किसानों की आकांक्षाओं की उपेक्षा एवं नए दमनचक्र में झोंकने वाले विधेयक

पं.दीनदयाल उपाध्याय अपने दर्शन में भारत की दुरावस्था का मुख्य कारण बतलाते हुए कहते हैं कि―वर्तमान परिस्थिति का सबसे प्रमुख कारण राष्ट्र जीवन की आत्मा का साक्षात्कार न करते हुए उसके ऊपर विदेशी और विजातीय विचारधाराओं एवं जीवन मूल्यों का थोपने का प्रयत्न है।
शीघ्र उन्नति में दूसरे देशों का अन्धानुकरण करने और “स्व” के तिरस्कार की प्रवृत्ति पैदा हुई है। इससे राष्ट्र मानस में कुंठा घर कर गई है। उनके यह कथन आज भाजपा सरकार के द्वारा कहे जा रहे किसान हितैषी विधेयकों को लेकर सटीक बैठते हैं, यूरोपीय देशों विशेषतया अमेरिका का अंधानुकरण करते हुए देश के दोंनों सदनों में केन्द्र सरकार ने हाल ही में किसान विधेयक पेश किए हैं जो कि लोकसभा एवं राज्यसभा में विधेयक पारित हो चुके हैं, राष्ट्र मानस एवं यहां की परिस्थितियों तथा आकांक्षाओं को नकारकर यह स्वप्न दिखाए जा रहे हैं कि किसानों के जीवन में स्वर्णवर्षा होने वाली है।

केन्द्र सरकार के कथनानुसार सरकार ने लोकसभा में किसानों की आय दोगुनी करने एवं उनके कायाकल्प के लिए तीन क्रांतिकारी विधेयक लोकसभा में लाए जो कि क्रमशः―
१.कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020
२.कृषक (सशक्तीकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन
३.कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 हैं।

इन विधेयकों के द्वारा भारतीय जनता पार्टी की सरकार भले ही युगान्तरकारी तथा किसानों की समृद्धि का द्वार खोलने का दावा करती है, किन्तु इन विधेयकों के प्रावधानों में कई सारे अस्पष्ट, अप्रत्यक्ष सन्देश याकि अघोषित लक्ष्य छिपे हैं जिनसे किसानों के जीवन में त्रासदी तथा उद्योगपतियों के लिए समृद्धि और सरकारी नौकरशाही के बीच किसान को पिसते रहना पड़ेगा। सरकार इन विधेयकों के माध्यम से किसानों के लिए “एक राष्ट्र-एक बाजार”, अपनी उपज को पैन कार्डधारी किसी भी व्यवसायी को बेचने, खेती योग्य जमीन को ठेके पर देने, उपज का भाव तय कर जहां उसे अधिक मूल्य मिले वहां बेचने। उपज के बिक्री या कि ठेके पर दी गई जमीन से सम्बन्धित कोई भी विवाद होता है तो उसे स्थानीय उपप्रभागीय न्यायाधीश (एसडीएम) के पास शिकायत एवं विवाद के निपटारे का प्रावधान।

इसके साथ ही केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा आवश्‍यक वस्‍तुओं की सूची से अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेलों, प्‍याज और आलू इत्यादि उत्पादों को हटा दिया गया है।

इन विधेयकों को यदि हम गंभीरतापूर्वक समझें तो यह स्पष्ट समझ आता है कि किसानों को जहां बिचौलियों से बचाने एवं उसकी उपज का अधिकत मूल्य प्राप्त हो जिसके लिए कृषि व्यवस्था को एक बाजार के रुप परिवर्तित करने का उद्देश्य दिखता है। किन्तु सच्चाई यह है कि किसान पहले से तो कर्ज के बोझ में दबा ही है वहीं अब इन विधेयकों के जाल में उसके शोषण तथा प्रताड़ना का नया तंत्र विकसित होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

सरकार कहती है कि इस व्यवस्था के अन्तर्गत यदि भविष्य में किसानों का व्यापारी वर्ग/उद्योगपति से विवाद होता है तो उसके लिए उप- प्रभागीय न्यायाधीश(एसडीएम) के द्वारा न्याय निर्णयन किया जाएगा। सरकार कहती है तो ठीक है किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यदि हम भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की ओर दृष्टि दौड़ाएं तो यह एक प्रकार का इतिहास बन चुका है कि प्रशासनिक तंत्र के भ्रष्टाचारी एवं शोषणकारी स्वभाव ने राष्ट्र को अपूर्णीय क्षति पहुंचाई है। स्वतंत्रता के नाम पर भले ही प्रजातंत्र के नाम पर इन व्यवस्थाओं का सृजन हुआ है किन्तु धीरे-धीरे नौकरशाहों की यह प्रणाली नव सामन्तवाद का पर्याय बन चुकी है। ऐसे में क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि प्रशासनिक तंत्र उद्योगपतियों के साथ गठजोड़ करके किसानों के शोषण का माध्यम बनेगा?

यदि किसानों का कोई विवाद की स्थिति सम्बन्धित निकाय/व्यापारिक समूह /उपज क्रेता के साथ निर्मित होती है, तो इसकी क्या गारंटी है कि किसान के पक्ष में फैसला आएगा? वहीं जो किसान आज अपनी बदहाली के कारण निम्नस्तरीय जीवन व्यतीत करने तथा कर्ज के बोझ तले आत्महत्या करने को विवश हो रहा है,क्या वह किसी विवाद की स्थिति निर्मित होने पर शिकायत/कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए सामर्थ्यवान होगा? वहीं दूसरा पहलू हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के पास इतनी शिकायतें/मुकदमे हैं कि उनका ही सही समय में निपटारा नहीं हो पाता, तो इस पर कैसे विश्वास किया जाए कि किसानों के विवादों का निपटारा सही समय पर किया जा सकेगा?

इसके साथ ही क्या इस बात की आशंका नहीं है कि उद्योगपतियों/ निकायों द्वारा जब किसानों की जमीन को ठेके में निश्चित अवधि के लिए लिया जाएगा, तब उनके साथ मनमानी मूल्य पर छल के साथ षड्यंत्रपूर्वक जमीन को हथियाने के प्रयत्न नहीं किए जाएंगे? यदि किसानों की जमीन को उद्योगपति ठेके में लेकर उसका गैर-कृषि कार्यों के लिए दुरुपयोग करते हुए जमीन को बंजर बनाकर छोड़ देते हैं, तब की स्थिति में क्या समाधान होगा?
वहीं इस बात को भी ध्यान देना चाहिए कि कृषि पर महज किसानों की आजीविका ही निर्भर नहीं है बल्कि खेतिहर मजदूरों की बड़ी आबादी भी कृषि पर निर्भर है, ऐसे में क्या खेतिहर मजदूरों की आजीविका /रोजगार पर क्या इसका विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा? जहां तक जमीन को ठेके पर देने की बात है तो क्या यह प्रणाली ठीक महाजनों वाली पुरानी व्यवस्था का ही नया रुप नहीं दिख रही है? सरकार भले माने या न मानें लेकिन यह कटुसत्य एवं यथार्थ है कि किसान न तो उतना पढ़ा-लिखा एवं सजग है कि वह व्यापार जगत के द्वारा अपनाए गए हथकंडों को जान-बूझ सकेगा।

इस पर ठेके (कॉन्ट्रैक्ट) पत्र की भाषा भी एक महत्वपूर्ण पहलू बनकर उभरेगी, जिसमें अंग्रेजी का प्रयोग याकि पत्र की जटिल भाषा के माध्यम से किसानों को कुचक्र में फंसाया जा सकता है।

भले ही प्रधानमंत्री एवं सरकार यह कह रही है कि “न्यूनतम समर्थन मूल्य” (एमएसपी) को खत्म नहीं किया जाएगा। किन्तु सम्बंधित विधेयक में न्यूनतम समर्थन मूल्य का कोई भी प्रावधान नहीं होना क्या दर्शाता है? वर्तमान में देश के मात्र छ:(६)प्रतिशत किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करते हैं तथा अन्य चौरान्नवे (९४) प्रतिशत किसान इससे वंचित रह जाते हैं। एक ओर तो यह कहा जाता है कि देश संविधान एवं कानून के अन्तर्गत चलता है,तब विधेयक में न्यूनतम समर्थन मूल्य का कहीं भी उल्लेख या प्रावधान न होना यही स्पष्ट कर रहा है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य से छुटाकारा पाना चाहती है जिसके लिए जानबूझकर उसने ऐसे किसी भी प्रावधान को विधेयक में समाहित नहीं किया गया है। फिर बात आती है कि किसान अपनी उपज को अधिकतम मूल्य देने वाले देश के किसी भी हिस्से के बाजारों या व्यापारियों को बेच सके।

डिजिटल माध्यम से इसके अधिक मूल्य तथा अपनी उपज का मूल्य तय कर सकता है। इसके साथ ही सरकार का कथन है कि मंडी व्यवस्था भी इसके समांतर ही चलती रहेगी। अब इन बातों का विश्लेषण करने पर कुछ बिन्दु एवं प्रश्न उभरकर सामने आते हैं कि- सरकार का कहना ठीक है कि किसान अपनी उपज का मूल्य, उसे जहां ज्यादा मिले वहाँ जाकर याकि ऐसे व्यापारी/निकाय/समूह से सम्पर्क करके बेचे जिसके पास पैन कॉर्ड नं. हो।

अब ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जो किसान अपनी उपज को जिले की मंडी या सहकारी समिति केन्द्र (सोसायटी) तक में रजिस्ट्रेशन करवा के बेच पाने में अक्षम होता है, वह अपनी उपज को अन्तर्राज्यीय बाजार में कैसे बेंच पाएगा? इस पर ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि देश का अधिकांशतः किसान तकनीक से अनभिज्ञ है याकि तकनीक का उतना प्रयोग नहीं कर पाता कि वह घर बैठे अपनी फसल का मूल्य तय करके बेच सके। और न ही ज्यादातर किसानों के पास अपनी उपज को बाजारों तक पहुंचाने के लिए संसाधन है तथा शासकीय आंकड़ों के अनुसार देश के अधिकांशतः किसानों के पास अधिकतम दो हेक्टेयर यानि पांच एकड़ से अधिक कृषि योग्य जमीन नहीं है।

वहीं प्रकृति की मार के कारण कृषि उत्पादन भी लगभग उतना नहीं होता कि जिससे किसानों के पास इतनी उपज हो कि वह अधिकतम मूल्य के बाजारों तक पहुंचा सकें। यदि यह संभव हो भी सके के अन्तर्राज्यीय बाजारों तक किसान अपनी उपज ले भी जाएं तो परिवहन व्यय भी इतना अधिक हो जाएगा कि उनकी कृषि की सम्पूर्ण लागत भी नहीं निकल पाएगी। इसका एक अन्य पहलू भी है कि– इस बात की क्या गारंटी दी जा सकती है कि यदि किसान अधिकतम मूल्य वाले बाजार में अपनी उपज लेके भी जाए तो व्यापारी उसकी उपज को गुणवत्ताविहीन या गुणवत्ता में कमी निकालकर उसकी उपज को या तो कम मूल्य में खरीदें याकि इंकार ही कर दें।

क्या सरकार के पास किसानों को इससे बचाने के लिए कोई दिशा-निर्देश या प्रावधान हैं? न्यूनतम् समर्थन मूल्य के न होने के कारण यदि स्थानीय एवं अन्तर्राज्यीय बाजार/निकाय/समूह /व्यापारी किसानों के उत्पादों को मनमाने मूल्यों पर बेचने के लिए विवश कर देंगे।क्योंकि किसान के पास न तो इतना समय रहता और न ही इतनी पूंजी रहती है कि वह अपनी फसल के मूल्य को तय करने तथा उचित दाम न मिलने की स्थिति में अधिक समय के लिए भण्डारण कर सके। तब उसके पास यही विकल्प शेष बचेगा कि उसे उस समय व्यापारियों द्वारा निर्धारित किए जाने वाले मूल्य पर ही बेच दे।

सरकार कह रही है कि बिचौलियों से बचाने एवं मंडी प्रणाली, कर इत्यादि से बचाने के लिए ही कृषि को बाजार के तौर पर परिवर्तित किया गया है। लेकिन सरकार की इस मंशा के पीछे मंडी प्रणाली को खत्म करने का अघोषित लक्ष्य छिपा हुआ है, क्योंकि कोई भी व्यापारी यह क्यों चाहेगा कि वह-छ: (६)प्रतिशत कर देकर उत्पाद की खरीदी करे? इससे वह मंडियों से व्यापार न करके बाहर ही अनाज की खरीदी करेगा ,जिससे धीरे-धीरे यह होगा कि मंडी का कोई उपयोग ही नहीं रह जाएगा तब ऐसे में मंडी की व्यवस्था को ही समाप्त करने के कदम को उठाने में सरकार कोई भी कोताही नहीं बरतने वाली। आवश्यक वस्तुओं से जिन कृषि उत्पादों को यह कहकर हटाया गया है कि हमारे पास इतना उत्पादन है कि इसे रिजर्व के अन्तर्गत रखने का कोई औचित्य नहीं है, तब यदि भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि व्यापारी इन वस्तुओं की कालाबाजारी करने के उद्देश्य से उपभोक्ताओं के लिए बाजार में निर्यात ही कम कर दें? तब सरकार के पास कोई शक्ति ही नहीं रह जाएगी कि जनता को मंहगाई से बचा सकें। इस प्रकार सरकार के पास आवश्यक वस्तुओं के नियंत्रण की शक्ति ही नहीं रह जाएगी।

भले ही सरकार अपनी पीठ खुद ही थपथपा रही है। लेकिन इन विधेयकों से यह स्पष्ट हो रहा है कि इन प्रावधानों के पीछे धरातलीय कार्य (ग्राउंड वर्क) नहीं किया गया, यदि किया भी गया है तो इसमें देश के किसान, उसकी आकांक्षाओं की घनघोर उपेक्षा करते हुए किसानों की समृद्धि के दिवास्वप्न को दिखाते हुए नए दमन चक्र में झोंक दिया गया है। यदि सरकार वास्तव में किसानों की समृद्धि चाहती है तो स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को क्यों नहीं लागू कर देती? याकि सरकार के पास किसानों की उन्नति के लि अन्य कोई जादू का पिटारा है, तो उसे ही लागू कर दे।कृषि विशेषज्ञों एवं राष्ट्र के लगभग जन-जन का मानना है कि स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करना तथा उसके कार्यान्वयन के माध्यम से ही किसानों का भाग्योदय हो सकता है, बाकी तो छल एवं झुनझूनों के अलावा कुछ भी नहीं है।

किसी व्यवस्था की खामियों का उपचार करने की बजाय उस व्यवस्था को खत्म कर देना कोई हल नहीं होता बल्कि यह इस बात का प्रमाण होता है कि व्यवस्थाओं को सुधारने का न तो कोई सद्प्रयास करने की इच्छाशक्ति और न ही उसके लिए कोई स्पष्ट दृष्टिकोण एवं नीति है। सरकार,इस पर यथाशीघ्र विचार करे तथा इन विधेयकों में जो खामियां एवं अन्य नीतियों का अभाव है उसको सुधार कर किसान, राष्ट्र की आकांक्षाओं को पूर्ण करें अन्यथा सरकार को इसकी बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)



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