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Written By राम यादव
Last Updated: सोमवार, 26 सितम्बर 2022 (19:40 IST)

लामबंदी का हो रहा है प्रबल विरोध, रूस छोड़कर भाग रहे हैं लोग

रूसी जनता को यदि कुछ भी भ्रम था कि यूक्रेन में जो कुछ हो रहा है, वह केवल एक तात्कालिक 'विशेष कार्रवाई' है या बाक़ायदा युद्ध, तो यह भ्रम 21 सितंबर की राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन की 'आंशिक लामबंदी' की घोषणा के साथ दूर हो गया है।
 
युद्ध और लामबंदी के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार लोगों की संख्या अब हज़ारों में पहुंच गई है। कतिपय सरकारी विभाग और अधिकारी भी पुलिस और सेना के कार्यों की आलोचना करने लगे हैं। रूसी राष्ट्रपति के अधीनस्थ मानवाधिकार परिषद के प्रमुख, वालेरी फ़देयेव ने रक्षामंत्री सेर्गेई शोइगु से देश के सैनिक भर्ती कार्यालयों के 'ज़ोर-ज़बर्दस्ती वाले तरीकों' को रोकने का आह्वान किया है। यहां तक कि जिन पुरुषों को युद्ध का कोई अनुभव नहीं है, उन्हें भी भर्ती के लिए हाज़िर होने के आदेश मिल रहे हैं। 
 
फ़देयेव के अनुसार, ऐसी नर्सों और दाइयों को भी भर्ती के लिए बुलाने के मामले हुए हैं, जिन्हें सेना के लिए काम करने का कोई अनुभव नहीं है। बुलावे के आदेश कभी-कभी रात दो बजे भी सौंपे गए हैं- 'मानो (जिन्हें बुलाया जा रहा है) वे सैन्य सेवा से जी चुराते हैं।' विदेशों के लिए सरकारी टेलीविज़न चैनल 'आरटी' (रशिया टुडे) की प्रधान संपादक, मार्गरीता सिमोन्यान ने भी सोशल मीडियम 'टेलीग्राम' पर इस अराजकता की आलोचना की। उन्होंने लिखा कि यह घोषणा की गई है कि 35 वर्ष की आयु तक के (सामान्य) लोगों को भी भर्ती किया जा सकता है।
 
सेना में भर्ती के लिए बुलावे : भर्ती के लिए बुलावे के आदेश सैन्य सेवा के अनुपयुक्त आधिक आयु के लोगों को भी भेजे गए हैं। रूसी सेना, सैनिक रह चुके या अनिवार्य सैन्य सेवा कर चुके 300,000 लोगों की तलाश में है। उन्हें बुलावे के आदेश भेजने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय राज्यपालों और ज़िला स्तर के स्थानीय सैन्य प्रतिस्थापन कार्यालयों की है। साइबेरिया में याकूतिया प्रदेश के प्रमुख, अइसन निकोलायेव ने स्वीकार किया कि वहां के कार्यालयों में भी गलतियाँ हुई हैं। ऐसे पुरुषों को भी बुलावा भेजा गया, जो लामबंदी के अंतर्गत नहीं आते। 
 
रूसी सोशल मीडिया पर ऐसे कई मामलों के वर्णन मिलते हैं, जिनमें कई बच्चों वाले परिवारों के पिताओं, युद्ध का कोई अनुभव नहीं रखने वाले पुरुषों या ऊंची आयु के बीमार रिजर्व सैनिकों ने भर्ती के लिए बुलाए जाने के अपने कटु अनुभव सुनाए हैं। विस्मय और आलोचना इस बात को लेकर भी है कि पुराने रिज़र्व सैनिकों की लामबंदी तो हो रही है, लेकिन विभिन्न सुरक्षा संरचनाओं के सदस्यों की नहीं। नेशनल गार्ड, गृह मंत्रालय के सैनिकों तथा जेल सुरक्षा बल सहित ऐसे लगभग10 लाख लोग हैं, जिन्हें लामबंदी के अधीन बुलाया जा सकता है, पर बुलाया नहीं जा रहा है।
 
दर्जनों शहरो में विरोध प्रदर्शन : रूस के कम से कम तीन दर्जन शहरों में आंशिक लामबंदी के विरोध में प्रदर्शन हुए हैं। पुलिस प्रदर्शनकारियों के साथ बहुत निर्ममता से पेश आती है। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो देखने में आाए, जिनमें राष्ट्रपति पुतिनत के अपने गृहनगर सेंट पीटर्सबर्ग में लड़ाकू वर्दी और हेल्मेट पहने पुलिसकर्मियों द्वारा प्रदर्शनकारियों को पीटते हुए दिखाया गया था। मानवाधिकार पोर्टल ovd.info ने प्रत्यक्षदर्शियों का हवाला देते हुए बताया कि सुरक्षा बलों ने बिजली के शॉक देने वाले डंडों का प्रयोग किया। देश भर में हुईं लगभग आधी गिरफ्तारियां मास्को में की गईं।
 
स्वतंत्र मीडिया ने देश के सुदूर पूर्व में ख़बारोव्स्क शहर और साइबेरिया के नोवोसिबिर्स्क, इर्कुत्स्क, तोम्स्क और चिता जैसे शहरों के प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें और वीडियो दिखाए। ovd.info के अनुसार, 24 सितंबर तक 1,300 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका था।
 
लंबी सज़ाओं के नए क़ानून : राष्ट्रपति पुतिन ने इस बीच एक ऐसे कानूनी संशोधन पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें उन सैनिकों के लिए जेल की लंबी सजा का प्रावधान है, जो भगोड़े बनेंगे या आत्मसमर्पण कर देंगे। जो कोई भी लामबंदी या युद्ध के दिनों में सेना को छोड़ देगा, उसे 15 साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है। जो कोई स्वेच्छा से शत्रुपक्ष का क़ैदी बनेगा - यूक्रेनी सरकार ने रूसी सैनिकों से यही आह्वान किया है - उसे 10 साल तक की जेल की सज़ा का सामना करना पड़ सकता है।
 
अनिवार्य सैन्य सेवा कर रहे ऐसे लोगों या आरक्षितों को भी 10 साल तक के लिए जेल जाना पड़ सकता है, जो युद्ध अभियानों में भाग लेने से इनकार करेंगे। आपराधिक कानून में संशोधन यह भी कहता है कि आदेशों का पालन करने से इनकार करने पर भी 10 साल तक जेल में बिताने पड़ सकते हैं। राष्ट्रपति पुतिन ने एक दूसरे कानून पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जो रूस के लिए लड़ने-भिड़ने का वचन देने वाले विदेशियों को रूस की नागरिकता देने में तत्परता का आश्वसन देता है।
  
देश छोड़ने वालों की बढ़ती संख्या : दूसरी ओर, रूसी अधिकारियों ने पहली बार देश छोड़ने वालों की संख्या में वृद्धि की भी पुष्टि की है। सेना में भर्ती से बचने के लिए हजारों लोग देश से भाग रहे हैं। उत्तरी ओसेतिया वाले रूसी क्षेत्र के गृह मंत्रालय ने कहा कि वहां 'निजी वाहनों की भारी भीड़ हो गई है।' 24 सितंबर को करीब 2,300 रूसी वाहन जॉर्जिया की सीमा पार करने की लाइन में खड़े थे। फ्रांस की 'एएफपी' समाचार एजेंसी के अनुसार, कज़ाकस्तान और मंगोलिया के साथ की रूसी सीमाओं पर भी कारों की लंबी कतारें थीं। प्रत्यक्षदर्शियों ने 'एएफपी' को बताया कि सीमा पार करने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। 
 
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के टिकटों के लिए भी आपाधापी मच गई है। रूस में लोकप्रिय बुकिंग साइट 'एवियालेस' के अनुसार, भूतपूर्व सोवियत संघ का अंग रहे निकटवर्ती देशों आर्मेनिया, जॉर्जिया, अज़रबैजान और कज़ाकस्तान के लिए सभी सीधी उड़ानें 21 सितंबर को ही पूरी तरह से बुक हो गईं। जो विमान टिकट पहले 350 डॉलर में मिला करते थे, वे अब 3000 डॉलर में मिल रहे हैं। आर्मेनिया के येरेवान हवाई अड्डे पर, रूसियों ने 'एएफ़पी' को बताया कि वे लामबंदी से भाग रहे हैं। 'एएफ़पी' के अनुसार, 45 वर्षीय दिमित्री ने अपनी पत्नी और बच्चों को घर पर ही छोड़ दिया। "मैं इस मूर्खतापूर्ण युद्ध में मरना नहीं चाहता। यह एक गृहयुद्ध है," दिमित्री ने कहा। 
 
कई देशों में रूसियों का आगमन वर्जित : युद्ध की शुरुआत के बाद से, आर्मेनिया रूस से भागकर निर्वासन में रहने का महत्वपूर्ण देश बन गया है। अर्मेनियाई अधिकारियों ने वहां रूसियों के कम से कम 40,000 आगमन दर्ज किए हैं। कहा जाता है कि करीब 50,000 लोग पड़ोसी देश जॉर्जिया में पहुंचे हैं। फ़िनलैंड के सीमा अधिकारियों ने 22 सितंबर को बताया कि सीमा पार कर वहां आने वालों की संख्या केवल 'मामूली' बढ़ी है। रूसियों को फ़िनलैंड जैसे यूरोपीय संघ के देश में प्रवेश करने के लिए वीज़ा अनिवार्य हो गया है।
 
पोलैंड और बाल्टिक सागरीय देशों ने तो रूसियों के आने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। किंतु जर्मनी ने कहा है कि वह रूसी सेना के भगोड़ों को स्वीकार करने के लिए तैयार है। जर्मनी की गृहमंत्री नैन्सी फ़ेज़र ने कहा: 'जो कोई राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के शासन का बहादुरी से विरोध करता है और इसलिए खुद को भारी ख़तरे में डालता है, वह अपने राजनीतिक उत्पीड़न के कारण जर्मनी में शरण पाने के लिए आवेदन कर सकता है।'
 
पहले ही अपू्र्व 'मस्तिष्क पलायन' : उल्लेखनीय है कि गत फ़रवरी में यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद से ही रूस के आईटी विशेषज्ञ, बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक भी हज़ारों, शायद लाखों की संख्या में देश से पहले ही पलायन कर चुके हैं। इतना बड़ा 'मस्तिष्क पलायन' (ब्रेन ड्रेन) रूस ने इस से पहले शायद कभी नहीं भुगता होगा। युद्ध में अब तक कितने रूसी सैनिक हताहत हुए हैं, इसे कोई नहीं जानता। पश्चिमी देशों में कुछेक अनुमान 50,000 हज़ार तक जाते हैं।
 
पुतिन ने यूक्रेन पर यदि कभी क़ब्ज़ा कर भी लिया, तो यही पाएंगे कि उन्होंने यूक्रेन को पूरी तरह खंडहर बना दिया है। वहां जो लोग उन्हें जीवित मिलेंगे, वे उन्हें अपने अंतरमन की पूरी गहराई से केवल कोसते-धिक्कारते दिखेंगे। पुतिन के अपने रूस में भी न जाने कितनी महिलाएं अपने पति, बच्चे अपने पिता और पिता अपने बेटे खो चुके होंगे। बिलख रहे होंगे। उनके पास भी कोसने-धिक्करने के सिवाए कुछ और नहीं होगा। पुतिन का हाल भी यदि हिटलर जैसा नहीं हुआ, तो भारत के अशोक महान की तरह शायद वे भी कभी पश्चाताप करेंगे कि इस विध्वंस-लीला से उन्हें और उनके देश को आखिर क्या मिला? 
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