sawan somwar

इरफान की याद में पीकू और राणा की मौन कथा

Updated: गुरुवार, 14 मई 2020 (11:42 IST)
जब कोई अजनबी जेस्चर आत्मा में घुलकर चेहरे की आवाज़ बन जाता है।

एक ऐसा भाव जो आज के पहले कभी भीतर नहीं आया।

पता नहीं वो क्या है, कौनसी सनक या रुमानियत। कोई उदासी। कोई एकांत या अकेलापन।

खीझ और चिड़चिड़ेपन के बीच कोई उम्मीद। या किसी नई शुरुआत की प्रतीक्षा।

वो प्रेम था? या जिंदगी की ठहरी हुई, स्थाई झुंझलाहट। सफर का कोई अनमनापन। शिकन या कोई मुश्किल।
या जिंदगी जीने का सबसे आसान तरीका। कोई इज़ीनेस सम्भवतः

कॉन्स्टिपेशन की तकलीफ़ की तरह हलक में अटकी हुई जिंदगी। न भागती है, न ठहरती है। जिंदगी धीमे धीमे 'टू बी आर नॉट टू बी' के बीच घटती रहती है। जैसे आदमी की देह नहीं, उनकी देह के साये इस कहानी के पात्र हों।
अनजान आंखे देखती रहती हैं एक सड़क अनजान सी, जो चलती जाती है अनजान ठिकानों के लिए।

हम रातभर उस सड़क पर सफर करते रहते हैं, यह जाने बगैर की अब तक रास्ते में कितने शहर गुजर चुके हैं, कितने स्टेशन पार हो चुके हैं।

जिंदगी के सफर की एक ऐसी अजनबियत जो पहले पहले कभी महसूस नहीं हुई। सिनेमा का यह स्वाद हर बार नहीं आता। या शायद बहुत सालों के अंतराल के बाद आता है। स्वाद जो पीकू ने आत्मा की ज़बान पर रख दिया और ख़त्म हो गई बगैर किसी फैसले के।

मैं यकीन करने की कोशिश कर रहा हूं कि मैंने इतने साल बाद पीकू देखी। इरफान के नहीं रहने पर। और इसके बाद यह आलम है कि मेरे ऊपर दिल्ली, बनारस और कोलकाता के सफर की खुमारी है। मेरे कान में हाइवे के सन्नाटे और ट्रकों की घर्र घर्र आवाजें आ रही हैं।

मैं अभी-अभी एक कार से उतरकर कोलकाता के आलोक में एक लंबी अंगड़ाई ले रहा हूं। आंखें चुपचाप गंगा घाट के पानी को पी रही हैं।

लंबे सफर के बाद मैं अपनी शर्ट की सिलवटों को ठीक कर रहा हूं। घाट की ठंडी हवा से पीठ का पसीना सूख रहा है।

मैं देख रहा हूं कि मैं एक छोटे से अंधेरे कमरे में बंद हूं। उस कमरे में जिंदगी में उलझ चुके धागों को सुलझा रहा हूं। एक लड़की उस अंधेरे कमरे में टॉर्च की रोशनी में जिंदगी ढूंढ रह है। मेरी जिंदगी को खोजने में मेरी मदद कर रही है।

मैं देखता हूं कि बहुत सारी खीझ और चिड़चिड़ाहट के बीच वो लड़की धीमे-धीमे प्यार में पड़ने लगी है। वो कॉफ़ी का कप लेकर अपने घर की खड़की में खड़ी हर शाम किसी अज्ञात जगह में खो जाती है। बालकनी में खड़ी होकर अनजाने में गंदा सा मुंह बनाती है।

जब मै कोलकाता से वापस लौटता हूं तो वो उदास हो जाती है, लेकिन अपने जीने के सलीके में वो अपनी सारी उदासिया छुपा लेती हैं।

ऐसा क्यों कि चुप्पियां ही प्रेम को सबसे ज्यादा आवाजें मुहैया करवाती हैं। सबसे ज्यादा कहना नहीं कहने में ही है।
सबसे ज्यादा लिखा हुआ उसके ख़ालीपन में ही है। चुप्पियां आवाजों की लिखावट हैं। सबसे ज़्यादा इज़हार, कुछ भी नहीं कहने में है। सबसे ज़्यादा देखना, नहीं देखने में है। सबसे ज़्यादा अटेंशन इग्नोर करने में होता है।

पीकू और राणा घर के आंगन में बैडमिंटन खल रहे हैं। शायद यह भी कहने का कोई तरीका हो। या नहीं कहना ही कहना हो।

हां, नहीं, शायद, या पता नहीं।
लेखक के बारे में
नवीन रांगियाल
नवीन रांगियाल DAVV Indore से जर्नलिज्‍म में मास्‍टर हैं। वे इंदौर, भोपाल, मुंबई, नागपुर और देवास आदि शहरों में दैनिक भास्‍कर, नईदुनिया, लोकमत और प्रजातंत्र जैसे राष्‍ट्रीय अखबारों में काम कर चुके हैं। करीब 15 साल प्रिंट मीडिया में काम करते हुए उन्‍हें फिल्‍ड रिपोर्टिंग का अच्‍छा-खासा अनुभव है। उन्‍होंने अखबार.... और पढ़ें

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