पागलपंती के निर्देशक अनीस बज्मी ने कहा मैं बहुत डरपोक हूं

रूना आशीष| पुनः संशोधित मंगलवार, 12 नवंबर 2019 (16:39 IST)
'एक निर्देशक के लिए बहुत बड़ी चुनौती है कि वो नए जमाने के हिसाब से सोचे और फिल्म बनाए। बहुत मुश्किल होता है निर्देशक के लिए ये समझना कि कि आसपास क्या चल रहा है? दर्शक क्या चाहते हैं? न सिर्फ आसपास बल्कि पूरी दुनिया में क्या चल रहा है, इस बात को वो जाने और समझे। मैं फिल्में देखता हूं, वेब सीरीज देखता हूं, सीरियल देखता हूं और नाटक देखने जाता हूं। दिन के पूरे समय में एक समय मैं अपने लिए ऐसा भी रखता हूं, जब मैं बैठकर सिर्फ ये सोचता हूं कि मुझे अब आगे क्या करना है?'
इस महीने की 22 तारीख को रिलीज होने वाली फिल्म 'पागलपंती' के निर्देशक अनीस बज्मी पिछले 30 साल से भी ज्यादा समय से फिल्मी दुनिया से जुड़े हुए हैं। मसाला फिल्म हो या लोटपोट कर देने वाले डायलॉग- दोनों कामों में अनीस को दर्शकों की सराहना मिली है।

'वेबदुनिया' से बातचीत करते हुए अनीस बताते हैं कि मैं बहुत डरपोक किस्म का हूं कि क्या करूं? मुझे तो फिल्मों के निर्देशन के अलावा कुछ आता ही नहीं है। कहीं ये काम भी मेरा बंद न हो जाए, यह डर लगता है, इसीलिए मैं बहुत मेहनत करता कहता हूं।
उन्होंने कहा कि मेरी कंपनी में काम करने वाले सभी युवा हैं तो कई बार ये लोग नहीं जानते कि मैंने कैसी फिल्में बनाई हैं या किस तरह का मेरा काम करने का तरीका है, तो मैं उनसे बात करता रहता हूं और कहीं कोई कम्युनिकेशन गैप नहीं रखता हूं। मालूम तो चले कि नई पीढ़ी क्या सोचती है?

उन्होंने कहा कि हाल ही में मेरी टीम में एक शख्स ने अपना जन्मदिन दोस्तों के साथ एक क्लब में मनाया, तो मैंने उससे बात कर जाना कि पार्टी में क्या हुआ? बस इसी तरीके से अपने आपको नई पीढ़ी से जोड़े रखने में कामयाब हो जाता हूं।
आप नए कलाकारों के साथ भी काम करते हैं, आप कैसे उन्हें अपने सांचे में ढालते हैं?
मेरे लिखने का तरीका कुछ ऐसा होता है कि वह उन एक्टर्स को पसंद आ जाता है। मैं कभी कॉपी-पेन लेकर लिखने नहीं बैठता हूं। मैं मोबाइल में रिकॉर्ड करता हूं। मेरे डायलॉग आम बोलचाल की भाषा वाले होते हैं। कहीं कोई साहित्यिक या भारी-भरकम शब्द नहीं होते हैं। मैं सोचता हूं कि हर कैरेक्टर भले ही एक फिल्म का हिस्सा है लेकिन वो कभी एक जैसा नहीं हो सकता। मजनूं भाई कभी नाना पाटेकर यानी उदय जैसा नहीं बोलेगा। हर एक्टर में कुछ खूबी होती है तो कुछ कमी भी होती है इसीलिए हर कलाकार सुपरहिट नहीं हो सकता। आप 70 एमएम के पर्दे पर काम कर रहे हैं तो आपकी खूबियां भी 70 गुना बढ़ेंगी और आपकी कमियां भी 70 गुना लोगों के सामने आएंगी। अपने एक्टर की खूबियां बढ़ाकर कमियां हटाना ये मेरा काम है।

आपने कई लोगों के साथ काम किया है, पर्दे के पीछे भी और बतौर निर्देशक भी। किससे क्या सीखा?
मैंने राज खोसला, और मनोज कुमार जैसे बड़े लोगों से बहुत कुछ सीखा। बतौर लेखक बताऊं तो मैंने गुलजार साहब से उनके लिखने में सादगी सीखी कि अजीब शहर है ये, यहां के पेड़ फल देने से पहले मोल मांगते हैं या सलीम जावेद से भारी-भरकम बातें भी लिखना सीखीं। मसलन अगर इस दुनिया में इज्जत से जीना है तो इसका कुछ मोल तो देना होगा। मेरे डायलॉग लोगों को पसंद आए और प्यार भी मिला। मैंने एक तकिया कलाम लिखा तो सभी ने कहा कि तकिया कलाम छोटा होता है लेकिन मैंने बड़ा लिखा, जैसे 'भगवान का दिया सबकुछ है, दौलत है, शोहरत है, इज्जत भी है। बस, छोटी बहन की शादी हो जाए कोई खानदानी लड़का नहीं मिलता।' लेकिन मुझे अपने इस तकिया कलाम पर भरोसा था तो लिख दिया।
'पागलपंती' कॉमेडी फिल्म है, आपको कौन कॉमेडियन पसंद रहे हैं?
मुझे साहब बहुत पसंद रहे हैं। उनकी कैसी भी फिल्में आई हों, मैंने हमेशा देखी हैं। चाहे उस फिल्म में वे हीरो हो या न हों। मुझे आईएस जौहर पसंद थे, धुमाल या जगदीप बहुत पसंद थे। जॉनी वॉकर और केश्टो मुखर्जी बहुत पसंद रहे हैं। ये हमेशा मेरे जेहन में बसने वाले एक्टर रहे हैं।


की कॉमेडी के बारे में क्या कहेंगे?
मैं उनके बारे में क्या कहूं। वे कितना आउट ऑफ बॉक्स सोचते हैं, वर्ना कौन आधी पैंट पहनकर आधा टिकट लेकर फिल्म करेगा। 'हाफ टिकट' बनाने में भी उनकी कोई तो सोच रही होगी और वो सोच हम या आप जैसे लोग रख ही नहीं पाते। इन दिनों हम लेखकों ने कॉमेडियन के रोल को खत्म कर दिया कि कौन 2-2 लोगों को मेहनताना दें? हीरो से ही ये काम करा लेते हैं।
भूल-भुलैया में को नहीं लिया आपने?
मैंने तो उनके साथ एक से बढ़कर एक फिल्में की हैं तो मिस तो करता हूं उनको लेकिन इस बार की भूलभुलैया में सब कुछ नया सेटअप चाहिए था तो आप देखेंगे कि पुरानी फिल्म से कोई कलाकार रिपीट नहीं किया है। 'पागलपंती' के बाद अब उसी पर लगना है। जनवरी तक शूट शुरू करने का सोचा है।


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