ग़ालिब का ख़त- 29
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22 दिसंबर 1853 असदुल्ला
भाई साहिब,
आपके इनायतनामा से भाभी साहिबा के मिज़ाज की नासाज़ी और बच्चों की नाख़ुशी मालूम हुई। परवरदिगार सबको अपनी अमान में रखे। दिन बुरे हैं। यहाँ भी तप का मर्ज़ आ़म है? मगर अंजाब बख़ैर है। ये सब ख़ूबियाँ मेंह न बरसने की हैं। ख़ुदा से दुआ़ माँगता हूँ और आपसे चाहता हूँ कि अब जल्द आप सबकी ख़ैर-ओ-आ़फियत लिखें।
मिर्जा़ यूसुफ़ अ़ली ख़ाँ, अगर अभी वहाँ से न चले हों, तो उनको मेरी दुआ़ कहना, और यह कहना कि मियाँ तुम्हारा ख़त आया। तुम्हारे सब दोस्तों को सलाम कह दिया। वह सब सलाम कहते हैं। अब तुम मुंशी साहिब पर सब अमूर हवाला करकर चले आओ। दिरंग न करो।
ग़ज़ल देखी। भाई साहिब, इन ज़मीनों में मज़ामीन आ़शिक़ाना की गुंजाइश कहाँ? मुआफ़िक इस ज़मीन के अशआ़र मरबूत हैं। मुंशी अब्दुल लतीफ़ और उनके फ़र्जन्द बेगम और उसकी हमजोलियों को दुआ़।
10 अगस्त 1854 ई. असदुल्ला

