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यात्रा संस्मरण : गंगा कहे पुकार के (हर की पौड़ी)

सोमवार,सितम्बर 2, 2019
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बाऊजी रोने लगे -'यह मनहूस शहर अब रहने लायक नहीं रहा। इसने हमसे भगतसिंह की कुर्बानी ले ली। अब हम यहाँ क्यों रहें!'
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जिसने सुना यही कहा नामवर जी के साथ एक युग का अवसान हो गया। हांलांकि वे गत सात-आठ वर्षों से स्वास्थ्य के कारण निष्क्रिय ही थे किंतु उनका होना मात्र एक मजबूत वटवृक्ष का होना था।
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सबसे बड़ी बात यह थी कि यह सूचना दे कौन रहा था? स्वयं डॉक्टर नामवर सिंह जी। मैं कुछ देर के लिए जैसे स्तब्ध सा हो गया। वे उधर से बोलते रहे और मैं कोई उत्तर नहीं दे पा रहा था।
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नामवर सिंह जी का जाना हिन्‍दी की आलोचना परम्‍परा के बहुत बड़े स्‍तम्‍भ का ढह जाना है।
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ये पंक्तियां प्रकृति के सुकुमार कवि व छायावाद के चार स्तंभों में से एक, सर्वथा अनूठे और विशिष्ट कवि सुमित्रानंदन पंत की हैं, जिनकी आज, 28 दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि है।
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'नहीं महाकवि और न कवि ही लोगों द्वारा कहलाऊं, 'सरल' शहीदों का चारण था कहकर याद किया जाऊं।' यह अभिलाषा थी राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण 'सरल' की।
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चाचा ने कहा -'तुझे पता नहीं, आज सुबह भगतसिंह को फिरंगियों ने फाँसी दे दी है। भगतसिंह को वहाँ का बच्चा-बच्चा जानता था। लोग गुस्से से इधर-उधर बौखलाए से घूम रहे थे और इस फिराक में थे कि कोई पुलिसवाला दिखे तो उसे वहीं खत्म कर दें पर भीड़ के उस अथाह ...
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मैं अटल तो हूं पर 'बिहारी' नहीं हूं। तब लोगों ने इसे अजीब ढंग से लिया था। लोगों को लगा कि वे 'बिहार' का अपमान कर रहे हैं। वस्तुत: उन्होंने कहा था कि असल में उनके पिता का नाम 'वसंत-विहार', 'श्याम-विहार', 'यमुना-विहार' की तरह ही 'विहार' है, तो उनका ...
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नीरज ने जिस कोमलता और रोमांस को फूलों के शबाब की तरह घोला, दिल की कलम से दर्शकों को जो इतनी नाजुक पाती लिखी वह कई कई सदियों तक अविस्मरणीय रहेगी।
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शानदार मोबाइल, टेबल पर कम्प्यूटर, गोदी में लैपटॉप, चांदी-सी चमकती रेशमी सड़कों पर चमचमाती हुईं कारें, आधुनिक सुविधाओं से लैस शताब्दी और राजधानी एक्सप्रेस जैसी रेलगाड़ियां! आज से 60 साल पहले इनकी कल्पना करना भी संभव नहीं था।
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अकविता की कठिन अराजकता से मोहमुक्त होकर समकालीन हिन्दी कविता में अपनी बेहद खास पहचान बनाने वाले धूमिल और जगूड़ी के साथ-साथ चन्द्रकांत देवताले का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान सुनिश्चित है।
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चंद्रकांत देवताले, क्या यह सिर्फ एक नाम था किसी वरिष्ठतम कवि का ....इस नाम के साथ उभरती है एक निहायत ही मासूम से व्यक्ति की याद, एक बेहद आत्मीय से सच्चे सरल इंसान की याद, मुझे याद है उनकी पहली और अंतिम दोनों ही भेंट।
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बात उन दिनों की है जब मेरे पापा, ऑडिनेंस फैक्ट्री, कानपुर में कार्यरत थे। फैक्ट्री के ही कैंपस में हमें बड़ा-सा घर मिल गया था। उस दिन हम तीनों भाई-बहन मम्मी के साथ नानी के घर गए थे। मां ने उस दिन नानी के घर ही रुक जाने की बात कही, जो हम तीनों ने ...
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कुमार गंधर्व जी की 'उड़ जाएगा हंस अकेला... बोर चेता.. झीनी-झीनी चदरिया... सुनता है गुरु ज्ञानी... रचनाएं ऐसी है जो बरबस ही बांध लेती है। उनके गायन की एक खास शैली थी ....
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मेरे ख्याल से साहस का कोई काम केवल शारीरिक क्षमता से ही ताल्लुक नहीं रखता, बल्कि मानसिक शक्ति से किसी को उज्जवल भविष्य का रास्ता दिखाना, मानसिक संबल देना, बिना किसी नतीजे की चिंता किए भी साहस का काम हैं।
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गर्मी के दिनों में छत पर सोया था। सपने में देखा की गर्मियों की छुट्टियों में श्यामलाल के यहां उनकी साली आई। श्यामलाल की पत्नी की आवाज बहुत ही सुरीली थी।
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हम लोग लखनऊ से देहरादून वापस जा रहे थे। परिस्थिति कुछ ऐसी बनी कि मेरे और पतिदेव के कोच अलग-अलग हो गए। पति का कोच आगे और मेरा डिब्बा दो कोच छोड़ कर था। मेरे साथ मेरा दो महीने का बेटा भी था।
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बंगाल की हमारी बहुत प्रिय लेखिका और कार्यकर्ता महाश्वेता दी ने सदियों से पीड़ित जनजातियों के लिए अपना सारा जीवन और लेखन समर्पित कर दिया। उनका जाना बहुत सी यादों को ताजा कर गया।
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वे साधारण परिवार में जन्मे, साधारण से प्राइमरी स्कूल में पढ़े और साधारण से प्राइमरी स्कूल टीचर के बच्चे हैं। उनके पिता का नाम था कृष्णबिहारी वाजपेयी और दादा थे पंडित श्यामलाल वाजपेयी। उन्होंने सारे देश के सामने एक बार कहा था- 'मैं अटल तो हूं पर ...
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