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वंदे मातरम् पर फिर घमासान: 150 साल पुराने गीत में आज का भारत क्या खोज रहा है?

Vande Mataram controversy

बंकिमचंद्र की कविता से स्वतंत्रता संग्राम के उद्घोष तक और 2026 की सियासी बहस तक—‘वंदे मातरम्’ की पूरी कहानी, जिसमें इतिहास भी है, विवाद भी और भारत को समझने का एक बड़ा सवाल भी।

वंदे मातरम्। दो शब्द। डेढ़ सौ साल का इतिहास। और आज फिर एक राजनीतिक विवाद। सवाल सिर्फ गीत का नहीं है। सवाल उस भारत का है, जिसे हम इन दो शब्दों में देखते हैं।

गुलामी का दर्द, आजादी का सपना, स्वदेशी आंदोलन, क्रांतिकारियों का साहस, संविधान सभा की गरिमा और आज की राजनीति की गर्मी—सब कुछ ‘वंदे मातरम्’ के साथ चलता आया है।

150 साल बाद भी अगर ये दो शब्द बहस के केंद्र में हैं, तो यह उनकी कमजोरी नहीं, उनकी ताकत का प्रमाण है। लेकिन कहानी 1875 से थोड़ी पहले शुरू होती है।

जब धरती सिर्फ जमीन नहीं, मां थी

अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त की एक पंक्ति है—
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं।

इसे आधुनिक राष्ट्रवाद का प्राचीन प्रमाण मान लेना इतिहास के साथ ज्यादती होगी। उस समय आधुनिक अर्थों वाला राष्ट्र-राज्य था ही नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि भारतीय सभ्यता में धरती को केवल जमीन नहीं, जीवन और मातृत्व से जोड़कर देखने का भाव बहुत पुराना है।

19वीं सदी में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसी सांस्कृतिक भावभूमि को औपनिवेशिक भारत की बेचैनी से जोड़ा और मातृभूमि को ‘मां’ की आवाज दी।

यहीं से ‘वंदे मातरम्’ की आधुनिक यात्रा शुरू होती है।

1875: कविता से राष्ट्रभावना तक

सरकारी अभिलेखों के अनुसार बंकिमचंद्र ने 7 नवंबर 1875 को ‘वंदे मातरम्’ की रचना की। बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ’ में शामिल किया गया।

‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है—मां को नमन।

पहले दो अंतरों में यह मां कोई युद्धरत देवी नहीं, बल्कि जल, हरियाली, फसल और शीतल हवा से भरी मातृभूमि है। लेकिन गुलाम भारत में अपनी मातृभूमि को नमन करना सिर्फ कविता कैसे रह सकता था? उसमें राजनीति अपने आप आ गई।

1896 में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया। इसके बाद यह साहित्य के पन्नों से निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन के मंच पर पहुंच गया।

फिर आया 1905।

1905: जब गीत नारा बन गया

बंगाल विभाजन के खिलाफ स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी का समर्थन, जुलूस, सभाएं और विरोध प्रदर्शन।
और हर जगह— वंदे मातरम्।
अब यह कविता नहीं थी।
यह सत्ता को चुनौती थी।

ब्रिटिश सरकार ने इसकी ताकत पहचानी और सार्वजनिक उपयोग को रोकने के प्रयास किए।
1906 में इसी नाम से Bande Mataram नाम का राष्ट्रवादी अंग्रेजी अखबार भी निकला, जिससे श्री अरविंद और बिपिन चंद्र पाल जैसे राष्ट्रवादी जुड़े।
एक गीत का नाम आंदोलन की पहचान बन चुका था।

लेकिन यहीं कहानी में एक जरूरी पेच आता है

‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे मातृभूमि और प्रकृति का वर्णन करते हैं। लेकिन आगे के अंतरों में मातृभूमि को दुर्गा और अन्य हिंदू धार्मिक प्रतीकों से जोड़ा गया है।

यहीं सवाल उठा— क्या एक बहुधार्मिक देश का साझा राष्ट्रीय गीत धार्मिक प्रतीकों से जुड़ा हो सकता है?
यह आज की राजनीति का पैदा किया हुआ सवाल नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही इस पर बहस हुई थी।
1937 में कांग्रेस के भीतर विचार के बाद राष्ट्रीय अवसरों के लिए पहले दो अंतरों को अपनाने की परंपरा बनी। कारण था—इनमें मातृभूमि और प्रकृति का वर्णन था, जबकि बाद के धार्मिक बिंबों को लेकर कुछ समुदायों की आपत्तियां थीं।

इसलिए आज इसे केवल गीत काट दिया गया” कहना इतिहास को बहुत सरल बना देना है।

लेकिन इसके उलट यह कहना भी सही नहीं कि मूल गीत में धार्मिक प्रतीक थे ही नहीं।

थे। बिल्कुल थे।

और शायद ‘वंदे मातरम्’ की सबसे बड़ी ऐतिहासिक सच्चाई यही जटिलता है।

आजादी की रात भी ‘वंदे मातरम्’ था

14 अगस्त 1947। देश आजादी की दहलीज पर था।
संविधान सभा की ऐतिहासिक बैठक शुरू हुई और सुचेता कृपलानी ने ‘वंदे मातरम्’ गाया।
जिस गीत ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी, वही आजाद भारत के जन्म का साक्षी बना।
15 अगस्त की सुबह पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की आवाज में इसके प्रसारण ने इसे स्वतंत्र भारत की शुरुआती सांस्कृतिक स्मृतियों में दर्ज कर दिया।
इतिहास में इससे खूबसूरत दृश्य कम होंगे—
जिस गीत पर कभी रोक लगाई गई, वही आजाद भारत की पहली सुबह में गूंज रहा था।

1950: राष्ट्रीय गीत, लेकिन राष्ट्रीय गान नहीं

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘वंदे मातरम्’, जिसने स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे जन गण मन’ के समान सम्मान और दर्जा दिया जाएगा।
इसलिए तथ्य बिल्कुल स्पष्ट है—

जन गण मन — राष्ट्रीय गान।
वंदे मातरम् — राष्ट्रीय गीत।

दोनों प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं और एक दूसरे का विकल्प भी नहीं हैं। दोनों की ऐतिहासिक यात्राएं अलग हैं।
एक स्वतंत्र भारत की संवैधानिक पहचान का गान बना; दूसरा स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति और मातृभूमि के प्रति भावनात्मक समर्पण की आवाज रहा।

फिर 150 साल बाद विवाद क्यों?

2025-26 में देश ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। इसी दौरान केंद्र ने सरकारी कार्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय गीत के छह अंतरों वाले पूर्ण आधिकारिक संस्करण और उसके प्रस्तुतीकरण को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया।

इसके बाद बहस तेज हुई—

पूरा गीत या पहले दो अंतरे?

भाजपा का तर्क है कि मूल रचना का पूरा सम्मान होना चाहिए।
कांग्रेस ने 1937 की परंपरा का हवाला देते हुए अपने कार्यक्रमों में पहले दो अंतरे जारी रखने का फैसला किया।
अब बहस सिर्फ गीत की नहीं रही।

राष्ट्रवाद, धर्म, तुष्टीकरण, इतिहास, कांग्रेस, भाजपा—सब एक साथ मैदान में हैं।
गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले पर तीखा हमला किया और इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी कांग्रेस पर इसी तरह के आरोप लगाए।

कांग्रेस का जवाब है—वह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वीकार की गई ऐतिहासिक परंपरा का पालन कर रही है।
लेकिन इस पूरी बहस में एक दिलचस्प विडंबना भी सामने आई।

20 अगस्त को भाजपा-शासित नागपुर नगर निगम की बैठक में भी केवल दो अंतरे गाए गए।
अब सवाल और दिलचस्प हो गया—

क्या यह विवाद इतिहास का है, प्रोटोकॉल का है या राजनीति का?

असल विवाद दो अंतरों का नहीं है

मेरी नजर में ‘वंदे मातरम्’ पर मौजूदा विवाद का असली सवाल यह नहीं है कि दो अंतरे गाए जाएं या छह।
बड़ा सवाल यह है—

राष्ट्रवाद की परिभाषा कौन तय करेगा?

एक पक्ष कहता है—मूल रचना का पूरा सम्मान होना चाहिए।
दूसरा कहता है—राष्ट्रीय प्रतीक ऐसा होना चाहिए जिसमें हर भारतीय अपने लिए जगह महसूस करे।
और इतिहास?

इतिहास दोनों से थोड़ा बड़ा है।
क्योंकि सच यह है—
वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन का महान राष्ट्रवादी उद्घोष था।
उसके मूल पाठ में धार्मिक प्रतीक भी हैं।
1937 में पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय उपयोग के लिए चुनने का ऐतिहासिक निर्णय भी हुआ था।
1950 में उसे राष्ट्रीय गीत का सम्मान भी मिला।
इनमें से किसी एक तथ्य को मिटाकर हम इतिहास नहीं लिख सकते।

भारत की खूबसूरती शायद इसी जटिलता में है

भारत ने 1950 में जन गण मन और वंदे मातरम्—दोनों को जगह दी।
क्योंकि राष्ट्र केवल भावनाओं से नहीं चलता।
और सिर्फ संविधान से भी नहीं।
राष्ट्र चलता है—
भावना और विवेक के बीच संतुलन से।
‘वंदे मातरम्’ हमें मातृभूमि से प्रेम करना सिखाता है। लेकिन लोकतांत्रिक भारत हमें यह भी सिखाता है कि मातृभूमि में सिर्फ हम नहीं रहते।
हमसे अलग सोचने वाला भी।
हमसे अलग पूजा करने वाला भी।
हमसे असहमत नागरिक भी।
वह भी उतना ही भारत है जितने हम हैं।

150 साल बाद ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ क्या है?

1875 में यह मातृभूमि की कविता थी।
1905 में प्रतिरोध का नारा बनी।
1947 में आजादी की आवाज।
1950 में राष्ट्रीय गीत।
और 2026 में?
शायद यह हमसे एक और कठिन सवाल पूछ रही है।
क्या राष्ट्रप्रेम सिर्फ नारा है?
या जिम्मेदारी भी?
क्या मातृभूमि को प्रणाम करना केवल मंच पर ‘वंदे मातरम्’ कहना है?
या उसकी नदियों, जंगलों, हवा, लोकतंत्र और संस्थाओं की रक्षा करना भी?
क्या देशभक्ति का अर्थ केवल अपने जैसे लोगों से प्रेम करना है?
या अपने से अलग नागरिक के अधिकार और सम्मान की रक्षा करना भी?
यहीं ‘वंदे मातरम्’ एक पुराने गीत से निकलकर आज के भारत का सवाल बन जाता है।

मां को नमन करना आसान है

डेढ़ सौ साल पहले ‘वंदे मातरम्’ गुलाम भारत के लिए स्वाधीनता का सपना था।
आज स्वतंत्र भारत में वही दो शब्द शायद हमें स्वतंत्रता की जिम्मेदारी याद दिला सकते हैं।
क्योंकि मातृभूमि को नमन केवल उसके नाम का उद्घोष करना नहीं है।
मातृभूमि को नमन उसके लोकतंत्र, उसकी विविधता, उसकी गरिमा और उसके हर नागरिक के सम्मान की रक्षा करना भी है।

आखिर—
मां को नमन करना आसान है।

मां के हर बच्चे को अपना मानना—शायद कहीं अधिक कठिन।

और अगर ‘वंदे मातरम्’ हमें यह कठिन काम सिखा दे, तो 150 साल बाद भी इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।
क्योंकि 150 साल बाद भी ‘वंदे मातरम्’ हमसे यही पूछता है—जिस भारत को हम मां कहते हैं, उसके लिए हम कर क्या रहे हैं?
वंदे मातरम्।
लेखक के बारे में
संदीप सिंह सिसोदिया
वन-लाइनर बायो: IIM इंदौर से प्रशिक्षित और 20+ वर्षों का अनुभव रखने वाले डिजिटल मीडिया लीडर व वरिष्ठ संपादक, जिन्होंने BBC,  DW, Yahoo और MSN जैसे वैश्विक संस्थानों के साथ कार्य किया है। वे जियो-पॉलिटिक्स, पर्यावरण और समसामयिक  मुद्दों पर अपने प्रखर लेखन और गहन विश्लेषण के लिए विशेष रूप से.... और पढ़ें
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