ये 25 'महामानव' जिन्होंने बनाया भारत को

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
कृष्ण देवराय (1509-1529) : विजयनगर अर्थात जीत का शहर। कृष्ण देवराय के समय में विजयनगर सम्राज्य सैनिक दृष्टि से दक्षिण भारत का बहुत ही शक्तिशाली राज्य हो गया था। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में कृष्ण देवराय को भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक बताया है। कृष्ण देवराय के दरबार में तेलुगु साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे, जिन्हें 'अष्ट दिग्गज' कहा जाता था। कृष्ण देवराय को 'आंध्र भोज’ की उपाधि प्राप्त थी। राजा कृष्ण देवराय के दरबार का सबसे प्रमुख और बुद्धिमान दरबारी था तेनालीराम। असल में इसका नाम रामलिंगम था। तेनाली गांव का होने के कारण इसे तेनालीराम कहा जाता था।
 
तुंगभद्रा नदी के किनारे बसे हम्पी और डम्पी नामक शहर विजय नगर साम्राज्य की गौरव गाथा कहते हैं। हम्प‍ि कर्नाटक राज्य का हिस्सा है जो कभी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। राजा कृष्‍णदेव राय के समय में यह विजनगर सम्राज्य अपनी शक्ति के चरम पर था। कृष्णदेव राय एक यौद्ध होने के साथ-साथ कवि भी थे और घमंड से कोसो दूर रहते थे। कृष्णदेव राय ने जब सिंहासन संभाला तब उनकी उम्र महज 20 वर्ष थी और राज्य के खस्ता हाल थे। राज्य में अकाल पड़ा था। ऐसे में कृष्‍णदेव राय को उस समय अपने ही परिवार के अंदर भीतरघात का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने जल्द ही इन स्थितियों को बदल दिया। उन्होंने नए इलाकों पर जीत हासिल की और परंपरा के मुताबिक मंदिरों और गरीबों के लिए खूब दान दिया। कृष्णराय ने अपार सैनिक क्षमता, योग्य और कुलीनवर्ग के साथ एक राजसी साम्राज्य की स्थापना की। उन्होंने दरबारियों में इनाम और पद बांटे जाने की पुरानी परंपरा को तोड़ा और उन्होंने ऐसे यौद्धाओं को शामिल किया जिनका अपने शासक के साथ वर्ग या जाति का रिश्ता नहीं था। ये लोग खुद आगे बढ़ने वाले होते थे और अक्सर ये घुमक्कड़ होते थे। कृष्णदेव राज ने उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। उनके दरबारी जीवन का वर्णन उस काव्य में देखने को मिलता है जिसे उन्होंने खुद लिखा था जिसका नाम है 'अमुक्त माल्या।'
 
उस दौर में घोड़े भारत में दुर्लभ थे। पैदल, सेना, हाथी और तोप सभी उनके पास था। घोड़ों के व्यापार पर पहले अरबों और फिर पुर्तगालियों का नियंत्रण था। कृष्णदेवराय ने घोड़ों के व्यापार पर एकाधिपार करने की इच्छा से अरब से घोड़े मंगवाएं और उनका मुंह मांगा दाम दिया। कृष्णदेव राय के राज्य में मुसलमान सबसे ज्यादा सुरक्षित जीवन जीता था। जबकि कृष्णदेव राय पर मुस्लिम राजा सबसे ज्यादा आक्रमण करते थे। विजयनगर सम्राज्य के बारे में यह धारणा फैलाई गई की यह एक हिन्दू राज्य है जबकि कृष्णदेव राय के शासन में दोनों ही धर्म के लोगों को बराबर का दर्जा प्राप्त था। 
 
विजयनगर साम्राज्य का सच : विजयनगर साम्राज्य (लगभग 1350 ई. से 1565 ई.) की स्थापना राजा हरिहर ने की थी। मध्ययुग के इस शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना के बाद से ही इस पर लगातार आक्रमण हुए लेकिन इस साम्राज्य के राजाओं से इसका कड़ा जवाब दिया। यह साम्राज्य कभी दूसरों के अधीन नहीं रहा। इसकी राजधानी को कई बार मिट्टी में मिला दिया गया, लेकिन यह फिर खड़ा कर दिया गया। हम्पी के मंदिरों और महलों के खंडहरों के देखकर जाना जा सकता है कि यह कितना भव्य रहा होगा। इसे यूनेस्को ने विश्‍व धरोहर में शामिल किया है। दरअसल यह उस दौर का वैश्विस शहर था।
 
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना राजा हरिहर प्रथम ने 1336 में की थी। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना में हरिहर प्रथम को दो ब्राह्मण आचार्यों- माधव विद्याराय और उसके ख्यातिप्राप्त भाई वेदों के भाष्यकार 'सायण' से भी मदद मिली थी। हरिहर प्रथम को 'दो समुद्रों का अधिपति' कहा जाता था।
 
अनेगुंडी के स्थान पर इस साम्राज्य का प्रसिद्ध नगर विजयनगर बनाया गया था, जो राज्य की राजधानी थी। बादामी, उदयगिरि एवं गूटी में बेहद शक्तिशाली दुर्ग बनाए गए थे। हरिहर ने होयसल राज्य को अपने राज्य में मिलाकर कदम्ब एवं मदुरा पर विजय प्राप्त की थी। दक्षिण भारत की कृष्णा नदी की सहायक तुंगभद्रा नदी इस साम्राज्य की प्रमुख नदी थी। हरिहर के बाद बुक्का सम्राट बना। उसने तमिलनाडु का राज्य विजयनगर साम्राज्य में मिला लिया। कृष्णा नदी को विजयनगर तथा मुस्लिम बहमनी की सीमा मान ली गई। इस साम्राज्य में बौद्ध, जैन और हिन्दू खुद को मुस्लिम आक्रमणों से सुरक्षित मानते थे।
 
इस साम्राज्य की स्थापना का उद्देश्य दक्षिण भारतीयों के विरुद्ध होने वाले राजनीतिक तथा सांस्कृतिक आंदोलन के परिणामस्वरूप संगम पुत्र हरिहर एवं बुक्का द्वारा तुंगभद्रा नदी के उत्तरी तट पर स्थित अनेगुंडी दुर्ग के सम्मुख की गई। विजयनगर दुनिया के सबसे भव्य शहरों में से एक था।
 
इतिहासकारों के अनुसार विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 5 भाइयों वाले परिवार के 2 सदस्यों हरिहर और बुक्का ने की थी। वे वारंगल के ककातीयों के सामंत थे और बाद में आधुनिक कर्नाटक में काम्पिली राज्य में मंत्री बने थे। जब एक मुसलमान विद्रोही को शरण देने पर मुहम्मद तुगलक ने काम्पिली को रौंद डाला, तो इन दोनों भाइयों को भी बंदी बना लिया गया था। इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया और तुगलक ने इन्हें वहीं विद्रोहियों को दबाने के लिए विमुक्त कर दिया। तब मदुराई के एक मुसलमान गवर्नर ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और मैसूर के होइसल और वारगंल के शासक भी स्वतंत्र होने की कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद ही हरिहर और बुक्का ने अपने नए स्वामी और धर्म को छोड़ दिया। उनके गुरु विद्यारण के प्रयत्न से उनकी शुद्धि हुई और उन्होंने विजयनगर में अपनी राजधानी स्थापित की।
 
1356 में बुक्का प्रथम ने सिंहासन संभाला। हरिहर द्वितीय ने 1377 ईस्वी में सिंहासन संभाला इसके बाद विरुपाक्ष प्रथम 1404 में गद्दी पर बैठे। इसी सन् में बुक्का द्वितीय ने सिंहासन संभाला। इसके बाद 1406 ईस्वी में देवराय प्रथम ने राज्य का कार्यभार संभाला। इसके बाद देवराय द्वितीय को 1422 ईस्वी में सिंहासन सौंपा गया। देवराय द्वितीय के बाद विजयराय द्वितीय ने 1446 में राज्य का कार्यभार संभाला, फिर 1447 में मल्लिकार्जुन और इसके बाद विरुपाक्ष द्वितीय ने 1465 से 1485 तक शासन किया। अंत में प्रौढ़ राय 1485 ने शासन किया।
 
तीन वंश : इसके बाद इस साम्राज्य में 3 वंशों का शासन चला- शाल्व वंश, तुलुव वंश और अरविंदु वंश।
 
शाल्व वंश : शाल्व वंश के राजा नरसिंह देवराय ने 1485 में सिंहासन संभाला, फिर 1491 में थिम्म भूपाल और फिर 1491 में ही नरसिंह राय द्वितीय ने संभालकर 1505 तक राज किया।
 
तुलुव वंश : इसके बाद तुलुव वंश के राजा नरस नायक ने 1491 से 1503 तक राज किया। फिर क्रमश: वीरनरसिंह राय (1503-1509), कृष्ण देवराय (1509-1529), अच्युत देवराय (1529-1542) और सदाशिव राय (1542-1570) ने शासन किया।
 
अरविदु वंश : तुलव के बाद अरविदु वंश के राजाओं ने राज किया। इनमें क्रमश: अलिय राम राय (1542-1565), तिरुमल देव राय (1565-1572), श्रीरंग प्रथम (1572-1586), वेंकट द्वितीय (1586-1614), श्रीरंग द्वितीय (1614-1614), रामदेव अरविदु (1617-1632), वेंकट तृतीय (1632-1642), श्रीरंग तृतीय (1642-1646) ने राज किया।
 
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