इंदौर की यादों में मन्नू भंडारी और मन्नू जी की यादों में इंदौर...

- डॉ. साधना भाया
मन्नूजी के साथ कुछ इस तरह शुरू हुआ का सिलसिला जैसे अभी-अभी पिछले दिनों की बात है। रात के 8.30 बजे के करीब कँपकँपाती उँगलियों से डायल पर नंबर घुमा रही थी। उधर जैसे ही रिसीवर उठा, धड़कनें थम-सी गईं, भीतर ही भीतर मन ईश्वर से लगातार अतिरिक्त शक्ति माँग रहा था बातचीत के लिए। सच तो है, कहाँ एक तरफ नामचीन शख्सियत मन्नू भंडारी और कहाँ दूसरी तरफ मैं एकदम अपरिचित अजनबी।

'हैलो'... अगले ही क्षण एकदम सधी हुई खनकदार आवाज कानों से टकराई।

'मन्नूजी से बात कर सकती हूँ?' मैंने अपने स्वर की कँपकँपाहट को छुपाने की भरसक कोशिश की।

'हाँ, मैं बोल रही हूँ।'

उस ओर मन्नूजी थीं, हाँ, वे ही जिनकी रचनाएँ मैं बचपन से न केवल पढ़ती रही हूँ वरन्‌ प्रशंसक भी हूँ।
'अकेली' कहानी पर बने सीरियल को देखकर आँखें बरबस भर आई थीं। मुझे अच्छी तरह से याद है, उन दिनों धर्मयुग में मन्नूजी का 'आपका बंटी' उपन्यास धारावाहिक छप रहा था। इस स्तंभ का यह आलम था कि हॉकर सड़कों पर 'आपका बंटी-आपका बंटी आ गया' चिल्ला-चिल्ला कर प्रतियाँ बेचा करते थे।

अब तो न वो दिन रहे न वो पत्रिकाएँ, न वो लेखक जो पाठकों को किसी रचना के लिए दीवानगी की हद तक पहुँचा दें। फोन करने के पहले कितनी उधेड़बुन थी। लगा था बातचीत नामुमकिन है। फिर उन्हें राष्ट्रीय पुस्तक मेले की साहित्यिक गतिविधियों के लिए आमंत्रित भी करना था। पर उनकी सरल-सहज स्वीकृति ने औपचारिकता के सारे दायरे तोड़ दिए। कितनी अजीब बात है कि दस मिनट पूर्व हम दोनों बेहद अपरिचित थे, पर छोटी सी बातचीत की श्रृंखला हमें बाँधे जा रही थी। दिल्ली और इंदौर के बीच 800 कि.मी. की दूरी सिमटकर रहगई थी, यह उनकी आत्मीयता और बड़प्पन ही तो था।
मन्नूजी का अपना घर, अपना मायका है इंदौर

'मल्हारी मार्तण्ड' के संपादक सुखसम्पति राय भंडारी इंदौर के लिए अपरिचित नाम नहीं है। वे भानपुरा के निवासी थे। परंतु बचपन से ही पढ़ने-लिखने के व्यसनी होने के कारण पैतृक जमींदारी और अन्य किसी व्यवसाय में मन भी नहीं रमा। उन दिनों वे अपनी प्रसिद्ध किताब 'भारत के देशी राज्य' लिख रहे थे और इसी सिलसिले में महाराजा तुकोजीराव होलकर से हुई उनकी आत्मीयता में बदल गई और वे इंदौर में बस गए थे।
1922-23 में भंडारी परिवार में मोरसली गली, बड़ा सराफा के मुहाने पर स्थित श्री हीराचंद कोठारी के मकान (वर्तमान में भी है) का आधा हिस्सा किराए पर ले लिया। करीबन चार-पाँच साल बाद शक्कर बाजार की लाल पत्थरवाली हवेली (आज भी है) के सामने वाली इमारत किराए से ली।

उन्होंने उसी मकान के एक कमरे में अपना दफ्तर खोला और 'किसान' पत्रिका का संपादन किया जो बरसों चला। घर के एक कमरे में उनके दस-बारह विद्यार्थी रहते थे। एक कमरे में परिवार और एक रसोई थी जहाँ विद्यार्थियों का भोजन सबके साथ ही बनता था। उनकी पत्नी अनूप कँवर बहुत ही मेहनती और रात-दिन परिवार के काम-काज में डूबी रहती थीं। सुखसम्पति राय पर सरस्वती की अपार कृपा थी। इंदौर के प्रतिष्ठित नागरिक सर सेठ हुकुमचंद, सरदार किबे, सर बाफना, कन्हैयालाल भंडारी का इनके यहाँ आना-जाना लगा रहता था। हिन्दी-अँगरेजी के शब्दकोश के आठ खंडों ने उन्हें हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित किया।
3 अप्रैल 1931 को भानपुरा में ही उनकी चौथी संतान ने किताबों के ढेर के बीच आँख खोली और जन्म-घुट्टी में किताबों का रस पीकर बड़ी हुई यही आज की मन्नू भंडारी हैं। मन्नूजी चार बरस तक इंदौर के शक्कर बाजार वाले मकान में, तत्पश्चात खजूरी बाजार में भी रहीं। तभी उनके पिता को व्यवसाय में जबर्दस्त आर्थिक घाटा होने के कारण इंदौर छोड़ना पड़ा और वे अजमेर चले गए।

मन्नूजी कि बड़ी बहन जिन्हें वे 'बाई सा' कहकर बुलाती हैं श्रीमती स्नेहलताजी बोर्दिया, इंदौर के सम्मानित परिवार से हैं। उनके पति श्री नवरतनमल बोर्दिया, डॉ. नंदलाल बोर्दिया के छोटे भाई लघु उद्योगों और हस्तकलाओं के उत्कर्ष के लिए अपने अवदान के लिए सदैव याद किए जाते हैं।
स्नेहलताजी ने स्वयं भी पढ़ने-लिखने का शौक विरासत में ही पाया। उन्होंने बताया- मन्नू हम भाई-बहनों में सबसे अधिक संवेदनशील और प्रगतीशील विचारों की रही है। कॉलेज में पढ़ती थी तभी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ी थी। अजमेर के गली-मोहल्लों में उनके तेजस्वी भाषण गूँजा करते थे। हालाँकि उनके पिता अक्सर नाराज हुआ करते थे कि मारवाड़ी लड़की चौराहे पर भाषण देगी तो ब्याह कौन करेगा?

स्नेहलताजी ने बताया- मन्नू ने जितनी उपलब्धियाँ पाई हैं, जीवन में उतने ही शारीरिक और मानसिक रूप से कष्ट उठाए हैं। मन्नू की पसंद अलग तरह की है। चकाचौंध, तड़क-भड़क नहीं चाहिए। कलफदार साढ़ियाँ पहनना और सहज रंगों की दुनिया में रहना पसंद करती है। भीड़-भाड़ से परे, आयोजनों से दूर, किताबों की दुनिया ही उनकी अपनी दुनिया है।
पुस्तकों, पुरस्कारों और पाठकों को लेकर बेहद चिंतित मन्नूजी
मन्नूजी के मन में अपनी अध्यापिकाओं के लिए प्रारंभ से ही आदरभाव रहा है, लेकिन यदि श्रद्धा का भाव जिनके प्रति आज भी है तो वे हैं सावित्री गर्ल्स हाईस्कूल अजमेर की शीला अग्रवाल, जिन्होंने उन्हें बाकायदा साहित्य का न केवल ककहरा सिखाया वरन्‌ शरत, प्रेमचंद, जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा आदि की रचनाएँ पढ़ने को दीं। उनके प्रिय लेखक यशपाल का क्रांतिकारी जीवन उन्हें बेहद प्रभावित करता रहा है।
उनकी पहली कहानी 'मैं हार गई' रचना यात्रा की शुरुआत थी। उनका कहना है कि कई बार खयाल आता है कि यदि पहली कहानी बिना छपे लौट आती तो लिखने का सिलसिला समाप्त हो जाता। इस कहानी की भी अपनी कहानी है। वे कहती हैं- मैंने कहानी लिखी और 'कहानी पत्रिका' में शामू सन्यासी (इंदौर) के पास भेज दी थी। वह क्षण वे आज भी नहीं भूलतीं, जब काफी दिनों बाद भैरवप्रसाद गुप्त की प्रशंसा के साथ कहानी की स्वीकृति मिली थी। पत्रिका में छपी पहली कहानी को देखना भीतर तक थराथरा देने वाले रोमांचक अनुभव से गुजरना था।

वे मानती हैं कि वैसा थ्रिल वैसा रोमांच तो उसके बाद कभी महसूस ही नहीं किया जबकि कई बड़े-बड़े और महत्वपूर्ण अवसर आते रहे हैं, यहाँ तक कि 'रजनीगंधा' फिल्म के सिल्वर जुबली समारोह के साथ ही धर्मयुग में धारावाहिक प्रकाशन, महाभोज का मंचन, अखबारों में प्रशंसासे भरी समीक्षाओं के साथ ही बड़ी उपलब्धि, (इंदिरा गाँधी काल में) 'पद्मश्री' की सूचना मिलना और सबके समझाने के बावजूद अपने उसूलों की वजह से लौटाना।
आज साहित्य में छाई राजनीति और उसकी वजह से गिरते स्तर को लेकर मन्नूजी बेहद चिंतित थीं। किताबों से पाठकों की दूरी के लिए जिम्मेदार वे पुस्तकों की निरंतर बढ़ती कीमतों को मानती थीं। राजनीति और पुस्तकों के मेले के बजाए वे सक्रियता और सृजन में विश्वास करती थीं। पुरस्कारों के बजाए पाठकों पर अधिक विश्वास करती थीं। पाठक ही उनकी पूँजी थीं।

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