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कृष्ण परम आनंद हैं

Written By WD Feature Desk
Updated: शनिवार, 16 अगस्त 2025 (09:22 IST)
- गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर
 
हर प्राणी केवल एक ही वस्तु खोज रहा है और वह है आनंद। चाहे कोई कहीं भी ढूंढ रहा हो और कुछ भी खोज रहा हो, चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक, फिल्मों या बार में, चर्च या मंदिर में हो, चाहे वह धन, यश या सत्ता हो, असली खोज केवल आनंद की ही है; और परमात्मा ही संपूर्ण आनंद है।ALSO READ: क्या था भगवान श्रीकृष्ण का पहला नाम? जानें पुराणों में क्या लिखा है
 
ईश्वर सत्, चित् और आनंद है। आनंद का परिष्कृत रूप ही परमानंद है, ऐसा आनंद जिसमें कोई व्याकुलता, पीड़ा या दुःख न हो; और कृष्ण उस परम आनंद के प्रतीक हैं। भगवान कृष्ण चंचल और नटखट हैं, और चंचलता निर्मल आनंद से ही उपजती है। किसी भी तरह की परिस्थिति कृष्ण से उनका आनंद छीन नहीं पाती।
 
नटखटपन आनंद का स्वाभाविक परिणाम है। कृष्ण ने अनेक बार असत्य कहा और अपने आसपास के लोगों को खिझाया, वे लोग स्वयं चाहते थे कि कृष्ण उन्हें सताएं। वे क्रोध में भर कर कृष्ण की शिकायत करने आते, पर जैसे ही वह उनके सामने आते, खिलखिलाने लगते, और उनका सारा क्रोध मिट जाता। शुद्ध आनंद की उपस्थिति में शिकायतें विलीन हो जाती हैं और जीवन एक खेल सा लगता है।
 
कृष्ण इतने आनंदित कैसे थे? क्या उनका जीवन केवल सुख-सुविधाओं से भरा था? नहीं, उनके जीवन में तो सब कुछ उलझा हुआ और अस्त-व्यस्त था, फिर भी उनकी मुस्कान सबको मोह लेती थी। उनकी मुस्कान इतनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली थी कि लोग अपना दुःख भूल जाते और आनंद से भर जाते। जब सब कुछ स्थिर और सुचारु चल रहा हो, तब मुस्कुराना आसान है, पर जब सब उलट-पुलट हो और तब भी आप मुस्कुराएं, तो यह सचमुच एक उपलब्धि है। रणभूमि में, जब चारों ओर अराजकता हो और स्पष्टता न हो, फिर भी जो व्यक्ति अपने मित्र को गहरी जागरूकता, निर्मल मन और उच्चतम ज्ञान दे सके, वह अद्भुत और अकल्पनीय है। कृष्ण का हर पहलू हमें विस्मित कर देता है।
 
आनंद जीवन का नृत्य है, और कृष्ण का जीवन वही शाश्वत नृत्य है। उनके खड़े होने का ढंग ही उनके संपूर्ण दर्शन को व्यक्त करता है, हाथों में बांसुरी और एक पांव दृढ़ता से जमीन पर। नृत्य तभी संभव है जब पांव पहले धरती को छूए। यदि पांव कीचड़ में धंसे हों तो नृत्य नहीं हो सकता, और यदि पांव धरा से ऊपर हों तो भी नहीं। एक पांव धरती पर दृढ़ता से टिके और दूसरा हवा में हो, तभी नृत्य घटित होता है।
 
कृष्ण हमारे भीतर छिपी सभी संभावनाओं का पूर्ण प्रस्फुटन हैं। भगवान कृष्ण का दिव्य नृत्य समाज के हर वर्ग को उनकी ओर आकर्षित करता था। कठोर तपस्वी संत हों या सरल, सहज गोपियां, सब समान रूप से उनकी ओर खिंच जाते थे। सबसे बड़ा आकर्षण तो दिव्यता का ही होता है, वह ऊर्जा जो सबको अपनी ओर खींच लेती है।
 
कृष्ण वह निराकार केंद्र हैं, जो हर जगह है। संसार में जो भी आकर्षण है, वह केवल कृष्ण से ही आता है। अक्सर लोग आकर्षण के पीछे छिपी आत्मा को नहीं देख पाते और केवल बाहरी खोल को थाम लेते हैं; जैसे ही वे उस खोल को पाने की कोशिश करते हैं, कृष्ण एक लीला करते हैं, अपना आत्मभाव खींच लेते हैं, और तब उनके हाथ केवल खाली खोल और आंखों में आंसू रह जाते हैं।
 
राधा की तरह चतुर बनो, कृष्ण की लीला में मत उलझो। कृष्ण राधा से कभी बच नहीं पाए, क्योंकि राधा का सम्पूर्ण जगत कृष्ण से ही भरा था। यदि तुम देख सको कि जहां भी आकर्षण है, वहां कृष्ण हैं, तो तुम राधा बन जाओगे! तब तुम अपने केंद्र में स्थित हो जाओगे।ALSO READ: जन्माष्टमी पर अपनाएं श्री कृष्ण नीति के ये 5 गुण, सफलता चूमेगी आपके कदम
 

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