उत्तर प्रदेश: बीजेपी क्या योगी और मौर्य को सुरक्षित सीटों से मैदान में उतार रही है?

BBC Hindi| पुनः संशोधित रविवार, 16 जनवरी 2022 (07:30 IST)
अनंत झणाणे, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चुनाव लड़ने को लेकर रहा सस्पेंस अब ख़त्म हो गया है। बीजेपी ने 2022 की सबसे पहली सूची में उन्हें गोरखपुर सदर और उप मुख्यमंत्री को कौशांबी की सिराथू सीट से चुनाव लड़ाने का एलान किया है।
 
गोरखपुर सदर का चुनाव छठे चरण में और सिराथू का पांचवें चरण में होने जा रहा है। पार्टी ने शनिवार को 403 में से 105 सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम जारी कर दिए हैं।
 
गोरखपुर योगी आदित्यनाथ का गृह ज़िला है और उसे 'सीएम सिटी' का दर्जा भी हासिल है। फ़िलहाल वो एमएलसी रह कर मुख्यमंत्री बने हैं, लेकिन माना जा रहा है कि गोरखपुर से चुनाव लड़ने और जीतने में उन्हें महारत हासिल है।
 
योगी आदित्यनाथ 1998 से लेकर 2017 तक लगातार पांच बार गोरखपुर से सांसद रह चुके हैं और सीएम बनने के बाद ही उन्होंने वो सीट खाली की। उसके तुरंत बाद उनके मुख्यमंत्री रहते ही 2018 के लोकसभा उपचुनाव में संजय निषाद ने इस सीट पर बीजेपी उम्मीदवार को हरा दिया।
 
संजय निषाद की पार्टी का अब बीजेपी से गठबंधन है। निषाद ख़ुद एक एमएलसी हैं। उनके बेटे प्रवीण निषाद भाजपा के टिकट पर 2019 में संत कबीर नगर से सांसद बने।
 
गोरखपुर मंडल की नौ में से आठ सीटें अभी बीजेपी के क़ब्ज़े में हैं। गोरखपुर की सिर्फ चिल्लूपार सीट से बसपा के विधायक विनय शंकर तिवारी विधायक हैं, लेकिन अब वो भी सपरिवार समाजवादी पार्टी में शामिल हो चुके हैं।
 
तिवारी परिवार का गोरखपुर और आसपास के इलाक़े की राजनीति पर काफ़ी असर रहा है। इसके मद्देनज़र सपा को गोरखपुर में काफ़ी मज़बूती मिलती दिख रही है।
 
योगी के गोरखपुर सदर से चुनाव लड़ने के क्या हैं मायने?
गोरखपुर बीजेपी का गढ़ है, वो किसी भी हालत में यहां सेंध लगने नहीं देना चाहती। गोरखपुर सीट की ख़ासियत और योगी के गोरखपुर शहर से चुनाव लड़ने की अहमियत वहां के वरिष्ठ पत्रकार रशाद लारी बताते हैं।
 
वे कहते हैं, "गोरखपुर एक मज़बूत क़िला है और इसे कोई गिरा नहीं पायेगा। इस बार योगी आदित्यनाथ ख़ुद यहां से लड़ने आ रहे हैं, लेकिन यहां से जिसके ऊपर भी वो हाथ रख देते हैं, वो जीत का परचम लहरा देता है। शायद बीजेपी ने इस बात को भी महसूस किया कि गोरखपुर की ग्रामीण विधानसभाओं में भी पार्टी के लिए नई चुनौतियां हैं। ऐसा माना जा रहा है कि गोरखपुर की नौ सीटों में से इस बार भाजपा तीन से चार सीट गंवा सकती है। तो डैमेज कंट्रोल के नज़रिए से भी हो सकता है कि योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर शहर से लड़ाने का फैसला किया गया हो।"
 
स्वाभाविक है कि यदि योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्री अगर किसी सीट से विधायकी का चुनाव लड़ते हैं तो बीजेपी को आसपास के ज़िलों की सीटों पर भी उसके सकारात्मक असर की उम्मीद तो होगी ही। और माना जा रहा है कि योगी का गोरखपुर शहर से प्रत्याशी होना गोरखपुर मंडल की 20 से अधिक सीटों पर भी प्रभाव डालने का काम करेगा।
 
लेकिन गोरखपुर से चुनाव लड़ने के एलान से पहले योगी आदित्यनाथ के मथुरा से चुनाव लड़ने की अटकलें लगाई जा रही थीं। पार्टी के राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने योगी का मथुरा से किसी सीट से चुनाव लड़ने का सपना देखा और उन्हें मथुरा से चुनाव लड़ाने की गुहार भरी चिट्ठी भी लिख दी। मीडिया में उनके अयोध्या से चुनाव लड़ने की अटकलें भी लगाई जा रही थीं।
 
मीडिया में योगी के अयोध्या और मथुरा से चुनाव लड़ने की सभावनाओं को प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र पहले ही नकार चुके थे। उनका मानना है कि पार्टी काशी, मथुरा और अयोध्या की बागडोर सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में रहने दे सकती हैं।
 
इसे समझाते हुए वे कहते हैं, "गोरखपुर में बीजेपी के ख़िलाफ़ एंटी इंकम्बेंसी है और उसे काउंटर करने के लिए योगी जी को वहां भेजा गया है। दूसरा कारण, यह है कि हिंदुत्व की राजनीति के केंद्र बिंदु सिर्फ़ नरेंद्र मोदी हैं और वहां उनके अलावा कोई नहीं रहेगा। तीसरा, गोरखपुर में इनके विरोध में जो हरिशंकर तिवारी का खेमा है, वो अब सपा में है। तो इस लिहाज़ से भी गोरखपुर में बीजेपी के लिए चुनौतियां बढ़ गयी हैं।"
 
गोरखपुर के जातीय समीकरण को समझाते हुए पत्रकार रशाद लारी बताते हैं, "गोरखपुर में ब्राह्मण वोट का प्रतिशत 9 है, ठाकुर वोट यहां 4 प्रतिशत, भूमिहार 8 प्रतिशत और कायस्थ 7 प्रतिशत है। वैश्य यहां 10 प्रतिशत हैं, जबकि यादव 8 प्रतिशत, निषाद 14 प्रतिशत, दलित 12 प्रतिशत और मुसलमान 11 प्रतिशत हैं। इस तरह सबसे ज़्यादा संख्या में निषाद हैं और उसके बाद दलित।"
 
14 प्रतिशत निषादों के बल पर अपनी राजनीति करने वाली निषाद पार्टी अब भाजपा के साथ है। हालांकि गोरखपुर में 12 प्रतिशत दलितों की अहमियत को ध्यान में रखते हुए और पार्टी का जातीय समीकरण बनाए रखने के मक़सद से सीएम योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को मकर संक्रांति के दिन पार्टी के दलित कार्यकर्ता अमृत लाल भारती के घर पहुंचकर खिचड़ी खाई।
 
एक दलित के घर खाना खाकर योगी आदित्यनाथ ने सामाजिक समरसता का संदेश देने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की छवि को स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ कई अन्य मंत्रियों और विधायकों के पिछले कुछ दिनों में पार्टी छोड़कर सपा में शामिल हो जाने वाले क़दम से नुक़सान पहुंचा है।
 
केशव प्रसाद मौर्य का सिराथू से सियासी सफ़र
केशव प्रसाद मौर्य एक बार फिर सिराथू से विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं। वो पहली बार 2012 में वहां से चुनकर बीजेपी विधायक बने थे और तब अखिलेश यादव ने राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।
 
2014 में केशव प्रसाद मौर्य का क़द तब और बढ़ा जब वो फूलपुर से लोकसभा सांसद चुने गए। बाद में 2017 के चुनावों में उन्होंने बतौर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पार्टी का नेतृत्व किया। वे उत्तर प्रदेश में पार्टी का सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा हैं और पार्टी में पिछड़ों की राजनीति का चेहरा भी हैं।
 
उनके निजी और राजनीतिक इतिहास के बारे में बात करते हुए प्रयागराज में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे मानवेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं, "वे एक साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिताजी की रेलवे स्टेशन के पास चाय की दुकान थी। उनके साथ-साथ केशव प्रसाद मौर्य भी सिराथू रेलवे स्टेशन पर रुकने वाली ट्रेनों में चाय बेचते थे। बाद में वो संघ और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ गए। वे 18 साल तक संघ और वीएचपी के प्रचारक रहे। उसके बाद उन्होंने लंबी राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ीं। 2012 में वे विधायक बने, 2014 में सांसद, फिर 2016 में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने और 2017 में राज्य के उप मुख्यमंत्री। उनका ग्राफ़ पार्टी में काफ़ी तेज़ी से बढ़ा है।"
 
केशव प्रसाद मौर्य पार्टी में पिछड़ों के सबसे बड़े चेहरे हैं, इसलिए पिछड़ों को पार्टी के साथ बनाये रखने के नज़रिये से चुनाव में उनकी उपयोगिता बहुत बड़ी है।
 
इस बारे में मानवेंद्र सिंह कहते हैं, "उन्होंने सिराथू में तब जीत दर्ज़ की जब 2012 में सपा की एक लहर-सी थी। उस नज़रिए से सिराथू उनके लिए एक सुरक्षित सीट है। और बीजेपी में ओबीसी नेताओं की अगर बात की जाए तो उनकी गिनती पार्टी के बड़े ओबीसी नेताओं में होती है।"
 
कौन लड़ेगा योगी के ख़िलाफ़ चुनाव?
बीजेपी ने गोरखपुर शहर के 2002 से लगातार विधायक रहे राधा मोहन दास अग्रवाल का टिकट काट कर मुख्यमंत्री के लिए सीट खाली करवाई है।
 
वरिष्ठ पत्रकार शीतला प्रसाद सिंह के मुताबिक़, "यह भाजपा के डर को दर्शा रहा है। मेरे हिसाब से ये डर है। यह ऐसी सीट है, जहाँ से राधा मोहन दास ख़ुद 4 बार विधायक रह चुके हैं। मुझे वहां के एक नेता ने कहा कि अगर राधा मोहन दास अग्रवाल जी का टिकट उन्होंने काटा, जिसके बारे में पहले ही शक़ था, और राधा मोहन जी अगर सपा से लड़ने को तैयार हो गए तो उस सीट पर भी बहुत कड़ा मुक़ाबला होगा। राधा मोहन दास अग्रवाल बहुत अपमानित किए गए हैं। उनकी वरिष्ठता को अहमियत नहीं दी गयी। गोरखपुर में स्थानीय प्रशासन की उनसे हमेशा विपक्षी दल जैसी स्थिति बनी रही है, क्योंकि वे तमाम मुद्दे उठाते रहे हैं।"
 
राधा मोहन दास अग्रवाल के गोरखपुर में राजनीतिक क़द को पत्रकार योगेश मिश्र भी बख़ूबी समझते हैं। उनके बारे में वे कहते हैं, "अगर राधा मोहन दास अग्रवाल ख़ुश नहीं होते, तो योगी जी को काफ़ी दिक़्क़त हो जाएगी। पार्टी को उन्हें ख़ुश रखना ही होगा।"
 
सपा अगर योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर में चुनौती नहीं देती तो उनपर मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ हमलावर तेवर दिखाने के बावजूद वॉकओवर देने का आरोप लगेगा।
 
इस बारे में योगेश मिश्र कहते हैं, "योगी जी को वहां हराने वाला अगर कोई होगा तो वो निषाद बिरादरी का प्रत्याशी ही होगा। बाक़ी कोई उन्हें वहां से हरा नहीं पाएगा।"
 
अखिलेश यादव: 'योगी की हुई घर वापसी'
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर से चुनाव लड़ने की घोषणा के तुरंत बाद अखिलेश यादव ने ट्वीट किया, "कभी कहा मथुरा, कभी कहा अयोध्या, और अब कह रहे हैं गोरखपुर। जनता से पहले इनकी पार्टी ने ही इनको वापस घर भेज दिया है। दरअसल इनको टिकट मिली नहीं है, इनकी वापसी की टिकट कट गयी है।"
 
तो क्या बीजेपी इस चुनाव के सबसे हाई प्रोफ़ाइल प्रत्याशियों को सुरक्षित सीटों से चुनावी मैदान में उतार रही है? इस सवाल के जवाब में पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने अपना पक्ष रखा।
 
वे कहते हैं, "यह सेफ़ सीट वाली बात नहीं है। वे पहले भी वहां से चुनाव लड़ते और जीतते रहे हैं। इसलिए वहां की जनता के साथ उनका निरंतर संवाद बना रहा है तो पार्टी का ये निर्णय बिल्कुल सही है। अयोध्या से और मथुरा से लड़ने की बात सिर्फ़ मीडिया की अटकलबाज़ी थी। मीडिया ही इन बातों की चर्चा चला रहा था। बाकी प्रदेश की 403 सीटों से कार्यकर्ता यही चाहते थी कि मुख्यमंत्री उनके यहां से चुनाव लड़ें, लेकिन पार्टी ने तय किया कि वे गोरखपुर शहर सीट से चुनाव लड़ें।"
 
2022 के चुनावों में प्रदेश की सभी विपक्षी पार्टियां 'करो या मरो' वाले माहौल में चुनाव लड़ रही हैं।
 
इन हालातों में अब ये देखना दिलचस्प होगा कि सपा, बसपा और कांग्रेस योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य को गोरखपुर सदर और सिराथू में कितनी बड़ी चुनौती दे पाती है।

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