Domestic violence in lockdown: सामीप्य से उपजा विषैला दाम्पत्य

सुना आपने! अपने पतियों को पत्नियों ने बर्तनों से मारा, झाड़ू से पीटा, बाल खींचे, नाखूनों से खंरोचा, दांत से काटा। ये सब लॉकडाउन के दौरान की ख़बरें हैं। मतलब सामीप्य से उपजा विषैला दाम्पत्य।
हमारी सहानुभूति अधिकांशतया महिलाओं के साथ होती है। पर मेरा मानना है कि हिंसा एक गुण/अवगुण है जो समस्त प्राणियों में पाया जाता है।

हिंसा का हिंदी में मतलब जीव की हत्या करना या उसे किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाना जो प्रायः सभी धर्मों में पाप माना गया है, किसी को किसी प्रकार की हानि पहुंचाना, अनिष्ट अथवा अपकार करना, अंतरंग साथी अथवा जीवन साथी के साथ दुर्व्यवहार भी घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है इस क़ानून के तहत घरेलू हिंसा के दायरे में अनेक प्रकार की हिंसा और दुर्व्यवहार आते हैं।

विचार ये करना है कि आखिर ये ‘हिंसा’ है क्या बला?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की परिभाषा के अनुसार, हिंसा "स्वयं के विरुद्ध, किसी अन्य व्यक्ति या किसी समूह या समुदाय के विरुद्ध शारीरिक बल या शक्ति का साभिप्राय उपयोग है, चाहे धमकी स्वरूप या वास्तविक, जिसका परिणाम या उच्च संभावना है कि जिसका परिणाम चोट, मृत्यु, मनोवैज्ञानिक नुकसान, दुर्बलता, या कुविकास के रूप में होता हैं।

हालांकि संगठन यह स्वीकार करता है कि इसकी परिभाषा में "शक्ति का उपयोग" शामिल करना शब्द की पारंपरिक समझ को बढ़ाता है। इस परिभाषा में क्रिया को ही करने की साभिप्रायता शामिल है, चाहे उससे कुछ भी परिणाम उत्पन्न हो। हालांकि, आमतौर पर, जो कुछ भी हानिकारक या क्षतिकारक तरीके से उत्तेजित किया जाता है, वह हिंसा के रूप में वर्णित किया जा सकता है, भले ही वह हिंसा के मतलब से नहीं हो (किसी व्यक्ति द्वारा और किसी व्यक्ति के विरुद्ध)।हिंसक क्रियाएं निम्न हो सकती हैं:-


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शारीरिक
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यौन
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मनोवैज्ञानिक
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भावनात्मक

ऐसा नहीं है कि ऐसा सिर्फ़ भारत में ही है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने अप्रैल की शुरुआत में ही कहा था कि, "लॉकडाउन के दौरान दुनियाभर में घरेलू हिंसा के मामले में भयावह वृद्धि हुई है"

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, लेबनान और मलेशिया में हेल्पलाइन पर आने वाले कॉल्स की संख्या साल के इन्हीं महीनों में पिछले साल की तुलना में दोगुनी हो गई है तो वहीं चीन में तीन गुनी हो गई है।

लॉकडाउन के बाद फ़्रांस में घरेलू हिंसा की 32 फ़ीसदी शिकायतें बढ़ गईं हैं। स्पेन में फ़ोन पर शिकायतें 12 फ़ीसदी और ऑनलाइन सलाह देने वाली हेल्पलाइन पर 270 फ़ीसदी। इटली में भी ऐसी ही स्थिति है। ब्रज़ील में 40-50 फ़ीसदी तक केस बढ़ गए हैं। अमेरिका में हर रोज़ घरेलू हिंसा की क़रीब 2000 शिकायतें आ रही हैं और इसमें से क़रीब 950 में कोरोना वायरस का ज़िक्र आ रहा है।

हिंसा क्या है? इस प्रश्न के समाधान में कहा जा सकता है कि किसी प्राणी को प्राण-विहीन करना, दूसरे से प्राण विहीन करवाना या किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा किसी प्राणी को प्राण-विहीन करते हुए देखकर उसका अनुमोदन करना, किसी प्राणी पर शासन करना, दास बनाना, किसी भी प्रकार की पीड़ा देना, सताना या अशांत करना भी हिंसा है।

मन में कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) का जाग्रत होना भाव हिंसा है और मन के भाव को वचन और क्रिया का रूप देना द्रव्य हिंसा कहलाती है। अर्थात् मन, वचन और काय के दुष्प्रयोग से जो प्राणहनन या दुष्क्रिया होती है, वही हिंसा है।

पुरुषों के हित में काम करने वाली संस्थाओं के अनुसार लॉक डाउन के चलते पुरुषों पर प्रताड़ना के मामले 17.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।

वर्ष 2019 में देश में 76254मामले थे जो 2020 में 96834 हो गए।
मध्य प्रदेश में 2019 में 8108 मामले थे जो अब 9577 हुए।
इसके साथ ही भोपाल में, इंदौर में, जबलपुर में, ग्वलियर में 2019 में क्रमशः 400, 361, 328, 285 रहे।
वहीं 2020 में क्रमशः 470, 413, 374, 336 मामले दर्ज हुए।
ये आंकड़े 24 मार्च से लेकर 24 अप्रैल तक के हैं।
27 फीसदी मामले देश भर में बढ़े हैं। 20580 मामले तुलनात्मक रूप से ज्यादा बढ़े हैं। एक माह में 70 मामले तो केवल भोपाल में ही बढ़े हैं।

भोपाल नम्बर एक व इंदौर दूसरे नम्बर पर है।
शिकायत करने वालों में पुरुषों की आयु 25 से 45 वर्ष वाले हैं सबसे ज्यादा हैं। पौरुष हेल्प लाइन, इंदौर। भाई वेलफेयर, भोपाल। राष्ट्रीय पुरुष आयोग समन्वय समिति, दिल्ली। सेव इंडियन फेमिली फाउंडेशन जैसी संस्थाओं के पास पहुंची मदद की गुहार।

इससे सिद्ध होता है कि हिंसा का लैंगिक आधार नहीं होता। इस संसार में जो भी देहधारी है, वह किसी-न-किसी रूप में हिंसा करता ही है। यदि वह एक जगह स्थिर ही रहता है तो भी वह भोजन स्वरूप अन्न, फल, वनस्पति आदि तो ग्रहण करता ही है। अपने शरीर एवं अस्तित्व की सुरक्षा हेतु मनुष्य को कुछ विशेष प्रकार की हिंसा तो करनी ही पड़ती है। इन हिंसाओं के प्रमुख तीन कारण है-

व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण- भोजन आदि ग्रहण करने में हिंसा होती है, इसमें व्यक्तिगत स्वार्थ है क्योंकि भोजन से अपने शरीर की रक्षा होती है। परमार्थ के कारण- अन्य की सुरक्षा एवं शरण आदि हेतु की जाने वाली हिंसा। किसी प्राणी की सुख-शांति के लिए की जाने वाली हिंसा।

यदि शरीर के किसी अंग में घाव हो जाए तो कभी-कभी इस अंग को काटना पड़ता है। गांधीजी ने अपने आश्रम में एक मरणशील बछड़े को पीड़ामुक्त करने हेतु उसे मारने की आज्ञा दी थी। गांधीजी ने हिंसा की अवधारणा को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि ‘कुविचार हिंसा है, उतावली हिंसा है, मिथ्या भाषण हिंसा है, द्वेष हिंसा है, किसी का बुरा चाहना हिंसा है। जगत् के लिए जो आवश्यक वस्तु है, उस पर कब्जा रखना भी हिंसा है।’ गांधीजी के अनुसार अहम् या अहमत्व पर आधारित जितनी भी मानुषिक क्रियाएं हैं। वे सभी हिंसा ही है। जैसे-स्वार्थ, प्रभुता की भावना, जातिगत विद्वेष, असन्तुलित एवं असंयमित भोगवृत्ति, विशुद्ध भौतिकता की पूजा, अपने व्यक्तिगत और वर्गगत स्वार्थों का अंधसाधन, शस्त्र और शक्ति के आधार पर अपनी कामनाओं की संतृप्ति करना, अपने अधिकार को कायम रखने के लिए बल का प्रयोग तथा अन्य व्यक्तियों के अधिकारों का अपहरण आदि।

प्रताड़ना को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक व लैंगिक आधार पर बांटा गया है। ज्यादा कॉल शारीरिक प्रताड़ना के आये।

राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, लॉकडाउन के बीच महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन शोषण, घरेलू हिंसा और मारपीट की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है। अप्रैल माह में महिलाओं के खिलाफ होने वाले साइबर क्राइम में 54 शिकायतें ऑनलाइन दर्ज हुईं। जबकि मार्च में 37 शिकायतें सामने आई थीं और वहीं फरवरी में 21 शिकायतें ही दर्ज की गई थीं। लॉकडाउन के बीच ऑनलाइन शिकायतों में काफी वृद्धि हुई है।

आकांक्षा फाउंडेशन की संस्थापक आकांक्षा श्रीवास्तव के मुताबिक, 25 मार्च से 25 अप्रैल तक उन्हें साइबर अपराध की कुल 412 शिकायतें मिली थीं। जिनमें से 396 शिकायतें ऐसी थीं, जो काफी गंभीर थीं। इसमें महिलाओं के साथ मारपीट, दुर्व्यवहार, अश्लील वीडियो, धमकी, गाली-गलौज और फिरौती की मांग से लेकर ब्लैकमेलिंग तक शामिल है।

बता दें यह संगठन लोगों को महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध को लेकर जागरूक करने का काम करता है। आकांक्षा श्रीवास्तव के मुताबिक, लॉकडाउन के बीच उन्हें हर रोज औसतन 20 से 25 शिकायतें मिल रही हैं, जबकि लॉकडाउन से पहले तक यह संख्या काफी कम थी। इससे पहले उन्हें रोजाना 10 या उससे कम शिकायतें ही मिलती थीं। राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के 69, विवाहित महिलाओं की प्रताड़ना के 15, दहेज की वजह से हत्या के दो और बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के 13 मामले दर्ज हुए हैं।

2018 के आंकड़ों के मुताबिक़ "पति और रिश्तेदारों द्वारा महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के मामले क़रीब 32 फ़ीसदी है मतलब क़रीब एक तिहाई"

पुलिस ने 2018 में 103,272 ऐसे मामले दर्ज किए थे।
भारत के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक़ 2015-16 के दौरान 33 फ़ीसदी औरतों को किसी ना किसी रूप में अपने पति के हिंसा का शिकार होना पड़ा है फिर चाहे वो शारीरिक, यौनिक या फिर भावनात्मक स्तर पर हो।
लेकिन इनमें से सिर्फ़ 14 फ़ीसदी औरतें ही मदद के लिए सामने आईं। एनसीडब्ल्यू के आंकड़ों के मुताबिक, लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के 69 मामले, गरिमा के साथ जीने के 77 मामले, विवाहित महिलाओं की प्रताड़ना के 15 मामले, दहेज की वजह से हत्याओं के दो मामले, बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के 13 मामले दर्ज हुए हैं।

घरेलू हिंसा और प्रताड़ना की सर्वाधिक 90 शिकायतें उत्तर प्रदेश से आई हैं। दिल्ली से 37, बिहार से 18, मध्य प्रदेश से 11 और महाराष्ट्र से 18 शिकायतें आई हैं।

लॉकडाउन से पहले उत्तर प्रदेश से समान अवधि में 36, दिल्ली से 16, बिहार से आठ, मध्य प्रदेश से चार और महाराष्ट्र से पांच शिकायतें दर्ज हुई थीं।


23 मार्च से लेकर 16 अप्रैल के बीच मतलब क़रीब लॉकडाउन के शुरुआती तीन हफ़्ते में महिला आयोग में घरेलू हिंसा के 239 मामले दर्ज किए गए थे। यह उन 123 मामलों की तुलना में कहीं ज्यादा हैं जो लॉकडाउन शुरू होने से पहले उस महीने में आए थे।

प्रोफ़ेसर देशपांडे इस साल के मार्च और अप्रैल के महीने से 2019 के इन्हीं दोनों महीनों की तुलना करते हुए बताती हैं कि पिछले साल इस दौरान जहां औसतन पांच मामले प्रतिदिन आए हैं तो वहीं इस साल इस दौरान नौ मामले औसतन प्रतिदिन सामने आए हैं।

मतलब यह हुआ कि हिंसा तीन व्यापक श्रेणियों में विभाजित की जा सकती है-स्व-निर्देशित हिंसा, अन्तरव्यक्तिगत हिंसा, सामूहिक हिंसा और इसके दो रूप हो सकते है- भाव हिंसा और द्रव्य हिंसा। हिंसा के दो प्रकार है- अर्थ हिंसा, जो व्यक्ति अपने लिए, अपनी जाति, परिवार, मित्र, घर, देवता आदि के लिए त्रास एवं स्थावर प्राणियों का स्वयं घात करता है, दूसरों से करवाता है, घात करते हुए को अच्छा समझता है, वह अर्थ हिंसा है। अनर्थ हिंसा- जो व्यक्ति किसी प्राणी को अपने शरीर की रक्षा या अन्य उपयोगिता हेतु नहीं मारता किन्तु बिना प्रयोजनवश, कुतूहलवश प्राणियों को मारता है, छेदन-भेदन करता है, अंगों को काट डालता है, उपद्रव करता है, चपलतावश वनस्पतियों को उखाड़ता है, वह अनर्थ हिंसा है। कुछ विचारकों ने भी हिंसा के चार प्रकार बतलाए है-

संकल्पी हिंसा-सोच-विचार कर पहले से मारने का उद्देश्य बनाकर किसी प्राणी के प्राण हनन करना।
आरम्भी हिंसा-भोजनादि तैयार करने में जो हिंसा होती है। उद्योगी हिंसा-खेती-बाड़ी, उद्योग-धन्धे आदि करने में जो प्राणातिपात होता है। विरोधी हिंसा-समाज, राष्ट्र आदि पर हुए शत्रुओं या अत्याचारियों के आक्रमण का विरोध करने में जो हिंसा होती है। विडंबना के साथ साथ दुःख का विषय है कि सनातन धर्मी देश में जिसकी संस्कृति को विश्वव्यापी मान्यता है, जहाँ दाम्पत्य की गाथाएं, कथाएं प्रेमानुराग और समर्पण की मिसाल हों, उस देश में आज ये दुर्घटनाएं शर्मनाक हैं. सफल दाम्पत्य देश के उज्जवल भविष्य का आधार हैं. हिंसा का पनपना अपशगुन है. जरुरत है इनके कारणों को खोजने के साथ-साथ इनके उचित और प्रभावकारी समाधानों की जिससे कि देश की सामाजिक इकाई सुख शांति से अपना जीवन गुजार सके. क्योंकि हिंसा तो बुरी ही है वो किसी भी तरीके की हो...चाहे कोई भी करे....



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