ऐसा था स्वतंत्रता संग्राम में अतुल चंद्र कुमार का योगदान

Independence Day 2020
 
Last Updated: शुक्रवार, 14 अगस्त 2020 (13:37 IST)
एसपी ठाकुर,
देश को अंग्रेज़ों की गुलामी से आजाद कराने में स्वतंत्रता सेनानियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे। इस मिशन में उन्हे कई स्वतंत्रता सेनानियों की सहायता मिली जिनका योगदान भी अद्वितीय है।

ऐसे ही एक स्वाधीनता संग्रामी थे अतुल चंद्र कुमार। आज वे हमारे बीच नहीं हैं। उनके छोटे भाई के नाती सौम्यजीत ठाकुर नागपुर में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। उनके मन में अपने बड़े नाना के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान पर गर्व है।

अतुल बाबू का जन्म 5 अप्रैल 1905 में पश्चिम बंगाल में मालदा ज़िले के अड़ाईडांगा गांव में दीनानाथ कुमार और कात्यायनी देवी के घर हुआ। बचपन से ही उनमें नेतृत्व के गुण दिखने लगे। 1921 में उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। मैट्रिक की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद उन्होंने बेरहमपुर में कृष्णनाथ कॉलेज में प्रवेश लिया। यहां उन्होंने एक विद्यार्थी संगठन कि स्थापना की तथा उसके सचिव के पद पर कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने सरोजिनी नायडू तथा चित्तरंजन दास जैसे नेताओं को छात्रों में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए आमंत्रित किया। एक कार्यक्रम में बंगाल के तत्कालीन गवर्नर स्टेनली जैक्सन ने भारत विरोधी बयान दिया।

इसके जवाब में अतुल बाबू ने बेरहमपुर में एक कार्यक्रम के दौरान उन पर जूता फेका, जिसके लिए उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया और उन्हें अपनी वकालत की पढाई बंगबाशी कॉलेज कलकत्ता से पूरी करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने ऑल बेंगॉल स्टूडेंट्स यूनियन के सहायक सचिव के रूप में काम किया। 1928 में अड़ाईडांगा परिसर में अपने भाईयों के साथ मिलकर दिनानाथ भोलानाथ मॉडल अकॅडेमी पाठशाला की स्थापना की। अड़ाईडांगा जैसे सुदूर इलाके में आधुनिक शिक्षा प्रसारण हेतु यह एक सराहनीय योगदान रहा।

1930 में बंगाल में उन्होंने नमक सत्याग्रह आन्दोलन का नेतृत्व किया। इसके लिए उन्हें एक साल का कारावास हुआ। इसके बाद उन्होंने साइमन कमिशन के खिलाफ विद्यार्थि‍यों के आन्दोलन का नेतृत्व किया तथा मालदा ज़िला कांग्रेस कमेटी में कार्यरत रहते हुए असहयोग आन्दोलनों का नेतृत्व किया। इसके लिए उन्हें कई सालों तक जेल में रहना पड़ा और 1936 में हि उन्हें रिहाई मिली। इस कारावास के दौरान अंग्रेज़ों ने नेताजी और उनके साथियों के स्थान तथा योजनाओं को जानने के लिए उन्हें बुरी तरह उत्पीड़न दिया। परंतु उन्होंने कुछ नहीं बताया।

1937 से 1946 से तक वे बंगाल में विधायक के पद पर कार्यरत रहे। 1938-39 के समय उन्होंने नेताजी का हरिपुरा और त्रिपुरी कांग्रेस सत्रों के अध्यक्ष के पद पर चुनाव सुनिश्चित किया। अगस्त 1938 में उन्होंने नेताजी के साथ मिलकर चीन-जापान युद्ध के समय चीन में एक वैद्यकीय प्रतिनिधिमंडल भेजने में एक अहम भूमिका निभाई। यह वैद्यकीय मिशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का चीन के लोगों के प्रति समर्थन का प्रतीक था।

1942-43 के समय उन्होंने एके फज़लूल हक और ख्वाजा नझीमुद्दीन के मंत्रिमंडल में कई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारि‍यां संभाली। भारत में शिक्षण का सांप्रदायिकरण यह मोहम्मद अली जिन्नाह का एक नापाक इरादा था। अतुल बाबू ने फज़लूल हक और शरतचंद्र बोस के साथ मिलकर उनकी योजनाओं पर पानी फेर दिया। अक्तूबर 1943 में नेताजी ने बर्मा मोर्चे से एक जापानी पनडुब्बी में मद्रास के टीके राव के हाथों स्वतंत्रता संग्राम हेतु कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज व सूचना अतुल बाबू और उनके साथियों के लिए भेजा। परंतु उनके साथियों की गिरफ्तारी की वजह से सिर्फ अतुल बाबू ही नेताजी के निर्देशों का पालन कर सके और नेताजी का वह मिशन कामयाब हुआ।

1940 के दशक के अंत में नेताजी भारतीय राजनीति से दूर जाते ही वे सामाजिक कार्यों कि तरफ मुड़ गए। सामाजिक क्षेत्र में भी अतुल बाबू का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे बंगाल की जनता से बहुत प्यार करते थे और बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं के दौरान उन्होंने लोगों की बहुत मदद की। कई सालों तक उन्होंने वार्षिक बाढ़ के समय मुट्ठी भर सहकर्मियों के साथ बाढ़ग्रस्त इलाकों में जाकर सैंकड़ों लोगों की जान बचाई। 1950 के दशक के अंत में वे कांग्रेस छोड़कर सी राजागोपालाचारी के स्वतंत्र पार्टी में शामिल हुए।

1955 में दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह के कहने पर उन्होंने 'मिथिला इन इंडिया' नामक पुस्तक का सह-लेखन किया। आचार्य विनोबा भावे के 1962 मालदा दौरे के समय उन्होंने उनके बैठकों और गतिविधियों का समन्वय किया। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने अत्याचारी ज़मीनदारों से किसानों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पीड़ित किसानों को न्याय दिया।

16 सितम्बर 1967 में देश के इस महान सपूत ने कोलकाता में अंतिम सांस ली। पश्चिम बंगाल सरकार ने उनके महान योगदानों के सम्मान में मालदा स्थित मोकदुमपुर मार्केट का नाम 'अतुल मार्केट' रखा। सौम्यजीत भी अपने बड़े नाना के आदर्शों पर चल रहे हैं तथा समाज में महत्तवपूर्ण योगदान देने में प्रयत्नशील हैं। उनके पास नेताजी तथा अतुल बाबू के पत्र, ऑडियो रेकॉर्ड और चित्रों का संग्रह है, जिसे उन्होंने सहेज कर रखा है।

नोट: इस लेख में व्‍यक्‍त व‍िचार लेखक की न‍िजी अभिव्‍यक्‍त‍ि है। वेबदुन‍िया का इससे कोई संबंध नहीं है।



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