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होलकर नरेशों ने हिन्दी को अपनाया

होलकर नरेशों की मातृभाषा मराठी थी और वे अगर चाहते तो मराठी को अपने राज्य में थोप सकते थे। लेकिन वे यह भी जानते थे कि सर्वसाधारण की भाषा हिन्दी को समुचित महत्व देकर प्रशासन तथा व्यापार का सफल संचालन किया जा सकता है। इसी आधार पर उन्होंने हिन्दी अपनाने की पहल की। हिन्दी स्कूलों में प्रोत्साहन हेतु राजपरिवार से जुड़े बच्चों को भी भेजा जाने लगा।
 
मालवा में होलकर राज्य की स्थापना के साथ-साथ हिन्दी पत्र व्यवहार की परंपरा को होलकर नरेशों द्वारा बनाए रखा गया। अहिल्याबाई होलकर के द्वारा राजपूत नरेशों को लिखे गए हिन्दी पत्र राजस्थान पुरालेख विभाग में आज भी सरक्षित हैं। इतना ही नहीं, होलकर राज्य में मनाए जाने वाले विशेष समारोहों के आमंत्रण पत्र भी इन राजपूत नरेशों को हिन्दी में भेजे जाते थे। उदारणार्थ, अहिल्याबाई की पुत्री मुक्ताबाई के पुत्र नत्थू के विवाह के उपलक्ष्य में जो निमंत्रण पत्र राजपूत नरेशों को भेजे गए थे, वे हिन्दी भाषा के थे।
 
इंदौर मदरसे के प्रधान अध्यापक मुंशी उमेदसिह के प्रयासों से ही इस मदरसे में हिन्दी विभाग की स्थापना की गई। इतना ही नहीं, हिन्दी स्कूलों को प्रोत्साहित करने के लिए इन स्कूलों में राजपरिवारों के बच्चों को भी अध्ययन हेतु भेजा जाने लगा।

1878 ई. में होलकर राज्य के तत्कालीन शिक्षा निरीक्षक (उत्तरी संभाग) श्री वासुदेव बल्लाल मूल्ये को राज्य के विद्यालयों में प्रयोग आने वाली पाठ्यपुस्तकों को हिन्दी भाषा में लिखने पर राज्य की ओर से ससम्मान पुरस्कृत किया गया था। श्री मूल्ये द्वारा राज्य में पहली बार हिन्दी में भूगोल, भारतीय इतिहास तथा गणित की पुस्तकें लिखी गई थीं।
 
होलकर राज के विद्यालयों में 19वीं शताब्दी के आरंभ होते ही हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि होना प्रारंभ हो गई थी। 1998-99 ई. में राज्य में कुल 85 विद्यालय थे, जिनमें से 14 शुद्ध हिन्दी के तथा 43 हिन्दी-मराठी विद्यालय थे।

1905 ई. तक मराठी के स्‍थान पर हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या राज्भयभर में बहुत अधिक बढ़ गई, जिससे होलकर सरकार ने इसी वर्ष 18 मराठी विद्यालयों को हिन्दी विद्यालयों में परिवर्तितत कर दिया। हिन्दी विद्यालयों की संख्या 1911 ई. तक राज्य के कुल विद्यालयों में 133 में से 114 थी।
 
1923 ई. में होलकर राज्य के समस्त विद्यालयों में अध्ययन करने वाले छात्रों की संख्‍या 17,143 थी, जिनमें से 12,891 विद्यार्थी हिन्दी का अध्ययन करते थे, जो कुल विद्यार्थियों की संख्‍या का लगभग 76 प्रतिशत था। इसी प्रकार 1,964 छात्राओं में से 964 छात्राएं हिन्दी पढ़ती थीं, जो कुल संख्‍या का लगभग 49 प्रतिशत था। राज्य द्वारा हिन्दी को प्रोत्साहित करने के प्रयासों से प्रेरित होकर ई. 1924 में राज्य के विद्यालयों में अध्यापन कराने वाले कुछ अध्यापक इलाहाबाद से संचालित होने वाली हिन्दी साहित्य सम्मेलन परीक्षा में सम्मिलित हुए, जिनमें से नारायणगढ़ विद्यालय के शिक्षक श्री ओंकारलाल भागवान ने इस परीक्षा का स्वर्ण पदक प्राप्त किया।

अगले ही वर्ष अर्थात ई. 1925 में राज्य में सबसे पहला महिला शिक्षिकाओं का बैच लेडी रीडिंग ट्रेनिंग स्कूल से हिन्दी अध्यापन का प्रशिक्षण लेकर निकला। ई. 1927 में इंदौर के होलकर महाविद्यालय में अर्थशास्त्र तथा आंग्ल साहित्य की स्नातकोत्तर कक्षाओं के साथ-साथ हिन्दी का भी अध्यापन बी.ए. कक्षाओं में प्रारंभ किया गया।

इस प्रकार हिन्दी का अध्यापन कार्य, जो ई. 1841 में प्राथमिक पाठशाला के माध्यम से प्रारंभ किया गया था। पूरे 86 वर्ष बाद जाकर महाविद्यालय में प्रवेश पा सका। होलकर नरेशों ने हिन्दी के समुचित महत्व को समझा और राजकीय कार्य, व्यापार के सफल संचालन के लिए हिन्दी भाषा को राज्य भाषा का स्तर प्रदान किया।

यूं तो होलकर प्रशासक मराठी भाषा को, जो उनकी मातृभाषा थी, राजकीय भाषा के रूप में जारी रख सकते थे। किंतु उन्होंने जनता की वास्तविक कठिनाइयों को महसूस किया और मराठी भाषा के मोह में न पड़कर हिन्दी को राजकीय भाषा का दर्जा प्रदान किया।

फरवरी 1904 ई. में होलकर राज्य के तत्कालीन राजस्व अधिकारी मेजर आर.बी. दुबे ने होलकर दरबार में हिन्दी भाषा को राज्य भाषा घोषित करने हेतु आवेदन करते हुए यह अनुशंसा की थी कि राज्य में जिस जनवर्ग से उनका संपर्क आता है, वह हिन्दी भाषी है। अत: यदि मराठी के स्थान पर हिन्दी को राजकीय एवं कार्यालयीन भाषा के रूप में मान्य कर लिया जाए तो वह राज्य और जनता दोनों के हित में होगा।

इतना ही नहीं, मेजर श्री दुबे ने अपने आवेदन में यह भी लिखा कि आबकारी तथा चुंगी विभाग के वे नियम व उपनियम, जो मराठी भाषा में हैं तथा जो जनसाधारण के लिए बनाए गए हैं, उन्हें समझने में राज्य का सर्वसाधारण नागरिक असमर्थ है।

राजस्व एकत्रित करने वाले अधिकारी इसका लाभ उठाकर साधारण जनता से न केवल निर्धारित राशि से अधिक वसूली करते हैं, अपितु ऐसे करों की वसूली भी करते हैं, जिन्हें होलकर राज्य कभी लागू करने की इच्छा नहीं रखता। उपरोक्त आवेदन पर होलकर नरेश महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) तथा उनकी कौंसिल के विद्वान सदस्यों ने उचित रीति से विचार-विमर्श किया और हिन्दी की आवश्यकता व महत्व को भली-भांति समझा।

मराठी और हिन्दी का मामला
कौंसिल ने विचार-विमर्श के पश्चात बुधवार, 24 फरवरी 1904 ई. के अपने प्रस्ताव क्र. 115 द्वारा यह आदेश प्रसारित किया कि 1 मई 1904 ई. से हिन्दी भाषा को होलकर दरबार तथा न्यायालयों की भाषा के रूप में स्वीकार किया जाता है।
 
जब इस प्रकार की घोषणा होलकर दरबार द्वारा की गई तो मराठी व अन्य भाषा-भाषी लोगों के मस्तिष्कों में विभिन्न प्रकार की धारणाओं ने जन्म लेना प्रारंभ कर दिया। वे अपने आपको राज्य की ओर से उपेक्षित समझने लगे। उन लोगों की इन विपरीत धारणाओं का खंडन करने हेतु होलकर दरबार की कौंसिल ने सोमवार 17 अक्टूबर 1904 ई. को एक अन्य प्रस्ताव क्र. 884 पारित किया जिसका सारांश इस प्रकार है- इंदौर राज्य मराठी भाषा-भाषी जनता अल्पसंख्यक है।

1901 की जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट है कि राज्य की कुल जनसंख्‍या 8,50,690 में से 7,60,000 व्यक्ति हिन्दी भाषा-भाषी हैं। केवल 37,912 व्यक्ति ही ऐेसे हैं, जो मराठी भाषा-भाषी हैं। इसके अतिरिक्त केवल 24,620 लोग भीली, 11,564 लोग गुजराती तथा 10,817 उर्दू भाषा का ज्ञान रखते हैं। हिन्दी भाषी लोग मराठी भाषा का भी ज्ञान रखते हैं। उन्होंने इसे कार्यालयीन उपयोग हेतु सीखा है अथवा उन्हें ऐेसे विद्यालयों में प्रवेश दिया जाता है जिनकी शिक्षा का माध्यम मराठी है।
 
संपूर्ण राज्य में ग्रामीण अभिलेख तथा राजस्व विषयक लेख हिन्दी में लिखे जाते हैं। भूतपूर्व नरेश द्वारा हिन्दी को पुलिस तथा सैन्य विभाग में पहले ही कार्यालयीन भाषा के रूप में घोषित किया जा चुका है। केवल न्यायालयों, कोषालयों तथा राजस्व कार्यालयों में अमीन से ऊपर के स्तर पर साधारणतया मराठी भाषा का प्रयोग किया जाता है। इसका मूल कारण यही है कि मराठी उच्च वर्ग की भाषा है अथवा उस वर्ग की भाषा है जिसमें से अधिकांश अधिकारियों का चयन किया गया है।

चूंकि आरंभ में न्यायालयीन सूचना पत्र, साक्ष्य कथनों तथा न्यायाधीश द्वारा प्रदत्त न्यायिक आदेशों आदि को लिपिबद्ध करने का माध्यम मराठी था, इसलिए न्याय के लिए वादी तथा प्रतिवादी पक्ष एवं साक्ष्यदाता न्यायालय की कार्रवाई से पूर्णत: अवगत नहीं हो पाते थे। जिसका दुष्परिणाम यही था कि सभी स्तर के लोगों को न्यायालय में आवेदन करने अथवा न्यायालयीन पत्रों का उत्तर देने के लिए प्राय: व्यावसायिक मराठी भाषी लोगों की सहायता लेनी पड़ती थी।

हिन्दी को राज्य भाषा बनाने में कौंसिल का उद्देश्य यही है कि राज्य की जनता तथा अधिकारी वर्ग के मध्य सीधा संपर्क स्थापित हो सके। इंदौर राज्य दंड संहिता की धारा 506 के अंतर्गत यह प्रावधान है कि यह सरकार पर निर्भर होगा कि वह न्यायालयीन भाषा का दर्जा किस भाषा को प्रदान करे। प्रशासकीय सुविधा को ध्यान में रखते हुए यह स्थान हिन्दी भाषा को प्रदान किया गया है, क्योंकि वह जनता की प्रमुख भाषा है।

प्रशासन के साधारण कार्यों में हिन्दी के उपयोग को अब अनुमोदित कर दिया गया है, इससे जनता को अब दोहरा लाभ होगा। पहला तो यह कि अब जनता शासकीय कर्मचारियों से उसकी स्वयं की भाषा में संपर्क स्थापित करेगी तथा दूसरा- जैसा कि मंगलवार 26 अप्रैल ई. 1904 के राजस्व सूचना पत्र क्र. 15 में निर्देशित किया गया है कि अब राजकीय सेवाओं में उन लोगों को भी अवसर प्रदान किए जाएंगे, जो योग्य तो हैं, किंतु राजकीय सेवा के लिए भाषा के आधार पर अयोग्य घोषित किए गए हैं।
 
सोमवार 29 फरवरी ई. 1904 को होलकर राज्य द्वारा प्रसारित एक शासकीय सूचना पत्र‍ द्वारा राजकीय अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि वे हिन्दी का पर्याप्त ज्ञान अर्जित कर लें जिससे कि वे भविष्‍य में कर्तव्यों को उचित निर्वाह कर सकें।
 
इस प्रकार जहां बहुसंख्यक जनता की भाषा हिन्दी को कार्यालयीन भाषा का स्तर प्रदान किया गया, वहीं नरेशों ने मराठी भाषी जनता तथा अधिकारियों के हितों का भी ध्यान रखा। उन्होंने जनसाधारण तथा प्रशासकीय अधिकारी वर्ग के मध्य सीधा संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। इससे भाषा के कारण राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार में कमी आई तथा योग्य हिन्दी भाषी लोगों को शासकीय सेवाओं में आने के अवसर प्राप्त हुए। होलकर राज्य के शिक्षा संचालक रानडे, इंदिराबाई भागवत के अतिरिक्त श्रीमती किबे की भूमिका हिन्दी के विकास में उल्लेखनीय रही।
 
जहां एक ओर होलकर सरकार द्वारा हिन्दी को शासकीय कार्यालयों की भाषा घोषित किया गया, वहीं उसके साहित्यिक विकास के लिए भी प्रयास किए गए। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर ई. 1915 में होलकर नरेश तुकोजीराव (तृतीय) के प्रयत्नों से मध्यभारत हिन्दी साहित्यिक संस्था की स्थापना की गई, जिसने मध्यभारत में न केवल हिन्दी के प्रचार-प्रसार व प्रकाशन का कार्य किया, अपितु प्रतिभावान साहित्यकारों को पर्याप्त प्रोत्साहन एवं आश्रय भी प्रदान किया।

इस संस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए होलकर दरबार की ओर से 2,500 रु. की वार्षिक सहायता प्रदान की जाती थी। इस समिति के द्वारा 1915 ई. से 1928 तक 5000 रु. प्रकाशित पुस्तकों के लेखकों को प्रोत्साहन पुरस्कार पुरस्कार के रूप में प्रदान किए गए। हिन्दी में कविता, नाटक, दर्शन शास्त्र, नैतिक शास्त्र, शरीर विज्ञान आदि पर रचना करने वाले साहित्यकारों को लगभग 16,000 रु. की सहायता उनकी 29 पुस्तकों के लिए प्रदान की गई।

इसके अतिरिक्त 1929 ई. में समिति को व्यवस्‍थित स्वरूप प्रदान करने के लिए दरबार की ओर से एक भवन का भी निर्माण किया गया। साथ ही मुद्रणालय की भी स्थापना की गई और एक मासिक पत्रिका 'वीणा' का प्रकाशन (हिन्दी में) इस समिति द्वारा प्रारंभ किया गया। हिन्दी के प्रोत्साहन हेतु 1944 ई. तक इस संस्था के सार्वजनिक पुस्तकालय में लगभग 10,780 पुस्तकों का भंडार सुरक्षित था।