दिलीप कुमार : एक्टिंग स्कूल

'आन' भारत की पहली सोलह एमएम में शूट की गई रंगीन फिल्म थी और लंदन में प्रदर्शित की गई। इसकी कहानी भी 'शहीद' की तरह समसामयिक माहौल पर आधारित थी। इसमें दिलीप अत्याचारी राजा (प्रेमनाथ) का खात्मा करते हैं। नौशाद का संगीत और मोहम्मद रफी के गीत इसकी विशेषता थे।
इस फिल्म की इंदौर में लालबाग तथा नौलखा पुल पर शूटिंग की गई थी। 'मान मेरा अहसान, अरे नादान कि मैंने तुझसे किया है प्यार' इस फिल्म में दिलीप की दबंगता के अनुकूल गीत था। इसकी नायिका नादिरा थी और यह उनकी पहली फिल्म थी। इस फिल्म में मेहबूब नरगिस को लेना चाहते थे, लेकिन राज कपूर ने 'आवारा' की योजना को ध्यान में रखते हुए उन्हें नरगिस देने से इनकार कर दिया। बाद में वे 'मदर इंडिया' के लिए नरगिस को राज कपूर से 'अमानत' के रूप में लाए तो नरगिस सुनील दत्त से विवाह करके राज कपूर से बिछड़ गईं।

1953 में 'संगदिल', 'फुटपाथ' और शिकस्त फिल्में आईं। इनमें 'शिकस्त' अपने समय से आगे की कहानी थी, जिसमें दिलीप को अपने बचपन की दोस्त नलिनी जयवंत से विवाह करने से रोक दिया जाता है और वह गाँव छोड़कर चला जाता है। सात साल बाद वह फिर से गाँव लौटता है तो नलिनी को एक बच्चे की विधवा माँ के रूप में पाता है। लेकिन दोनों समाज के बंधन तोड़ने का साहस नहीं कर पाते।' अभिनय के छात्रों के लिए यह फिल्म खासतौर पर दर्शनीय है। इसमें दिलीप ने एक समाजसेवी डॉक्टर की भूमिका को सजीव कर दिखाया।

चार्लोट ब्रोण्ट के उपन्यास पर आधारित 'संगदिल' दिलीप-मधुबाला की रोमांटिक फिल्म थी, जिसमें अभिनेत्री शम्मी और कुलदीप कौर ने भी सहायक भूमिकाएँ निभाईं। 'फुटपाथ' में मीना कुमारी ने पहली बार के साथ जोड़ी बनाई।

'अमर' दिलीप कुमार की मेहबूब खान के साथ तीसरी और अंतिम फिल्म थी, इसमें मधुबाला और निम्मी थीं और नौशाद का संगीत। 'इन्साफ का मंदिर है ये भगवान का घर है' 'मोहम्मद रफी का अमर गीत इसी फिल्म से है। 1954 में बनी इस फिल्म के साथ ही दिलीप कुमार की अभिनय-यात्रा का पहला दौर समाप्त हो गया।
1955 से दिलीप कुमार के अभिनय का दूसरा दौर शुरू हुआ, जब वे बिमल रॉय के संपर्क में आए। 'देवदास', 'आजाद', 'इंसानियत', और 'उड़न खटोला' इसी वर्ष प्रदर्शित हुईं। बिमल रॉय की 'देवदास' को शरत बाबू के उपन्यास का सर्वश्रेष्ठ फिल्मी रूपांतरण माना जाता है।

'इंसानियत' फिल्म से दिलीप कुमार ने दक्षिण भारतीय फिल्मोद्‍योग की तरफ रुख किया। इस फिल्म की नायिका बीना रॉय थीं, जो बाद में प्रेमनाथ की पत्नी बनीं। एसएस वासन की इस फिल्म के द्वितीय नायक देव आनंद थे, जिन्होंने बाद में कभी दिलीप कुमार के साथ काम नहीं किया और न कभी पलटकर मद्रास गए। इस फिल्म के एक दृश्य में दिलीप कुमार के हाथों देव आनंद को एक चाँटा रसीद कराया गया था, जिसे देव के प्रशंसकों ने पसंद नहीं किया।

नया दौर (1957), मधुमती (1958), यहूदी (1958), पैगाम (1959), मुगल-ए-आजम (1960), कोहिनूर (1960), गंगा-जमना (1961) ये सब दिलीप कुमार के उत्कर्ष काल की फिल्में हैं। 'नया दौर' में दिलीप ने मधुबाला की जगह वैजयंतीमाला को रिप्लेस किया।

'मुगल-ए-आजम' उनका चरमोत्कर्ष थी, जिसके लिए दिलीप-मधुबाला ने आपसी अनबन के बावजूद साथ में काम किया। 'गंगा-जमना' का निर्माण स्वयं दिलीप कुमार ने किया और इसके निर्देशक नितिन बोस थे। यह पूरबी (भाषा) में बनी पहली फिल्म थी और बाद में इसकी तर्ज पर 'भोजपुरी' फिल्मों के निर्माण का एक नया सिलसिला ही चल पड़ा।
'गंगा-जमना' की भाषा सीखने के लिए दिलीप कुमार ने पूर्वी उत्तरप्रदेश का गहन दौरा किया और वैजयंतीमाला को भी भाषा के सबक दिए। 'गंगा-जमना' को पास करने के लिए सेंसर बोर्ड ने आपत्ति की कि इसमें डाकुओं को महिमा मंडित किया गया है। इससे दिलीप कुमार बहुत दुःखी हुए। तब श्रीमती गाँधी की मदद से दिलीप ने पंडित नेहरू से मुलाकात की। दिलीप ने नेहरूजी से कहा कि सेंसर बोर्ड तो शेक्सपीयर के 'हेमलेट' और मीरा के भजन (तेरे अंग से अंग लगा के मैं भी हो गई काली) में भी खोट देखता है। इस मौके पर दिलीप ने सेंसर बोर्ड के फच्चरों के अनेक उदाहरण इकट्‍ठे करके उजागर किए थे।

'गंगा-जमना' में दिलीप कुमार ने अपने अनुज नासिर खान को द्वितीय नायक की भूमिका दी थी। इसकी कहानी भी स्वयं दिलीप कुमार ने लिखी थी। बाद में फिल्मालय की 'लीडर' की कहानी भी दिलीप कुमार की थी। दिलीप कुमार की डायलॉग-डिलीवरी का अपना एक अलग था। जिसका अनुसरण कई लोगों ने किया। कुछ लोगों को उनकी फुसफुसाने की शैली से शिकायत भी रही।



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