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चुनाव पर कविता : गुजराती हिमाचली उत्सव

Updated: शनिवार, 4 नवंबर 2017 (14:55 IST)
- पंकज सिंह
 
पहाडों पे लू चलती सुनी ना होगी
सर्दी समन्दर किनारे ना सही होगी
जाडे़ में होरी खिलती देखी ना होगी
बुढापे में जवानी आई सोची ना होगी
होरी आ गई जाडे़ में
नेता घूम रहे गली में 
वोट मांग रहे झोली में
खिजाब लगा रहे बालों में
देवर बन फिर रहे
भाभी के आगे गिड़गिडा़ रहे
धूल में लोट लगा रहे
वीर बन छाती फाड़ रहे
रूप देख लो तुम मेरा 
भूलना मत मेरा मोहरा
सेवा का सीख रहा ककहरा
हूं तो हूं विकास का चेहरा
फरमाइस भारी पड़ रही
जनता जैसे चहा नचा रही
उत्सव लोकतन्त्र का मना रही 
सब को अपना बता रही
पांच वर्ष में आया है
और नाचो जल्दी क्या है
द्वारका के हम रसिया है
राधे के मन बसिया है
प्रेम की हमारी ठाह नहीं
जीत के बाद तुम्हारा पता नहीं
गर्मी कितनी थर्मामीटर बताता नहीं
चुनाव में बुखार उतरता नहीं
बाबा पड़ रहा भारी है
बालकों के दिल बिठा रहा है
जाडे़ में पसीना दे रहा है
बाल गोपालौं को कंपकंपी छुडा़ रहा है
गुजरात हिमाचल झूम रहा है
कौन जीत रहा कह रहा है
जाडे़ में होरी क्या हो रहा है
बाबा विराट बन खेल रहा है।

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