राष्ट्रीय शिक्षा नीति: राष्ट्रोत्थान-आत्मगौरव की आधारशिला

new education policy
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरितासउद्भिदः
अर्थात- कल्याणकारक, न दबनेवाले, पराभूत न होने वाले, उच्चता को पहुंचाने वाले शुभकर्म, श्रेष्ठ विचार सभी ओर से हमारे पास आएं। ऋग्वेद का यह मंत्र हमारी उसी भारतीय संस्कृति की महत्ता को सुस्पष्ट कर रहा है जिसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 के माध्यम से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है।

भारतीय संस्कृति में शिक्षा सदैव ज्ञान, अनुसंधान, वैज्ञानिक तर्कणायुक्त, प्रायोगिक तौर पर सत्यापित, कौशल आधारित, उच्च जीवन मूल्यों तथा भौतिक एवं अध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने के साथ ही श्रेष्ठ मानकों का सुस्थापना पर बल देने वाली रही है।

त्रेतायुग में प्रभु श्री राम की गुरु वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा-दीक्षा से लेकर द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण का सान्दीपनि आश्रम में विद्याध्ययन की श्रेष्ठ परंपरा रही है। आधुनिक काल में भारतीय इतिहास के स्मृति पटल पर जीवंत ज्ञान के अक्षय भण्डारों यथा- नालंदा, तक्षशिला जैसे वैश्विक शिक्षा केन्द्रों एवं विश्व को विविध क्षेत्रों में दिए गए ज्ञान का अनुदान आज भी भारतवर्ष की गरिमापूर्ण गाथा का परिचायक है। बंगाल में गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर का शांति निकेतन आश्रम एवं उनके द्वारा स्थापित 'विश्व भारती' सहित वैदिक शिक्षाओं पर आधारित गुरुकुल उसी प्राच्य परंपरा का निर्वहन करते हुए राष्ट्रसंस्कृति को जीवंतता प्रदान कर रहे हैं।

दीर्घावधि की परतंत्रता से मुक्ति के उपरांत स्वतंत्र भारत में शिक्षा नीति बनी किन्तु उन पर आयातित विचारधाराओं को थोपने तथा भारतीय संस्कृति के अनुरुप सुसंगत न होने के चलते वह अपने वांछित लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकी। बल्कि शिक्षा नीति,पाठ्यक्रम में भारतीय संस्कृति के विरोधी तत्वों, अकादमिकों, तथाकथित विषय विशेषज्ञों ने शिक्षा के माध्यम से मैकॉले एवं वामपंथी विचारधारा को स्थापित करने का माध्यम बना लिया जिसके दुस्प्रभावों के चलते एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण हो गया जो भारतीय संस्कृति अर्थात् 'हिन्दू संस्कृति' के विरूद्ध खड़ी हो गई।
आत्मविस्मृति,हीनता, ग्लानि, पराजयबोध तथा राष्ट्रनायकों के ऐतिहासिक पराक्रमों,राष्ट्र की भाषाओं,संस्कृति को लेकर हेयदृष्टि की निर्मित्ति ने श्रेष्ठ मानवीय, नैतिक मूल्यों,आचार-व्यवहार की अपूर्णीय क्षति के साथ ही राष्ट्र का बौध्दिक बल ह्रास करने में सफल हुई।

स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में तथाकथित अकादमिक बौध्दिकों, विद्वानों ने शिक्षा के माध्यम से एक ऐसे वर्ग को जन्म दिया जो अपनी मूल संस्कृति से घृणा करे व बाह्य आक्रांताओं के प्रति सहानुभूति रखते हुए उन्हें श्रेष्ठ सिध्द करे। यानि कि सुनियोजित तरीके से भारतीय मानस में विकृति लाकर
भारतीयता के विरूद्ध ही बौध्दिक हथियार का प्रयोग करते हुए राष्ट्र की 'आत्मा' को नष्ट करने का कुकृत्य सफेदपोशी की आड़ में किया गया। राजनैतिक प्रश्रय में चल रहे इस षड्यंत्र ने 'राष्ट्रसंस्कृति' पर तो कुठाराघात किया ही, साथ ही अंक प्राप्ति की अन्धी प्रतिस्पर्धा का निर्माण कर 'बेरोजगारी' की नई दुनिया का सर्जन भी किया। हालांकि राष्ट्रीयता एवं भारतीय संस्कृति को संरक्षित, संवर्धित करने में लगे असंख्य अनाम व्यक्तियों, संगठनों की निष्ठा ने राजनैतिक प्रश्रय में चलने वाले षड्यंत्र के बावजूद भी अपनी विरासत को बचाए रखने अपनी निरंतर आहुति दी।

समयानुकूल राजनैतिक नेतृत्व के सत्तासीन होने पर 'राष्ट्रीयता' के बीजारोपण एवं राष्ट्रोत्थान के लिए कटिबद्धता प्रकट करते हुए 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति' की आधारशिला रखी गई। जो कि पूर्णरूपेण भारतीय संस्कृति की ज्ञान आधारित पध्दति की संस्थापना एवं आत्मगौरव से परिपूर्ण होकर वैश्विक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की बौध्दिक नीति का प्रतिपादन करने में सर्वसमर्थ एवं सक्षम है।

इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में गठित समिति के प्रस्ताव पर आधारित राष्ट्रीय शिक्षा नीति में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शिक्षा सम्बन्धी उन विचारों की झलक भी देखने को मिलती है जिनके बारे में उन्होंने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य एवं सुसंगतता तभी है जब वह इन तीन बिन्दुओं को चरितार्थ करे -१. शिक्षा का उद्देश्य प्राचीन ज्ञान को नवीन पीढ़ी को हस्तांतरित करना २. नवीन ज्ञान का सर्जन व पुरातन ज्ञान को समयानूकूल बनाना ३. नवीन पीढ़ी को जीवन की चुनौतियों, श्रेष्ठ आचरणों व राष्ट्रोन्नति के लिए सुसज्जित करना।शिक्षा नीति पर दृष्टिपात करने पर हम पाते हैं कि -(5+3+3+4) का सूत्र उस आधारभूत ढांचे के निर्माण का सूत्र है जिसमें भारत का भविष्य उज्ज्वल ही नहीं, अपितु ज्ञान की पताका को वैश्विक क्षितिज पर फहराने वाला है। चाहे बात 3-6आयु वर्ग के बच्चों को पूर्वप्राथमिक शिक्षा के अन्तर्गत आंगनवाड़ी, बालवाटिका के माध्यम से गतिविधि, खेलकूद के द्वारा उसे मौलिक साँचे में ढालकर बचपन एवं बालविकास का लक्ष्य है। बाल्यावस्था के समुचित विकास एवं शिक्षा का प्रभाव बच्चों के सम्पूर्ण जीवन पर दृष्टिगत होता है। वहीं 6-8 आयु वर्ग के बच्चों को प्राथमिक कक्षाओं 1,2 में बहुस्तरीय खेल,गतिविधियों एवं संकल्पनात्मक मूल्यों के सर्जन का लक्ष्य रखा गया है। कक्षा-5 तक की शिक्षा में मातृभाषा/स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा की अनिवार्यता तथा जहाँ तक संभव हो सके कक्षा -8 एवं आगे की शिक्षा में मातृभाषा/स्थानीय/क्षेत्रीय भाषाओं पर शिक्षा के लिए प्रोत्साहन एवं पहल विश्व के उन शोध,विश्लेषणों पर आधारित है जिनके द्वारा यह सिध्द किया जा चुका है कि विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में जितनी सहजता एवं सरलता के साथ सीखते हैं उतना अन्य भाषाओं में नहीं। इसके साथ ही इस तथ्य की भी पुष्टि होती है कि विश्व के उन देशों ने ही प्रगति के कीर्तिमान रचे हैं जिनकी शिक्षा प्रणाली उनकी अपनी भाषा में रही है। इस शिक्षा नीति में कक्षा -6 से ही पाठ्येत्तर शिक्षा के अलावा व्यवसायिक शिक्षा के लिए 'इटर्नशिप' के माध्यम से कौशल विकास की बुनियाद रखने की व्यवस्था है। साथ ही स्कूली शिक्षा के दौरान विभिन्न विदेशी भाषाओं को सीखने के लिए विकल्पों का प्रावधान है। स्कूली एवं उच्च शिक्षा में संस्कृत एवं अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं, मातृभाषा में शिक्षा का विकल्प होना भारतीय संस्कृति, भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्द्धन में अपना अहम् योगदान देगी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में केवल अध्ययन-अध्यापन के बिन्दुओं को समाहित नहीं किया गया बल्कि "शिक्षा-शिक्षक-पध्दति" की त्रयी पर ध्यान केन्द्रित कर - शोध,अनुसंधान, अनुवाद, स्तरीय पाठ्यसामग्री, प्रगति मूल्यांकन, आधारभूत संरचना पर बल देते हुए उनके निर्माण तथा भारतीय अनुवाद एवं व्याख्या संस्थानों की स्थापना व उच्च शिक्षा में महाविद्यालयों,विश्वविद्यालयों में भाषा विभागों के विकास एवं उन्हें श्रेष्ठ बनाने पर जोर दिया गया है। दिव्यांगों के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर उनके अनुकूल पाठ्यसामग्री के निर्माण तथा भारतीय संकेत भाषा को मानकीकृत करने पर जोर दिया गया है। आधुनिक एवं डिजिटल होते परिदृश्य के अनुरूप शिक्षा नीति में शिक्षा के लिए डिजिटल अवसंरचना के निर्माण की भी बात कही गई है। शिक्षा नीति में श्रेष्ठतम्,आधुनिक, वैज्ञानिकीय,कौशल विकास ,तार्किकता, नवाचार, रचनात्मकता, अनुभव एवं ज्ञान आधारित शिक्षण पर मुख्य ध्यान केन्द्रित किया गया है। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पाठ्यक्रम, प्रगति, शिक्षण प्रणाली से सम्बन्धित निष्पक्ष मूल्यांकन एवं अर्हताओं को समाविष्ट किया गया है जिसके लिए भारत की कुल जीडीपी का 6% भाग शिक्षा पर व्यय किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पूर्व प्रचलित विषय विभाजन की बजाय शैक्षिक विषयों में अन्तर्सम्बन्ध एवं व्यवहारिकता की स्थापना पर बल दिया गया है जिससे विद्यार्थी अपनी अभिरुचि के अनुरूप विषय का चयन अपनी शिक्षा के लिए कर सकता है। उच्च शिक्षा में 50% नामांकन का लक्ष्य व 'मल्टिपल इण्ट्री एवं एग्जिट' की व्यवस्था ने समय की बचत ,प्रतिभा निखार, श्रेष्ठ मानवसंसाधन के निर्माण के द्वार खोले हैं जिसके माध्यम से विद्यार्थी का चहुंमुखी विकास एवं समय को रचनात्मकता के लिए समायोजित किया जा सकेगा। इसी तरह से 'एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट ' की आधुनिक व्यवस्था व
प्रगति मूल्यांकन हेतु 'परख' जैसे राष्ट्रीय आँकलन केन्द्र की स्थापना एवं विद्यार्थियों की अभिरुचि उनकी योग्यता के अनुरूप भविष्य निर्माण के लिए 'कृत्रिम बुध्दिमत्ता परीक्षण' जैसे नवाचारों को अपनाया जाना नींव का पत्थर साबित होंगें।
भारत उच्च शिक्षा आयोग के गठन तथा 15 वर्षों की अवधि में क्रमशः महाविद्यालयों की सम्बध्दता को समाप्त कर उन्हें स्वायत्त बनाने की योजना विकेन्द्रीकरण की ओर कदम बढ़ाया जाना है। शिक्षा नीति का दायरा व्यापक एवं विस्तृत फलक पर आधारित है जिसमें आईआईटी ,आईईएम जैसे संस्थानों में भी मानविकी विषयों की शिक्षा को अन्तर्विष्ट किया गया है तो वहीं वैश्विक श्रेष्ठ मानकों के अनुरूप बहुविषयक शिक्षा,अनुसंधान विश्वविद्यालयों की स्थापना एवं श्रेष्ठ वैश्विक शिक्षण संस्थानों की शाखाओं को भारत में खोलने की पहल 'वसुधैव कुटुम्बकम' की पुरातन मूल्याधारित भावना को पुष्ट करने के साथ ही वैश्विक ज्ञान की सर्वसुलभता के लिए सार्थक प्रयास है। कुलमिलाकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-सिध्दांत एवं व्यवहार में एकरूपता,ज्ञान आधारित,समयानुकूल ,सामाजिक सांस्कृतिक, राष्ट्रीय विचारों से पोषित है जिसके माध्यम से भारतवर्ष को पुनः विश्वगुरु के पद पर सुशोभित किया जाना संभव हो सकेगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का कार्यान्वयन समुचित तरीके से चरणबद्ध प्रक्रियाओं के अनुसार किया जाएगा तो निश्चय ही हमारी आद्य सनातन संस्कृति की उस उक्ति -"कृण्वन्तो विश्वमार्यम" अर्थात् आइए सम्पूर्ण विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाए। को चरितार्थ एवं स्थापित किए जाने के साथ ही भारतवर्ष जो अपने ज्ञान के लिए जाना जाता है उस परंपरा को पुनर्जीवित कर आत्मगौरव की पुनर्प्रतिष्ठा की जाएगी।



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