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स्मृति शेष : पुष्पाजी का वात्सल्य सदैव रहेगा हमारे दिलों में....

मंगलवार,जनवरी 4, 2022
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अभयजी सपरिवार आये और उस दिन पहली बार मेरा परिचय उनकी धर्मपत्नी श्रीमती पुष्पा छजलानी जी से हुआ। उनसे परिचय तो मिसेस छजलानी जी के सम्बोधन के साथ करवाया गया था लेकिन सच कहूं तो उनकी शख्सियत उससे कहीं ज्यादा भव्य थी। एकदम शांत-सौम्य लेकिन एक राजसी ...
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मन्नू दी, आप बहुत खुश हो रही होंगी कि आखिर आपने मुझे मात दे ही दी और अकेले ही अपने सफर पर निकल गईं। कितना डरती थी आप मौत से ! कहां चला जाता है आदमी, आखिर होता क्या है उसका ? मैं तो कभी न मरना चाहूं, जब तक मैं अपना काम न पूरा कर लूं। ...
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'आपका बंटी', 'महाभोज' कई-कई बार पढ़े जा चुके थे। उनकी कहानी 'यही सच है' पर बनी फ़िल्म 'रजनीगंधा' के गीत, उस फ़िल्म में विद्या सिन्हा का अभिनय और एक बिलकुल अलग सी कहानी, इन सबके कारण वह फ़िल्म भी मन में बसी हुई थी। और ज़ेहन में थीं पाठ्यक्रम में पढ़ी ...
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उन दिनों धर्मयुग में मन्नूजी का 'आपका बंटी' उपन्यास धारावाहिक छप रहा था। इस स्तंभ का यह आलम था कि हॉकर सड़कों पर 'आपका बंटी-आपका बंटी आ गया' चिल्ला-चिल्ला कर प्रतियाँ बेचा करते थे।
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इसीलिये मैं श्रद्धेय विद्यानिवास मिश्र को कभी स्वर्गीय नहीं कहता,कम से कम मेरे लिए वे दिवंगत नहीं हुए। उनकी अक्षर काया अपूर्व है,यश काया अपरिमित और स्मृति काया अमर।
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पति की पोस्टिंग देहरादून हो गई थी दूसरी बार। देहरादून की वादियां तो सम्मोहित कर ही रही थीं। रह-रहकर गंगा की लहरें भी मुझे पुकारती मेरा तन-मन भिगोने को आतुर-सी लगीं।
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बाऊजी रोने लगे -'यह मनहूस शहर अब रहने लायक नहीं रहा। इसने हमसे भगतसिंह की कुर्बानी ले ली। अब हम यहाँ क्यों रहें!'
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जिसने सुना यही कहा नामवर जी के साथ एक युग का अवसान हो गया। हांलांकि वे गत सात-आठ वर्षों से स्वास्थ्य के कारण निष्क्रिय ही थे किंतु उनका होना मात्र एक मजबूत वटवृक्ष का होना था।
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सबसे बड़ी बात यह थी कि यह सूचना दे कौन रहा था? स्वयं डॉक्टर नामवर सिंह जी। मैं कुछ देर के लिए जैसे स्तब्ध सा हो गया। वे उधर से बोलते रहे और मैं कोई उत्तर नहीं दे पा रहा था।
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नामवर सिंह जी का जाना हिन्‍दी की आलोचना परम्‍परा के बहुत बड़े स्‍तम्‍भ का ढह जाना है।
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ये पंक्तियां प्रकृति के सुकुमार कवि व छायावाद के चार स्तंभों में से एक, सर्वथा अनूठे और विशिष्ट कवि सुमित्रानंदन पंत की हैं, जिनकी आज, 28 दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि है।
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'नहीं महाकवि और न कवि ही लोगों द्वारा कहलाऊं, 'सरल' शहीदों का चारण था कहकर याद किया जाऊं।' यह अभिलाषा थी राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण 'सरल' की।
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चाचा ने कहा -'तुझे पता नहीं, आज सुबह भगतसिंह को फिरंगियों ने फाँसी दे दी है। भगतसिंह को वहाँ का बच्चा-बच्चा जानता था। लोग गुस्से से इधर-उधर बौखलाए से घूम रहे थे और इस फिराक में थे कि कोई पुलिसवाला दिखे तो उसे वहीं खत्म कर दें पर भीड़ के उस अथाह ...
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मैं अटल तो हूं पर 'बिहारी' नहीं हूं। तब लोगों ने इसे अजीब ढंग से लिया था। लोगों को लगा कि वे 'बिहार' का अपमान कर रहे हैं। वस्तुत: उन्होंने कहा था कि असल में उनके पिता का नाम 'वसंत-विहार', 'श्याम-विहार', 'यमुना-विहार' की तरह ही 'विहार' है, तो उनका ...
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नीरज ने जिस कोमलता और रोमांस को फूलों के शबाब की तरह घोला, दिल की कलम से दर्शकों को जो इतनी नाजुक पाती लिखी वह कई कई सदियों तक अविस्मरणीय रहेगी।
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शानदार मोबाइल, टेबल पर कम्प्यूटर, गोदी में लैपटॉप, चांदी-सी चमकती रेशमी सड़कों पर चमचमाती हुईं कारें, आधुनिक सुविधाओं से लैस शताब्दी और राजधानी एक्सप्रेस जैसी रेलगाड़ियां! आज से 60 साल पहले इनकी कल्पना करना भी संभव नहीं था।
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अकविता की कठिन अराजकता से मोहमुक्त होकर समकालीन हिन्दी कविता में अपनी बेहद खास पहचान बनाने वाले धूमिल और जगूड़ी के साथ-साथ चन्द्रकांत देवताले का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान सुनिश्चित है।
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चंद्रकांत देवताले, क्या यह सिर्फ एक नाम था किसी वरिष्ठतम कवि का ....इस नाम के साथ उभरती है एक निहायत ही मासूम से व्यक्ति की याद, एक बेहद आत्मीय से सच्चे सरल इंसान की याद, मुझे याद है उनकी पहली और अंतिम दोनों ही भेंट।
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बात उन दिनों की है जब मेरे पापा, ऑडिनेंस फैक्ट्री, कानपुर में कार्यरत थे। फैक्ट्री के ही कैंपस में हमें बड़ा-सा घर मिल गया था। उस दिन हम तीनों भाई-बहन मम्मी के साथ नानी के घर गए थे। मां ने उस दिन नानी के घर ही रुक जाने की बात कही, जो हम तीनों ने ...
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