नहीं रहे चित्रकार अकबर पदमसी, कलाकारों ने यूं किया याद

भारतीय आधुनिक चित्रकला में ख्‍यात नाम कलाकार अकबर पदमसी का सोमवार को निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे। फ्रांसिसी कलाकार सूजा, एमएफ हुसैन, सैयद हैदर रज़ा के साथ ही आधुनिक कला में पदमसी का बड़ा नाम था।

भारत सरकार ने साल 2010 में उन्‍हें ‘पद्मभूषण’ से सम्‍मानित किया था। उनकी अमूर्त कला ‘मेटास्‍केप’ सीरिज और मिरर इमेज
कला की दुनिया में काफी चर्चित रही। इसके साथ ही अपनी लंबी कला यात्रा में उन्‍होंने ऑइल पेंटिंग, प्‍लास्‍टिक इमल्‍शन, वॉटर कलर, स्‍क्‍ल्‍प्‍चर और फोटोग्राफी में बहुत काम किया। ललित कला अकादमी के साथ ही मध्‍यप्रदेश सरकार ने उन्‍हें साल 1997 में ‘कालीदास सम्‍मान’ से सम्‍मानित किया था।

मूल रूप से गुजरात के कच्‍छ के रहने वाले अकबर पदमसी का जन्‍म 12 अप्रैल 1928 में मुंबई में हुआ था। कला के प्रति उनका रुझान इलस्‍ट्रेशंस के साथ हुआ था, बाद में उन्‍होंने आर्ट के विभिन्‍न आयामों को एक्‍सप्‍लोर किया। कई सालों तक सिर्फ ‘ग्रे’ पर काम किया। साल 2016 में ही उनकी एक पेंटिंग 19 करोड़ रुपए में बिकी थी, जिसे सैफ्रॉन ऑर्ट इवनिंग सेल्‍स में रखा गया था। यह पेंटिंग उनके ‘ग्रे पीरियड’ का प्रतिनिधि चित्र थी। अकबर ने इसे 1960 में बनाया था। इसी ऑक्‍शन में चित्रकार वासुदेव गायतोंडे (10 करोड़ 12 लाख 50 हज़ार) और मकबुल फिदा हुसैन (4 करोड़ 44 लाख) की पेंटिंग क्रमश: दूसरे और तीसरे नंबर पर रही थी।


अकबर को ऐसे याद करते हैं कलाकार

वरिष्‍ठ कवि और लेखकअशोक वाजपेयी
ने उन्‍हें सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देते हुए लिखा।

'A major artist a modern who integrated passion with vision, a thinking artist who merged the metaphysical and the physical, a fine human being'

वरिष्‍ठ चित्रकार अखिलेश वर्मा बेहद विस्‍तार से उनके बारे में बताते हैं, वे कहते हैं, अकबर पदमसी उन बिरले चित्रकारों में से हैं जिन्‍होंने आधुनिकता को आत्मसात कर उसे भारतीय मुहावरे में ढाला। 1954 में उनक़े एक चित्र ‘Two lovers’ पर अश्लील होने का आरोप लगाया गया और उन्हें हाईकोर्ट तक घसीटा गया। पदमसी ने दोनों कोर्ट में अपना पक्ष मज़बूती से रखा और भारतीय मानस में अश्लील का विचार न होने को सिद्ध किया, इसके बाद वे बा-इज्जत बरी हुए।

अखिलेश बताते हैं कि इसी माह की 10 तारीख़ को मुंबई की एक गैलरी में इसी विषय पर उनकी प्रदर्शनी शुरू हो रही है जिसमें इस केस के बारे में अकबर विस्‍तार से बतलाने वाले थे। अकबर की प्रसिद्धि सत्तर के दशक में उनक़े बनाए ‘metascape’ से हुई।

उन्होंने कई साल तक ‘ग्रे’ रंग पर रिसर्च की और उसका प्रयोग अपने चित्रों में किया। वे प्रयोगधर्मी चित्रकार थे और हर नई तकनीक या माध्यम के प्रति उत्सुक और विचारशील रहे। वे हिंदुस्तान के पहले चित्रकार थे, जिन्होंने डिजिटल प्रिंट की पहली प्रदर्शनी की।

उन्हें युवा कलाकारों से मिलना और बात करना ख़ासतौर पर पसंद था। वे उस श्रेणी के कलाकार थे जो धीर-गंभीर हैं और अन्य कलाओं में रुचि रखते थे। उन्हें जवाहरलाल फ़ेलोशिप मिली फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखने के लिए जिसके तहत उन्होंने ‘SYGYZI’ नामक स्क्रिप्ट लिखी। प्रसिद्ध फ़िल्मकार मणि कौल, कुमार शाहनी और मनोचिकित्सक उदयन पटेल के साथ मिलकर इस पर काम भी किया। उन्‍हें मेरी श्रद्धांजलि।

वरिष्‍ठ लेखक और कला समीक्षक राजेश्‍वर त्रिवेदी कहते हैं, अकबर पदमसी ने अपनी कला में कई तरह के प्रभावों को आत्मसात किया। अपने चित्रों पर लगातार विचार करते हुए उन्होंने मेटास्केप नामक अपनी लंबी
चित्र श्रृंखला को जिस तरह तैयार किया था, आधुनिक भारतीय चित्रकला जगत में इसके पूर्व किसी भी कलाकार ने इस तरह का चित्रण नहीं किया था। भारतीय दर्शन और अध्यात्म को अपने विचारों में गहरे तक आत्‍मसात करने वाले अकबर पदमसी अपने रंगों से चित्रों में लगातार कल्पनाशीलता को प्रकट करते रहे। अकबर की रचना प्रक्रिया में उनके विचार चिंतन सबसे महत्वपूर्ण रहे हैं।

अपने समकालीन चित्रकार सयैद हैदर रज़ा और गायतोंडे आदि की तरह अकबर पदमसी भी भारतीय चित्रकला संसार में बेहद कल्पनाशील और विचारवान चित्रकार की तरह याद किए जाएंगे।


सिनियर आर्टिस्‍ट अवधेश यादव कहते हैं रज़ा साहब और हुसैन साहब के साथ ही अकबर पदमसी की कलाओं को बेहद करीब से देखा है। आधुनिक चित्रकला में वे एक बड़ा नाम थे और उनकी कला को निहारते हुए हम आज भी ब्रश चलाना सीख रहे हैं।

कवि और लेखक रंजीत होसकोटे ने ट्वीट कर उन्‍हें श्रद्धांजलि दी, उन्‍होंने लिखा, मैंने अपने एक और मार्गदर्शक को खो दिया, अपने शुरुआती दिनों में मैंने उनसे फिलोसॉफिकल और प्रैक्‍टिकल दोनों तरह के आयामों को सीखा। जब भी हम मिलते थे, कलाओं के बारे में अनुभव साझा करते थे।



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