हिज़ाब मामला : नफरत की चौसर पर धर्म की गोटियों से दांव पर लगे युवा


हम भारतीय हैं?

कैसे मुंह से निकलेगा - मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

नफरत की चौसर पर धर्म की गोटियों से युवकों/युवतियां दांव पर लगाये जा रहे। शिक्षा के मायने बदल गए। हम उसके बाजारीकरण, व्यवसायीकरण को रो ही रहे थे कि ये दीन-धर्म नाम का असुर सामने आ खड़ा हुआ है जिसने शिक्षा के मंदिरों को तांत्रिक गुफाओं में बदलने का कला कर्म करना शुरू कर दिया है। इन्हें भारत और भारतीयता से कोई सरोकार नहीं। शिक्षा के मूल उद्देश्यों की बलि चढ़ाई जा रही।

शिक्षा किसी समाज में सदैव चलने वाली वह सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का विकास, उसके ज्ञान, एवं कला-कौशल में वृद्धि तथा व्यवहार में परिवर्तन किया जाता है और इस प्रकार उसे सभ्य, सुसंस्कृत एवं योग्य नागरिक बनाया जाता है। इसके द्वारा व्यक्ति एवं समाज दोनों निरन्तर विकास करते हैं।
पर यहां तो मामला ही उलट हो रहा है। रंगों और पहनावों में बंटते लोग इससे कोसों दूर है। सभ्यता तो इनको छू कर भी नहीं गई। धर्म के अंधे लोग चाहे वो लड़के हों या लड़कियां वे सभी इस हद तक भ्रमित बुद्धि हो चुके हैं जैसे जन्मजात मंदबुद्धि हों, किसी भी प्रकार के विकास से इन्हें दुश्मनी हो चली है।


समाज के साथ अनुकूलन, सामाजिक कुशलता की उन्नति एवं सुधार, सामाजिक कर्तव्यों की पूर्ति, संस्कृति और सभ्यता का विकास, व्यक्तिगत हित को सामाजिक हित से दूर रखना, सामाजिक भावना की जागृति,सामाजिक गुणों का विकास इनमें से कौनसा शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण हो रहा है? जो भी घटनाक्रम हो रहे हैं उनके लिए क्या हम नागरिकता/राष्ट्रीयता के लिए भारतीय लिखने वाले बचे हैं?
प्रत्येक व्यक्ति समाज में ही जन्म लेता है, समाज में ही पल्लवित होकर जीवन व्यतीत करता है और समाज में ही उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में शिक्षा का महत्वपूर्ण कर्तव्य हो जाता है कि बालकों में सामाजिक भावना जागृत करे, उनमें दया, परोपकार, सहनशीलता, सौहार्द, सहानुभूति, अनुशासन इत्यादि सामाजिक गुणों का विकास करें।

और खास कर लड़कियों के लिए कहना चाहूंगी-
पता है..
जंगल की आग पर से उड़ कर गुज़रना है
ऊपर अथाह नीला आसमान होता है
और
नीचे आग की लपटें
नीचे जलना भी नहीं
ऊपर खो जाना भी नहीं
दोनों से अछूते रह कर
दोनों के बीच से गुज़रना है...
यहां ज्वलंत मुद्दा पहले खुद को इंसानों की श्रेणी में खड़ा होने की लड़ाई का है। धर्म इंसानों ने बनाए, इनमें पैदा होना हमारी पसंद नहीं है। हर बार किसी भी तरह की नफरत, युद्ध, लड़ाई, बंटवारे में केवल और केवल औरतों को ही सबसे ज्यादा हानियां/दुर्गातियां उठानी पड़तीं हैं। इसलिए सावधान ‘जय श्रीराम या अल्लाहो अकबर’ के पहले खुद को बुलंद करो। क्योंकि किसी भी धर्म में महिलाओं को इस्तेमाल होना नहीं बताया गया है। वे तो स्वविवेक से अपने निर्णय लेने वाली और इतिहास रचने वाली हैं, समय और स्वार्थियों ने हमारी परिभाषा ही बदलने की कोशिशें कर डाली हैं. इस षड्यंत्री कुचक्र का हिस्सा जब जब भी हम बनी हैं घोर त्रास ही भोगे हैं।
हम मोहरा नहीं।हम मुद्दा नहीं। हमारे लिए तय किए नियम हमारे नहीं। हिजाब-घूंघट के आलावा हमारे पास अनेकों अनंत संकट सामने हैं जो केवल खुद की बुद्धि, मजबूती, ताकत से ही लड़ कर ही हासिल जा सकते हैं।

पर यदि फिर भी देश के किसी भी कोने में कहीं भी इस तरह से शिक्षा के मूल्यों का हनन हो, सामाजिक, राष्ट्रीय हितों से उप्पर यदि धर्म है, निजी स्वार्थ है और इंसानियत का पाठ यदि भूलने लगे हैं तो देश की शांति की कीमत पर कोई समझौता नहीं। उनसे राष्ट्रीयता/नागरिकता “भारतीय” लिखने का हक छीन लेना चाहिए। क्योंकि ‘राष्ट्र हित’सर्वोपरि है।



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