पंजाब में प्रधानमंत्री की सुरक्षा चूक पर बवंडर स्वाभाविक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पंजाब यात्रा में सुरक्षा चूक का मामला जिस तरह के राजनीतिक बवंडर का विषय बना है उसमें आश्चर्य का कोई कारण नहीं। ऐसी घटना कभी भी होती तो मामला विवाद का विषय बनता ही।


इसके पहले शायद ही ऐसी कोई घटना हुई हो जब प्रधानमंत्री का काफिला अपने गंतव्य तक जाने की बजाए इस तरह वापस लौटा हो तथा उनके रैली रद्द होने के पीछे सुरक्षा चूक का कारण बताया गया हो।

कांग्रेस द्वारा इसे राजनीति का विषय बनाना खतरनाक है। उसका कटाक्ष करते हुए कहा है कि फिरोजपुर रैली में लोग आए नहीं इसलिए प्रधानमंत्री ने सुरक्षा चूक का बहाना बनाकर रद्द कर दिया।

चुनाव के मौसम में किसी पार्टी पर इस तरह का आरोप लगाना स्वाभाविक है पर इसमें प्रधानमंत्री की सुरक्षा का गंभीर पहलू जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाना चाहिए।

भारत में महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार प्रश्न उठाए जाते हैं और आमजन की परेशानियों को देखते हुए समय-समय पर विरोध और विवाद का विषय भी बनता है।

किंतु भारत में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे व्यक्तियों के सुरक्षा प्रोटोकॉल निर्धारित हैं और सरकारों को उसी अनुसार व्यवस्था करनी पड़ती है। प्रश्न है कि पंजाब प्रशासन ने प्रधानमंत्री के प्रोटोकॉल के अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था की थी या नहीं?

कांग्रेस का दावा है कि उसने फिरोजपुर रैली का ध्यान रखते हुए 10 हजार पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था में लगाया था। अगर इतनी पुलिस प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगी थी तो वह दिखनी भी चाहिए।

पंजाब पहुंचने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बठिंडा में एयरफोर्स स्टेशन भिसियाना में उतरना था और वे वहीं उतरे। वहां से उन्हें हेलीकॉप्टर द्वारा आकाश मार्ग से हुसैनीवाला जाना था जहां वे शहीद स्मारक में शहीद भगत सिंह सहित अन्य शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते। वहीं से उन्हें रैली के लिए हेलीकॉप्टर से ही फिरोजपुर पहुंचना था।

मौसम खराब होने के कारण हेलीकॉप्टर का उड़ना जोखिम भरा था। इसलिए कुछ देर प्रतीक्षा के बाद सड़क मार्ग से जाने का निर्णय लिया गया। प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व की यात्रा में हमेशा वैकल्पिक मार्ग की भी सुरक्षा व्यवस्था की जाती है। जैसा गृह मंत्रालय ने बताया है सड़क मार्ग से जाने का निर्णय पंजाब के पुलिस महानिदेशक एवं गृह सचिव के कहने पर लिया गया। स्वभाविक है एसपीजी ने सुरक्षा व्यवस्था के बारे में निश्चित गारंटी मिलने पर ही इसे स्वीकार किया होगा।

प्रधानमंत्री का काफिला गुजरने का अर्थ था कि पुलिस को रास्ता साफ करना चाहिए था। फिरोजपुर जिले के मुदकी के पास नेशनल हाईवे के एक फ्लाईओवर पर जिस तरह से प्रधानमंत्री का काफिला रूका था उस पर सहसा विश्वास करना कठिन है।

पंजाब पुलिस का कहना है कि सुबह रिहर्सल किया गया था और 9 बजे तक सब कुछ ठीक था, लेकिन अचानक लोग विरोध के लिए आने लगे। यह संभव नहीं कि विरोध करने वाले अचानक आ गए होंगे। जितनी संख्या में लोग थे और जिस तरह रास्ता जाम किये हुए थे उससे लगता था कि उनकी तैयारी पहले की थी।

जाहिर है, पुलिस को इसका पता नहीं चला तो यह बड़ी खुफिया और सुरक्षा चूक है। अगर पता रहते हुए नजरअंदाज किया गया तो यह अपराध है। मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी कह रहे हैं कि हम अपने प्रधानमंत्री से बहुत प्यार करते हैं किंतु साथ-साथ उनका यह भी कहना है कि हम पंजाब के लोगों पर लाठियां- गोलियां नहीं चला सकते। इसके क्या मायने हैं?

पंजाब सुरक्षा की दृष्टि से कितना जोखिम भरा प्रदेश है यह बताने की आवश्यकता नहीं। 600 किलोमीटर सीमा क्षेत्र पूरी तरह संवेदनशील है। जहां प्रधानमंत्री का काफिला रुका वह भारत पाक सीमा से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। यहां लगातार टिफिन बम और विस्फोटक मिलते रहे हैं।

पठानकोट और लुधियाना में हुए बम विस्फोटों के बाद पूरा पंजाब आतंकवादी खतरे को लेकर हाई अलर्ट पर है। पांच महीने में पंजाब में छह विस्फोट हो चुके।

8 अगस्त 2021 को अमृतसर के अजनाला में तेल टैंकर विस्फोट हुआ। 7 नवंबर 2021 को नवांशहर के सीआईए दफ्तर में धमाका हुआ।

5 सितंबर 2021 को फिरोजपुर में टिफिन बम धमाका हुआ। 21 नवंबर 2021 को पठानकोट में मिलिट्री कंटोनमेंट के द्वार पर धमाका हुआ।

15 सितंबर 2021 को जलालाबाद में मोटरसाइकिल में विस्फोट हुआ तो 23 दिसंबर 2021 को लुधियाना न्यायालय परिसर में बम विस्फोट हुआ।

जलालाबाद में विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार गुरमुख सिंह रोड इसी क्षेत्र में पड़ने वाले मोगा जिले के रोडे गांव का रहने वाला है। गुरमुख ने पूछताछ में स्वीकार किया था कि उसने टिफिन बम की डिलीवरी फिरोजपुर क्षेत्र में भी की है।

ध्यान रखिए, यह जरनैल सिंह भिंडरावाले का जन्म स्थान है। भिंडरावाले का भतीजा लखबीर सिंह रोड पाकिस्तान में रहकर खालीस्तान के लिए हिंसा फैलाने की साजिश में लगा है वह भी इसी क्षेत्र का है। इसलिए सुरक्षा में चूक चिंता का कारण होना चाहिए।

इस प्रश्न का भी उत्तर मिलना चाहिए की विरोध करने वालों के प्रधानमंत्री के वहां सड़क मार्ग से गुजरने की जानकारी कैसे मिली? कार्यक्रम के अनुसार उन्हें हवाई मार्ग से जाना था और अंतिम समय में सड़क मार्ग का निर्णय हुआ तो इसकी जानकारी वहां तक कैसे पहुंची? पंजाब सरकार और कांग्रेसी से राजनीतिक विवाद का विषय बनाने की बजाय पूरी समीक्षा करें। आत्मसमीक्षा भी करें।

यह कहना कि रैली में लोग नहीं आने वाले थे, इसलिए उन्होंने रद्द कर दिया आसानी से गले नहीं उतरता। प्रधानमंत्री को पहले से पता तो था नहीं कि यह हेलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर पाएगा, उन्हें सड़क मार्ग से जाना पड़ेगा, वहां विरोध पैदा होगा और उसके आधार पर वे रैली रद्द कर देंगे। फिरोजपुर में भाजपा पहले से मजबूत है।

यहां विधानसभा में वह दो- तीन सीटें जीती रही है। फिरोजपुर शहरी, अबोहर एवं फाजिल्का में भाजपा बहुत बड़ी ताकत है। यही नहीं फिरोजपुर के गुरुहरसहाय से वर्तमान विधायक राणा गुरमीत सोढ़ी कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इस जिले के एक प्रभावी अकाली नेता गुरतेज सिंह घुड़ियाना भी भाजपा में जा चुके हैं।
इन दोनों के समर्थक भी काफी संख्या में भाजपा में गए हैं। इसलिए केवल 700 संख्या फिरोजपुर रैली में आने से हास्यास्पद बात कुछ नहीं हो सकती।

हां, कई ऐसे वीडियो दिखाई दे रहे हैं जहां रैली में जा रहे भाजपा कार्यकर्ताओं की बसों को रोका जा रहा है, पुलिस की लाठियां चलते देखी गई, कुछ जगह कृषि कानूनों के नाम पर विरोध भी देखा गया। तरनतारन के एक गांव सरहाली के पास करीब दो दर्जन बसों का काफिला रोका गया। यहां कृषि कानून के नाम पर रोकने वाले एवं भाजपा कार्यकर्ताओं में बहस होती दिख रही है। पुलिस ढंग से कार्रवाई करती नहीं दिख रही है।

स्वयं पुलिस द्वारा भी कई जगह रैलियों में जाते लोगों को यह कह कर रोकते देखा गया कि आगे किसान विरोध कर रहे हैं मत जाओ। कई जगह पुलिस ने इन पर लाठीचार्ज भी किया।

यह बताता है कि भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए रैली में जाने के रास्ते को सुगम बनाने की कोई कोशिश नहीं थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह के भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस वहां ज्यादा आक्रामक है। मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी तथा कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को शांति से विचार करना चाहिए कि क्या वह टकराव की राजनीति से चुनाव में उतरना चाहती है? इस तरह की राजनीति पंजाब के लिए ज्यादा खतरनाक होगी।

कृषि कानून के विरोध करने वाले संगठनों और नेताओं को भी जवाब देना होगा कि आखिर अब उनके पास भाजपा के विरुद्ध आक्रामक होकर मोर्चाबंदी करने के लिए कौन सा मुद्दा है? बिजली शुल्क से लेकर पराली तक का मामला भी सरकार हल कर चुकी है।

इससे इस आरोप की पुष्टि होती है कि कृषि कानून विरोध के नाम पर आंदोलन में ऐसे तत्व शामिल थे जिनका इरादा कुछ और था। ये तत्व किसी न किसी तरह गलतफहमी फैलाकर टकराव की स्थिति पैदा करना चाहते हैं। किसी भी तर्क की कसौटी पर प्रधानमंत्री के रास्ते को आक्रामक तरीके से बाधित करने का कोई कारण नजर नहीं आता। उन संगठनों के द्वारा भाजपा के लोगों को रैली में जाने से रोकने का क्या मतलब है? आम राजनीति में राजनीतिक दलों के बीच भी इस तरह का व्यवहार मान्य नहीं है। पंजाब में इस तरह टकराव की स्थिति पैदा करने वालों के पहचान जरूरी है।

(आलेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, वेबदुनिया का इससे कोई संबंध नहीं है।)



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