एक बहादुर भारतीय जनरल, जिसे वीर चक्र भी नहीं मिला

Last Updated: मंगलवार, 27 सितम्बर 2016 (19:25 IST)
1962 के बाद पहली बार ने दिखाया कि चीनियों के साथ न सिर्फ़ बराबरी की टक्कर ली जा सकती है, बल्कि उन पर भारी भी पड़ा जा सकता है। जनरल वीके सिंह बताते हैं, "इत्तेफ़ाक से मैं उस समय वहीं पोस्टेड था। जनरल सगत सिंह ने जनरल अरोड़ा से कहा कि भारत-चीन सीमा की मार्किंग होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं सीमा रेखा पर चलता हूँ। अगर चीनी विरोध नहीं करते हैं तो हम मान लेंगे कि यही बॉर्डर है और वहाँ पर हम फ़ेंसिंग बना देंगे।"
"जब उन्होंने ये करना शुरू किया तो चीनियों ने विरोध किया। उनके सैनिक आगे आ गए। कर्नल राय सिंह ग्रनेडियर्स की बटालियन के सीओ थे। वो बंकर से बाहर आकर चीनी कमांडर से बात करने लगे। इतने में चीनियों ने फ़ायर शुरू कर दिया। कर्नल राय सिंह को गोली लगी और वो वहीं गिर गए।"
 
"गुस्से में अपने बंकरों से निकले और चीनियों पर हमला बोल दिया। जनरल सगत सिंह ने नीचे से मीडियम रेंज की आर्टलेरी मंगवाई और चीनियों पर फ़ायरिंग शुरू करवा दी। इससे कई चीनी सैनिक मारे गए। चीनी भी गोलाबारी कर रहे थे लेकिन नीचे होने के कारण उन्हें भारतीय ठिकाने दिखाई नहीं दे रहे थे।"
 
"जब सीज़ फ़ायर हुआ तो चीनियों ने कहा कि आप लोगों ने हम पर हमला किया है। एक तरह से उनकी बात सही भी थी। हमारे सारे शव चीनी क्षेत्र में पाए गए। बाद में सगत सिंह के अफ़सर उनसे नाराज़ भी हुए कि आपने ख़ामख़ा की लड़ाई कर दी।"
 
"हमारे करीब 200 लोग हताहत हुए। 65 लोग तो मारे गए। चीन के करीब 300 लोग हताहत हुए। लेकिन एक चीज़ ध्यान देने लायक थी कि 1962 की लड़ाई के बाद भारतीय सैनिकों के मन में चीनियों के प्रति जो दहशत बैठ गई थी, वो जनरल सगत सिंह के कारण ख़त्म हो गई। भारत के जवान को अहसास हो गया कि वो भी चीनियों को मार सकते हैं। पहली बार वी गेव द चाइनीज़ अ ब्लडी नोज़।"
 
जनरल सगत सिंह के सैनिक करियर का वो स्वर्णिम क्षण था जब उन्हें नवंबर 1970 में 4 कोर की कमान दी गई। इसने 1971 के बांग्लादेश युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई।
 
जनरल रणधीर सिंह बताते हैं, "अगरतला आकर उन्होंने देखा कि यहां तो कोई इंफ़्रास्ट्रक्चर ही नहीं है। ब्रॉड गेज लाइन 1400 किलोमीटर दूर थी। उन्होंने फिर सब ठीक करने का बीड़ा उठाया। काफ़ी तादाद में इंजीनयर लगाए गए। हमारी किस्मत इस मामले में अच्छी रही कि पाकिस्तानी सेना ने मार्च से अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ अत्याचार शुरू कर दिए थे। इसकी वजह से बहुत सारे शरणार्थी त्रिपुरा आ गए थे।"
"इन शरणार्थियों की मदद से इंजीनियर्स ने इंफ़्रास्ट्रक्चर खड़ा किया। याद रखें, तकरीबन एक लाख सैनिकों को वहां आना था। करीब तीस हज़ार टन के सैनिक साज़ो-सामान को भी वहां पहुंचना था। 5000 गाड़ियां और 400 खच्चरों की व्यवस्था होनी थी। वहां एक सिंगल लेन रोड थी और पुल तो इतने कमज़ोर थे कि मीडियम रेंज गन भी उसके पार नहीं जा सकती थी।"
 
युद्ध के दौरान जनरल सगत सिंह को फ़्लाइंग जनरल का नाम दिया गया। उनके एडीसी रहे लेफ़्टिनेंट जनरल रणधीर सिन्ह बताते हैं कि जनरल सगत सिंह सुबह छह बजे उठकर हेलिकॉप्टर में जाते थे। अगरतला हैंडीक्रॉफ़्ट इंपोरियम ने उन्हें एक पिकनिक बास्केट दे रखी थी।
 
"मैं उसमें कोल्ड काफ़ी और सैंडविचेज़ लेकर चलता था। पूरे दिन जनरल साहब लड़ाई का ऊपर से जायज़ा लेते थे। कई बार होता था कि जहाँ लड़ाई हो रही होती थी, वहीं वो लैंड कर जाते थे। शाम जब अँधेरा हो रहा होता था तब हेलीकॉप्टर वापस लैंड करता था...फिर वो ऑपरेशन रूम में जाते थे।"
 
"नौ बजे आल इंडिया रेडियो के समाचार सुनने के लिए हम आफ़िसर मेस में आते थे। हम कभी बीबीसी लगाते थे, तो कभी ऑल इंडिया रेडियो। रात दस बजे जनरल सगत सिंह हुक्म पास करते थे मुझे कि कल का कार्यक्रम ये है। आप सब को सूचना दे दीजिए। इसके बाद वो डिनर खा कर रात बारह बजे अपने हट में जाकर सो जाते थे।"
 
इसी तरह के एक हेलीकॉप्टर मुआयने के दौरान जनरल सगत के हेलिकॉप्टर पर पाकिस्तानी सैनिकों ने गोलियाँ चलाईं थीं।
जब जनरल के हेलीकॉप्टर में 64 सूराख हो गए... पढ़ें अगले पेज पर...

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