dharma sangrah

यहां भगवान कृष्ण को सलामी दिए बिना आगे नहीं बढ़ता है ताजिया, जानिए क्या है श्री कृष्ण का मुहर्रम से कनेक्शन

Written By WD Feature Desk
Updated: शनिवार, 12 जुलाई 2025 (17:12 IST)
Muharram Krishna connection: भारत एक ऐसा देश है जहाँ विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का संगम देखने को मिलता है। यहाँ की 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' की मिसालें अक्सर देखने को मिलती हैं, और मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक ऐसी ही अनूठी परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो धार्मिक सौहार्द और आपसी भाईचारे का अद्भुत प्रतीक है। मुहर्रम के जुलूस के दौरान, जब ताजिया करबला पहुंचने से पहले आगे बढ़ता है, तो वह भगवान कृष्ण को सलामी देकर ही आगे बढ़ता है। यह परंपरा लगभग 200 साल पुरानी है और आज भी उतनी ही जीवंत है।

हजारी परिवार की भगवान में आस्था
यह घटना लगभग दो शताब्दी पुरानी है। भोपाल के भंडार (भिंडर) कस्बे में हजारी नाम का एक मुस्लिम परिवार रहता था।  एक दिन उन्हें तालाब में खुदाई के दौरान चतुर्भुज भगवान कृष्ण की एक प्राचीन और चमत्कारिक मूर्ति मिली थी। उस परिवार ने न केवल पूरी श्रद्धा के साथ मूर्ति की स्थापना की, बल्कि अपने खर्चे से एक भव्य मंदिर भी बनवाया। इतना ही नहीं, परिवार ने मंदिर के रखरखाव और पूजा-पाठ के लिए 5 बीघे जमीन भी दान में दे दी थी। यह कदम आज भी धार्मिक सहिष्णुता और उदारता की एक बेमिसाल मिसाल बना हुआ है।

हजारी परिवार की भगवान कृष्ण में गहरी आस्था थी। बताया जाता है कि ग्यारस (एकादशी) पर जब भगवान की मूर्ति को स्नान के लिए निकाला जाता था, तो हजारी परिवार का एक सदस्य अवश्य वहां मौजूद होता था। मान्यता थी कि केवल उस व्यक्ति के हाथों से ही मूर्ति उठती थी। यदि वह मौजूद न हो, तो सैकड़ों लोग मिलकर भी मूर्ति को हिला नहीं पाते थे।

भावनात्मक विदाई के साथ टूटी एक परंपरा, कायम है सलाम
समय के साथ, हजारी परिवार के अंतिम सदस्य ने भगवान से प्रार्थना करते हुए कहा था कि अब उनके परिवार में कोई नहीं है जो इस सेवा को आगे बढ़ा सके, इसलिए अब भगवान स्वयं ही अपनी मूर्ति को उठाएं। यह एक भावनात्मक विदाई थी, जिसने एक पुरानी परंपरा को तोड़ा, लेकिन भगवान के प्रति उनकी आस्था और समर्पण की कहानी आज भी जीवित है। मुहर्रम के जुलूस के दौरान, जब ताजिया करबला पहुंचने से पहले आगे बढ़ता है, तो वह भगवान कृष्ण को सलामी देकर ही आगे बढ़ता है।

सांस्कृतिक एकता की मिसाल: गंगा-जमुनी तहज़ीब
यह 200 साल पुरानी परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक सशक्त मिसाल है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि जब धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी करने की कोशिश की जाती है, तब इतिहास और विरासत मिलकर पुल बनाते हैं। भोपाल की यह अनूठी प्रथा भारत की विविधता में एकता का प्रतीक है, जहाँ हर मजहब का सम्मान किया जाता है और हर आस्था को गले लगाया जाता है। यह आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाती है, जब दुनिया में धार्मिक सद्भाव की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि असली ताकत आपसी प्रेम, सम्मान और सह-अस्तित्व में निहित है।
ALSO READ: Sawan 2025: सावन सोमवार व्रत के दिन इस विधि से करें शिव की पूजा, जानिए शुभ संयोग और पूजन मुहूर्त



लेखक के बारे में
WD Feature Desk
अनुभवी लेखक, पत्रकार, संपादक और विषय-विशेषज्ञों द्वारा लिखे गए गहन और विचारोत्तेजक आलेखों का प्रकाशन किया जाता है।.... और पढ़ें

Show comments

कालीघाट मंदिर में BJP CM शुभेंदु अधिकारी ने खाया Fish Bhog

BRICS Summit 2026 : PM मोदी और पुतिन की अहम मुलाकात, डिफेंस और एनर्जी सहयोग पर अहम फैसले

Electric Scooter : 1.18 लाख में 132 किमी की रेंज! Kinetic DX Plus का नया इलेक्ट्रिक स्कूटर लॉन्च, फीचर्स भी दमदार

8 लाख रुपए तक सस्ती Mahindra XEV 9S और XEV 9e, क्या BaaS में EV खरीदना फायदे का सौदा है?

अमेरिका में बड़ा चुनावी दांव: ट्रंप का ऐलान- हर वयस्क नागरिक को मिलेंगे 5000 डॉलर

सभी देखें

Indore में राहुल गांधी के 'छात्रों की गूंज' पर सियासी घमासान, आयोजन स्थल के लिए कांग्रेस ने चुकाए 10 लाख रुपए

ट्रम्प को भारत का कड़ा संदेश : पुतिन, शी जिनपिंग और पेजेशकियन संग मोदी ने बनाया नया ग्लोबल समीकरण

Nagpur में SBI बैंक से 4 लाख रुपये की लूट, कर्मचारियों की आंखों में मिर्च पाउडर डालकर फरार हुआ आरोपी गिरफ्तार

BRICS Summit 2026 : कल दिल्ली में क्या-क्या रहेगा बंद और चीनी राष्ट्रपति के दौरे का भारत पर असर

यूपी में 1600 करोड़ से अधिक की 65 परियोजनाओं से बदलेगी स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर

अगला लेख