरली कृष्णा के साथ गाए 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' गीत ने लाखों भारतीयों के दिलों में स्पंदन पैदा की और एक समय यह गीत दूरदर्शन की पहचान बन गया था।
उनका पूरा नाम भीमसेन गुरुराज जोशी है। कर्नाटक के धारवाड़ जिले के गडाक गाँव में एक कन्नड़ परिवार में चार फरवरी वर्ष 1922 में उनका जन्म हुआ। उनके पिता शिक्षक थे।

गुरु-शिष्य परंपरा का पालन करते हुए भीमसेन जोशी ने वर्ष 1933 में 11 वर्ष की आयु में घर छोड़ दिया। गुरु की खोज में उन्होंने ग्वालियर, लखनऊ और रामपुर में तीन वर्ष बिताए, लेकिन उनके पिता ने उन्हें खोज निकाला और घर वापस ले आए।
भीमसेन जोशी अपनी युवावस्था में किराना घराने के अब्दुल करीम खान से बेहद प्रभावित हुए। पंडित रामभान कुंदगोलकर के आश्रय में उन्होंने अपनी कठोर साधना आरंभ की। पंडित रामभान कुंदगोलकर को सवाई गंधर्व के रूप में भी जाना जाता है। सवाई गंधर्व अब्दुल करीम खान के शिष्य थे।

उन्नीस वर्ष की आयु में पंडित जोशी ने अपना पहला कार्यक्रम पेश किया। कन्नड़ और हिंदी में उनके कुछ भक्ति गीत जब जारी हुए तब उनकी आयु महज बीस वर्ष थी।
पंडित भीमसेन जोशी ने अपने गुरु की स्मृति में सवाई गंधर्व संगीत समारोह के नाम से एक वार्षिक शास्त्रीय संगीत समारोह की नींव रखी। पुणे में हर साल दिसंबर में यह संगीत समारोह आयोजित किया जाता है।

पंडित भीमसेन जोशी कला और संस्कृति जगत से आने वाले ऐसे छठे व्यक्ति हैं, जिन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारतरत्न के लिए चुना गया।
उनसे पहले सत्यजित रे, एमएस सुब्बुलक्ष्मी, पंडित रविशंकर, लता मंगेशकर और उस्ताद बिस्मिल्ला खान को भारतरत्न से नवाजा जा चुका है। पंडित भीमसेन जोशी 1998 में एमएस सुब्बुलक्ष्मी के बाद दूसरे शास्त्रीय गायक और पहले खयाल गायक हैं, जिन्हें भारतरत्न से नवाजा गया है।



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