दो विरही विराट समृद्धि की खोज में

मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस पर विशेष

विष्णुदत्त नागर|
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उन्नत बीज उत्पादन करने वाली कंपनियाँ जितने बैग राज्य को आवंटित करती हैं, उससे अधिक बैग वितरित होना आम बात बन गई है। उदाहरणार्थ 2006 में बी काटन का उत्पादन कर रही कंपनी ने मध्यप्रदेश को तीन लाख बैग आवंटित किए, लेकिन बाजार में 20 लाख बैग वितरित किए गए। इतने थैले कहाँ से आए?

ये वास्तव में नकली बीज होंगे, जिनका खामियाजा किसानों ने भरा। कृषि ऋण तथा सहकारी बैंकों की वास्तविकता यह है कि बहुधा छोटे किसान ही सहकारी बैंकों से ऋण लेते हैं। मध्यप्रदेश में जिला सहकारी बैंकों की आर्थिक स्थिति, पूँजी निवेश पर प्राप्तियाँ और देय उपलब्ध पूँजी आधार इतनी दयनीय स्थिति में पहुँच गए हैं कि सहकारी बैंकों में भी किसी के 100 रुपए जमा हैं तो 60-70 रुपए ही वापस हो सकते हैं।
गैर निष्पादित संपत्ति भी बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में सहकारी बैंकों की पूँजी सुदृढ़ीकरण के लिए पर्याप्त राशि का प्रावधान तात्कालिक आवश्यकता है। दोनों विरही विराटों को यह भली-भाँति समझना होगा कि देश के 15 राज्यों के अधोसंरचना ढाँचे में निचले पायदान से ऊपर बढ़ने के लिए कुछ स्फूर्तिदायक महत्वपूर्ण क्षेत्रों को चुनना होगा।

राज्य सरकारों द्वारा संचालित जनकल्याण की अवधारणा वांछनीय है, लेकिन कुछ गुणक क्षेत्र ऐसे होते हैं, जिन पर दोनों क्षेत्रों का विकास आधारित होता है। शिक्षा और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों की तर्ज पर विशेष शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन क्षेत्रों का विकास किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से नक्सलवाद ने दोनों राज्यों, विशेषकर छत्तीसगढ़ में अपने पैर पसारे हैं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर, दंतेवाड़ा और कांकेर जिलों में एक-तिहाई आबादी आदिवासियों की है। यद्यपि छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम अभियान ने सामाज के सैन्यीकरण से नक्सलवाद का सामना करने की रणनीति अपनाई है, लेकिन दिनचर्या में पुलिस या पेरामिलीटरी या अर्द्धसैनिक बलों का हस्तक्षेप आदिवासी सभ्यता-संस्कृति से मेल नहीं खाता।

सन्‌ 2006 में इलिना सेन की अध्यक्षता में नक्सलवादी समस्याओं का अध्ययन करने हेतु गठित समिति ने यह अनुशंसा की थी कि आदिवासियों से बलात्‌ भूमि अधिग्रहण और नक्सलवादियों से संघर्ष करने के लिए आदिवासियों के तदर्थ उपयोग को पुलिस के कवच के रूप में उपयोग करने और महिलाओं के यौन शोषण को रोका जाना चाहिए।
समिति ने सरकार को सुझाव दिया है कि बड़े पैमाने पर विस्थापन और आदिवासियों के हाशिए पर चले जाने पर आधारित आर्थिक विकास के मॉडल के स्थान पर ऐसा मॉडल और रणनीति तैयार करनी चाहिए, जिसमें गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, शोषण आदि समस्याओं से जूझ रहे आदिवासियों को मुक्ति दिलाई जा सके।

दरअसल, दोनों विरही और विकासोन्मुख राज्यों को नए विकास मॉडल और अपनी रणनीति के साथ-साथ निर्धारित प्राथमिकताओं से कार्य निष्पादन, संस्कृति, नौकरशाही के व्यवहार, रणनीति और धनराशि के पर्याप्त प्रावधान जैसे विषयों पर गंभीरता से पुनर्विचार करना होगा, तब ही समृद्धि आएगी।



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