इंदौर की पहचान दानवीर राव राजा सर सेठ हुकुमचंद

-अशोक देवले

इक्कीसवीं सदी के महानगर इंदौर में व्यापार, वाणिज्य व उद्योग पर किसी एक जाति, संप्रदाय या वर्ग विशेष का अधिकार नहीं है। एक तरफ यदि यहां महानगर की 'मॉल संस्कृति' पनप रही है तो दूसरी ओर पारंपरिक खुदरा व्यापार भी जीवित है। सिंधी, पंजाबी, ठाकुर, मुस्लिम, जैन कोई भी कहीं भी अपना व्यापार-व्यवसाय चला सकता है।

पर, एक वक्त था, जब होलकर शासकों, विशेष रूप सेतुकोजी द्वितीय, शिवाजीराव और तुकोजी तृतीय ने शहर इंदौर की समृद्धि बढ़ाने के लिए मारवाड़ी समाज को न केवल आमंत्रित किया, बल्कि उन्हें रहने-बसने, अपना व्यापार-वाणिज्य जमाने, उद्योग धंधे स्थापित करने के लिए हर संभव सहयोग भी दिया था। प्रत्युत्तर में मारवाड़ी समाज ने दिया था अपने में से ही एक बहुमूल्य रत्न, जिसका नाम था राव राजा, दानवीर, सर सेठ हुकुमचंद। सर सेठ ने शहर की नहीं, राज्य की नहीं बल्कि देशभर में अपने नाम, अपने शहर के नाम व मारवाड़ी समाज की ख्याति को कस्तूरी की सुगंध की मानिंद फैलाने में कोई कोताही नहीं बरती थी।
सर सेठ हुकुमचंद के पूर्वज

सर सेठ की पांचवीं पीढ़ी में मेंडसिल गांव लाडनूं (मारवाड़) में एक थे सेठ पूसाजी जो प्राकृतिक आपदा के चलते 1787 (संवत्‌ 1844) में अपने दो पुत्रों को लेकर छोड़ मालवा के इस सुंदर कस्बे (इंदौर) में आकर बस गए। होलकर राज्य की राजधानी थी तब महेश्वर और इंदौर था एक कस्बा, जिसकी आबादी महज पांच-7 हजार से अधिक नहीं थी, जो अधिकांशत: वर्तमान के जूनी इंदौरतक ही सीमित थी। देवी अहिल्या के देहांत के लगभग 23 वर्षों बाद 1818 में महेश्वर से राजधानी इंदौर लाई गई व कस्बानुमा इस शहर का भाग्य चमक उठा और इसके साथ ही चमक उठा सेठ पूसाजी का भाग्य।
पूसाजी के एक पुत्र श्यामाजी के तीन पुत्र थे और सबसे बड़े पुत्र थे सेठ मानिकचंद। सेठ मानिकचंद के पांच पुत्रों में से मन्नालालजी का कम उम्र में ही निधन हो गया, जबकि ओंकारजी, तिलोकचंदजी व मगनीरामजी के यहां कोई संतान नहीं थी। पांचवें पुत्र सेठ सरूपचंद का विवाह सोनकच्छ के सेठ स्वरूपचंद शिवलालजी के यहां हुआ था। पत्नी का नाम था जवरीबाई जो अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति की सुशील महिला थीं। इन्हीं जवरीबाई ने दितवारिया बाजार की हवेली में आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा संवत्‌ 1931 (14 जुलाई 1874, मंगलवार) को हमारे चरित नायक बालक हुकुमचंद को जन्म दिया। ज्योतिषियों की यह भविष्यवाणी थी कि जन्म लिया बालक अत्यंत प्रतापी, पराक्रमी, यशस्वी, दानी, सबका हितचिंतक और अटूट धन-वैभव का स्वामी होगा। और यह भविष्यवाणी आगे चलकर शत-प्रतिशत सच सिद्ध हुई।
सर सेठ के पिता सेठ सरूपचंद ने अपने भाई सेठ ओंकारजी व सेठ तिलोकचंद के साथ मिलकर सन्‌ 1880 में'तिलोकचंद हुकुमचंद' नाम से एक स्वतंत्र दुकान आरंभ की। चमत्कार शायद सर सेठ (हुकुमचंद) के नाम जुड़ने का था कि शीघ्र ही दुकान चल निकली। अफीम का व्यापार एवं साहुकारा, मुख्य रूप से ये दो काम थे। छह वर्ष की छोटी उम्र में ही सेठ हुकुमचंद का नाम व्यापार से ऐसा जुड़ा कि पूरी उम्र खप गई और सर सेठ अपनी व्यापारी एवं औद्योगिक सूझबूझ के कारण 'कॉटन किंग ऑफ इंडिया', 'मर्चेंट किंग', 'पायोनियर इन स्वदेशी इंडस्ट्री', 'व्यापारियों के बादशाह' आदि अन्य नामों से भी जाने जाते रहे। धन से ही धन बढ़ता है, कहावत पर सेठ साहब का पूर्ण विश्वास था और यह विश्वास उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया। जो फर्म (तिलोकचंद हुकुमचंद) उनका नाम जुड़ने के समय मात्र 10-15 लाख की थी, तेज गति से इतनी बढ़ गई कि जल्द ही सेठ हुकुमचंद की गणना करोड़पतियों में होने लगी।
सेठ साहब का व्यवसाय चक्र

सेठ साहब अपार साहस के धनी थे तथा जोखिम उठाने में उनका साहस उन्हें इतना साथ देता था कि बड़ी से बड़ी जोखिम उठाने में भी वे संकोच नहीं करते थे। उन्होंने विश्वभर के बाजारों की गतिविधियों का गहन अध्ययन किया। चारों दिशाओं के समाचार पत्र तथा व्यापारिकरिपोर्टें वे मंगाने लगे तथा व्यापार का रुख बैठाने लगे। मिली हुई जानकारियों की बि7 पर वे अपनी मोहरे ऐसी चलते कि उन्हें कभी मात नहीं मिलती थी। व्यापार-व्यवसाय में सेठ साहब ने कभी भी हठधर्मिता से काम नहीं लिया और न लकीर के फकीर बने, इसीलिए उन्होंने व्यापारिक और औद्योगिक क्षेत्र में चमत्कार कर दिखाया
बाजार के रुख के साथ रुख बदलना व नए व्यापार क्षेत्र को अपनाने में उन्होंने अपनी निपुणता का परिचय दिया। तभी तो अफीम ही नहीं शेयर, अलसी, रुई, चांदी, सोना, गेहूं, नमक, भड़ौंच की जीन आदि का व्यापार भी उन्होंने किया। 1910 तक तो यह हालत हो गई कि देश-विदेश के व्यापारिक क्षेत्र में सर सेठ के नाम की जबरदस्त धाक जम चुकी थी। 10-15 लाख की हार-जीत प्रतिदिन करना तो साधारण बात हो गई थी। सेठ साहब जब कॉटन का व्यवसाय करते थे, तब यह किंवदंती प्रसिद्ध हो गई थी, 'आज का भाव तो यह है कल का भाव सेठ हुकुमचंद जाने' एक व्यापारी के लिए इससे बड़ी गौरव की बात क्या हो सकती है।
अफीम का फायदा

भारत सरकार ने अफीम की निकासी पर नियंत्रण के लिए एक्सपोर्ट लाइसेंस प्रथा आरंभ की। सेठ साहब ने 20-25 लाख की हुंडियांअफीम खरीदने में लगा दीं। चारों तरफ मुनीम-गुमाश्तों को अफीम खरीदने भेजा गया। सब चकित थे कि सेठ साहब ये क्या कर रहे हैं। शीघ्र ही परिणाम सामने आए, अफीम की जो पेटी 12-14 सौ की मिलती थी, उसकी कीमत 10-15 हजार तक पहुंच गई। नतीजतन सेठ साहब ने दो-तीन करोड़ रुपए पैदा कर लिए, अन्य व्यापारी चमत्कृत हो गए। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने सेठ को 'मर्चेंट प्रिंस ऑफ मालवा' लिखा। लेकिन शीघ्र ही सेठ साहब ने अफीम के व्यापार को तिलांजलि दे दी एवं रुई, अलसी, चांदी और सोने का हाजर वायदे का सौदा शुरू किया (1910)। इसमें भी प्रतिदिन 10-10 लाख की हार-जीत कर लेना मामूली बात हो गई। प्रथम विश्व युद्ध के चलते भी सेठ साहब को फायदा ही हुआ।
व्यापार में इतना रम जाने के बाद भी वह सेठ साहब के स्वभाव का अंग नहीं बन पाया। लाखों का वारा-न्यारा करने के बावजूद सेठ साहब की सट्टे के प्रति उपराम वृत्ति पैदा हुई। सेठ साहब ने सार्वजनिक मंच से सट्टे के विरोध में विचार व्यक्त किए और सट्टे के कार्य को छोड़ने का संकल्प भी ले लिया।


कपड़ा मिलों की स्थापना

इंदौर शहर को विशिष्ट पहचान दिलाने वाली कपड़ा मिलों की स्थापना सेठ साहब के हीविचारों और कल्पना का परिणाम था। सेठ साहब के हृदय में यह भावना पैदा हुई कि मालवा की रुई से कपड़ा यहां (इंदौर) ही क्यों न बनाया जाए। विचारों ने शीघ्र ही मूर्त रूप ले लिया। 10 लाख की पूंजी से मालवा कंपनी खुली, मालवा मिल बनी। इसके चार वर्ष बाद 1913 में हुकुमचंद मिल स्थापित हुई। मिल में लगी पूंजी थी मात्र 15 लाख और महायुद्ध के दौरान मिल का एक वर्ष का मुनाफा था एक करोड़, शेयरों का मूल्य आसमान छू रहा था, असाधारण सफलता थी ये।
तीन वर्ष बाद राजकुमार मिल और ग्वालियर महाराजा के अनुरोध और आमंत्रण को मानकर सेठ साहब ने उज्जैन में हीरा मिल शुरू की। यही नहीं उज्जैन में पूर्व से स्थापित अपने दामाद की विनोद मिल को आगे ले जाने का काम भी सेठ साहब ने किया। इस विनोद मिल के प्रबंधन के अंतर्गत एक और मिल (दीपचंद) भी संचालित की जाने लगी। धीरे-धीरे इंदौर से 9 मिलें संचालित होने लगीं, निश्चित ही प्रेरणास्रोत सेठ साहब ही थे।
कलकत्ता की हलचलें : कलकत्ता की जूट मिलों और उद्योग पर अंग्रेजों या विदेशियों का ही एकाधिकार था। सेठ साहब ने कलकत्ता की अपनी पहली यात्रा में जूट पाट की एजेंसी का काम शुरू कर दिया था।1919 में कलकत्ता जाने पर उन्होंने नैहाटी में 'द हुकुमचंद जूट मिल' नाम से 80 लाख की पूंजी की कंपनी खड़ी कर दी। जूट उद्योग में काम करने वाली यह पहली भारतीय मिल थी और सेठ साहब थे पहले भारतीय। इसमें 10 हजार श्रमिक काम करते थे और कुछ अर्से में मिल में 2125 करघे चलने लगे थे। इस जूट मिल को विश्व में तीसरा स्थान प्राप्त था।
इस सफलता से प्रेरित होकर सेठ साहब ने कलकत्ता में 25 लाख की पूंजी से 'हुकुमचंद आयरन एंड स्टील' नामक कंपनी खड़ी की। लोहे का यह कारखाना भी अपने ढंग का एक ही था। सेठ साहब ने भारत का पहला बिजली से चलने वाला स्टील वेल्डिंग कारखाना खोला। दवाइयों के बड़े कारखाने 'बंगाल केमिकल एंड फार्मास्यूटिकल वर्क्स' की स्थापना भी उन्होंने की। 1929 में हुकुमचंद एंड कंपनी ने बीमा का काम शुरू किया और इसके लिए 'हुकुमचंद इंश्योरेंस कंपनी लि.' शुरू की। आग, मोटर दुर्घटना और जीवन के बीमे का काम शुरू किया गया।
सार्वजनिक सेवा एवं परमार्थ कार्य

सेठ साहब ने अर्थार्जन किया, वह सांसारिक दृष्टि में कुबेर-सम कार्य था, परंतु सेठ साहब ने लोक सेवा रूपी धर्म का पालन भी बखूबी किया। उन्होंने जनकल्याणकारी मोक्ष कालक्ष्य कभी भी आंखों से ओझल नहीं होने दिया। कभी-भी ऐसा अवसर नहीं आया, जब धर्म, समाज एवं देश सेवा में उन्होंने सहयोग का हाथ न उठाया हो। जब जैसा समय उपस्थित हुआ, जैसी मांग उनसे जरूरतमंदों द्वारा की गई, सेठ साहब ने अपनी श्रद्धा एवं सामर्थ्य के अनुसार दिल खोलकर दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य, लोकसेवा, शिशुरंजन, गौसेवा, तीर्थ क्षेत्र, देवालय गरज कि सभी से संबंधित संस्थाओं को उन्होंने उपकृत किया। उस पुराने वक्त में 80 लाख का दान स्वयंमेव सबकुछ कह जाता है। धार्मिक दृष्टि से जहां विभिन्न तीर्थों की सुरक्षा के लिए उन्होंने अपूर्व योगदान दिया, वहीं जैन मुनि, त्यागी, विद्वान एवं पंडित भी सेठ साहब से तन-मन-धन से लाभान्वित हुए।
देशभक्त वे थे, जिस समय अंग्रेजों से भारत के सेठ-साहुकार भयभीत रहते थे। ऐसे समय उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अवसर पर गांधीजी के इंदौर आगमन पर स्वागताध्यक्ष का पदभार निर्भय होकर ग्रहण किया। प्रजामंडल के आंदोलनकारी सदस्यों को, गांधीजी, पं. मदनमोहन मालवीय को समय-समय पर आर्थिक मदद भी दी। गांधीजी द्वारा इंदौर में उद्‌घाटित खादी ग्रामोद्योग प्रदर्शनी में उन्होंने सक्रिय भूमिका अदा की। समाचार पत्रों में भी उनकाउल्लेख सच्चे देशभक्त के रूप में होता था। यही नहीं समाज में फैले विद्वेष को सर सेठ ने अपनी सूझबूझ से शांत कर एकता के सूत्र में बांधने के प्रयास भी किए।
धन के उपयोग में उत्साह : इंद्रभवन, शीश महल, मोती महल, कांच मंदिर का निर्माण, हाथी-घोड़े, जवाहरात, चांदी-सोने से मढ़ी कार, बग्घी, हाथी का हौदा, कुर्सियां चांदी-सोने की, स्वर्ण जड़ित शतरंज, भोजन के चांदी-सोने के थाल आदि सेठ साहब की परिष्कृत अभिरुचि के प्रतीक हैं और रहेंगे।

सर सेठ द्वारा स्थापित पारमार्थिक संस्थाएं

सेठ साहब में व्यावहारिकता एवं आध्यात्मिकता का अद्‌भुत समन्वय था। उन्होंने उत्कृष्ट धार्मिक प्रेरणा से समाज कल्याण को ध्यान में रखते हुए अनेक पारमार्थिक संस्थाओं की स्थापना कर लोक कल्याणकारी कार्यों में अपने धन का सदुपयोग किया और परमार्थ के लिए किसी भी क्षेत्र को अछूता नहीं रहने दिया। ऐसे कार्यों के लिए निर्माण और उन्हें संचालित करने के लिए एक ट्रस्ट बनाया गया, नाम था 'सर सेठ सरूपचंदजी हुकुमचंदजी दिगंबर जैन पारमार्थिक ट्रस्ट'। सदी पूर्व स्थापित इस ट्रस्ट के माध्यम से ही सर सेठ के लोकोपकारी रूप को सामने लाया गया।
इंदौर के जवरीबाग नसिया में संचालित की जाने वाली संस्थाएं : नसिया के परकोटे से घिरे विशाल प्रांगण में सर हुकुमचंद संस्कृत महाविद्यालय, सर हुकुमचंद दिगंबर जैन बोर्डिंग हाउस, विश्रांति भवन, प्रेमकुमारी देवी जैन स्मारक ग्रंथमाला, दानशीला कंचनबाई जैन कन्या पाठशाला, दिगंबर जैन असहाय विधवा सहायता फंड और श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर ट्रस्ट के जरिए ही अस्तित्व में आए।
शहर के पश्चिमी क्षेत्र में बियाबानी में प्रिंस यशवंतराव आयुर्वेदिक जैन औषधालय, प्रेमकुमारी देवी हॉस्पिटल, कंचनबाई प्रसूतिगृह एवं शिशु स्वास्थ्य रक्षा संस्था एवं जवाहर मार्ग पर दानशीला कंचनबाई दिगंबर जैन श्राविका आश्रम हैं।

संस्मरण

अंगूठी नहीं : सर सेठ एक बार ट्रेन से कहीं जा रहे थे और अखबार पढ़ रहे थे कि अचानक अखबार खिड़की से बाहर जा गिरा। उन्होंने कंडक्टर को बुलवाया और रेल रोकने को कहा। कंडक्टर ने विनम्र होकर कहा, 'रेल तो तभी खड़ी की जा सकती है, जब 250 रु. मूल्य की कोई वस्तु बाहर जा गिरे'। तुरंत सेठ साहब ने अनामिका से हीरे की अंगूठी निकाली और खिड़की के बाहर फेंक दी। ट्रेन रुक गई, रोकना पड़ी, अखबार तो मिल गया, पर सेठ साहब की हीरे की अंगूठी नहीं मिल पाई।
व्यायामसाधक सेठ साहब : उनका यह विश्वास था कि कमजोर शरीर में स्वस्थ आत्मा निवास नहीं कर सकती और रोगी देह से धर्म की साधना नहीं हो सकती। व्यायाम उनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका था। उन्होंने एक अखाड़ा बनवा रखा था तथा प्रतिदिन दंड-बैठक लगाते, मुद्‌गर घुमाते व 8 से 10 मील पैदल भ्रमण भी करते थे। चंदन गुरु के शिष्य सेवड़ेकर पहलवान सर सेठ की व्यायाम साधना के साक्षी रहे। एक सेर दूध में एक पाव घी, दो सेर रबड़ी व अन्य मिठाई, दो सेर दही, फल और मेवे उनकी प्रतिदिन की खुराक थी। वे कहते थे व्यायाम से जो इंसान निर्मित होता है, वह कायर न होकर निडर होता है।
कह देते कि इंदौर के महाराजा हैं : सेठ साहब अपने कर्मचारियों के साथ प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रहे थे। आर.सी. जाल (इंदौर के ख्यात उद्योगपति और महू के चार बार विधायक) तब सेठ साहब के निजी सचिव थे। देहरादून में एक अंग्रेज उसी डिब्बे में चढ़ा, सेठ साहब के ठाठ-बाट देख चकित अंग्रेज ने श्री जाल से अंग्रेजी में पूछा, 'ये कौन महाशय हैं'? जाल साहब ने भी अंग्रेजी में ही कहा, 'ये इंदौर के सबसे बड़े सेठ हैं'। अंग्रेज के उतर जाने के बाद सेठ साहब ने जाल साहब से सारा माजरा पूछा और थोड़ी नाराजगी की मुद्रा में बोले, 'यदि यह कह देते कि ये हीं इंदौर के महाराजा हैं, तो आपका क्या बिगड़ जाता?'



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