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Last Updated : शुक्रवार, 19 जनवरी 2024 (18:28 IST)

Ram mandir Ayodhya: भारत के वो 10 संत जिन्‍होंने रखी थी राम मंदिर आंदोलन की नींव

Ram Mandir movement
Ram mandir temple: 22 जनवरी 2024 वो ऐतिहासिक दिन है, जब रामलला अयोध्‍या में बनाए गए मंदिर में विराजेंगे। इस दिन अयोध्‍या में भगवान श्रीराम के उस मंदिर का उद्धघाटन और श्रीराम की प्राण प्रतिष्‍ठा होगी, जिसके पीछे एक बेहद लंबा आंदोलन और एक लंबी कानूनी लड़ाई रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अयोध्या में होंगे तो भारत समेत दुनियाभर के मीडिया के कैमरे उन्‍हें फोकस कर रहे होंगे। लेकिन राम मंदिर आंदोलन के कई ऐसे संत किरदार हैं जो इस आंदोलन के पुरोधा रहे हैं। उनमें से कुछ अब श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्‍ठा की ये शुभ घड़ी देखने के लिए आज स्‍थूल काया में उपस्थित नहीं है, बहरहाल उनका सूक्ष्‍म शरीर कहीं से ये ऐतिहासिक दृश्‍य जरूर निहारेगा। जानते हैं अयोध्‍या राम मंदिर आंदोलन के उन संतों के बारे में जिन्‍होंने इस आंदोलन की नींव रखी थी।

रामचंद्र परमहंस दास
1949 से राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले रामचंद्र परमहंस दास राम मंदिर निर्माण के लिए आजीवन संघर्षरत रहे और अपने मुखारविंद से राम मंदिर आंदोलन के लिए संघर्ष करते रहे। यही वजह है कि आज अयोध्या ही नहीं पूरे देश के संत महंत रामचंद्र परमहंस दास को याद करते हैं। रामचंद्र परमहंस दास राम मंदिर न्यास के अध्यक्ष भी रहे। 1 अगस्त 2003 में उनका निधन हो गया। वे दिगंबर अखाड़ा के महंत और संत शिरोमणि थे।

महंत अवैद्यनाथ
महंत अवैद्यनाथ ने 22 साल की उम्र में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। नाथ संप्रदाय की परम्परा के महंत अवैद्यनाथ यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु थे। योगी ने गोरक्षपीठ का उत्तराधिकार अवैद्यनाथ से हासिल किया था। वे ब्रह्मलीन हो चुके हैं। उनके गोरक्ष पीठाधीश्वर रहते हुए ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण आंदोलन परवान चढ़ा। जुलाई 1984 में राम जन्मभूमि यज्ञ समिति के गठन के वक्त महंत अवैद्यनाथ को इसका अध्यक्ष चुना गया था। उनके ही नेतृत्व की वजह से हिंदुत्व को लेकर पूरी दुनिया भर में चर्चा हुई।

वह दिसंबर 1992 में हुई कारसेवा के नेतृत्वकर्ताओं में भी शामिल रहे। महंत दिग्विजयनाथ ने सितंबर 1969 में समाधि ले ली। उनके बाद गोरक्षपीठाधीश्वर बने अवैद्यनाथ ने शुरू से ही राम मंदिर आंदोलन की कमान संभाल ली। उन्होंने ऐलान कर दिया कि राम जन्‍मभूमि की मुक्ति तक वह चैन से नहीं बैठेंगे। यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ की भी राम मंदिर निर्माण में अहम भूमिका है। मंदिर निर्माण योगी जी के ही मार्गदर्शन में हुआ है। सीएम बनने से पहले से लेकर सीएम बन जाने तक योगी आदित्‍यनाथ के लिए मंदिर निर्माण प्रमुख कामों में से एक रहा है।

संत अभिराम दास
अभिराम दास वो संत थे जिन्‍होंने पहली बार अयोध्‍या में मस्जिद के अंदर मूर्ति रखी थी। बाबा अभिराम दास भी बिहार के दरभंगा जिले के एक गरीब मैथिल ब्राह्मण परिवार से आते हैं। बलिष्ठ और हठी स्वभाव वाले अभिराम दास की गिनती अयोध्या के लड़ाकू साधुओं में होती थी। अशिक्षित होने के कारण उन्होंने शारीरिक बल को अपना सशक्त माध्यम बनाया। अभिराम दास राम जन्मभूमि में रामलला की मूर्ति स्थपित करने का स्वप्न हमेशा देखते रहते थे। रामलला की मूर्ति स्थापित कराने के लिए वह एक बार फैजाबाद के तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह से भी मुलाकात की थी। साथ ही स्थानीय स्तर पर अफसरों और कर्मियों को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया।

देवरहा बाबा
देवरहा बाबा राम मंदिर निर्माण का सर्व सहमति से रास्ता निकालना चाहते थे। संतों की ओर से उन्होंने राजीव गांधी से कहा था कि राम मंदिर निर्विघ्न बनेगा। देवरहा बाबा ने 34 साल पहले ही राजीव गांधी से कहा था कि 'राम मंदिर' निर्विघ्न बनेगा। बाद में राम मंदिर के बारे में राजीव गांधी की सहमति पर बाबा इतने खुश हुए कि तत्कालीन प्रधानमंत्री के सिर पर पगड़ी पहनाई गई थी। इसे पहनने के बाद राजीव गांधी बेहद खुशी के साथ आश्रम से बाहर निकले थे। इस मुलाकात के बाद 10 नवंबर को राम मंदिर शिलान्यास की कवायद की गई। तब भगवान राम की मूर्ति से 192 फुट दूर शिलान्यास पर सहमति दी गई थी। देवरहा बाबा एक सिद्ध पुरुष व कर्मठ योगी थे। देवरहा बाबा ने कभी अपनी उम्र, तप, शक्ति व सिद्धि के बारे में कोई दावा नहीं किया। वे बिना पूछे ही सबकुछ जान लेते थे।

महंत नृत्य गोपाल दास
महंत नृत्य गोपाल दास श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। सुप्रीम कोर्ट से रामलला के पक्ष में फैसला आने के बाद राम मंदिर निर्माण के लिए गठित श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टियों ने उन्हें सर्वसम्मति से अध्यक्ष मनोनीत किया था। उन्होंने दशकों तक राम मंदिर आंदोलन के संरक्षक की भूमिका निभाई है। महंत नृत्यगोपाल दास का जन्म 11 जून 1938 को मथुरा के बरसाना इलाके के करहैला गांव में हुआ था। 12 साल की उम्र में वैराग्य धारण कर अयोध्या आ गए थे। अयोध्या के सबसे बड़े मंदिर मणिराम दास की छावनी के पीठाधीश्वर के रूप में उनकी ख्याति रही है। साल 1993 में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को संपन्न करने के लिए एक ट्रस्ट का गठन किया था। नृत्य गोपाल दास इस ट्रस्ट के भी प्रमुख रहे थे।

श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष रामानन्दाचार्य पूज्य स्वामी शिवरामाचार्य के साकेतवास हो जाने के बाद अप्रैल 1989 में महंत परमहंस रामचंद्र दास को कार्याध्यक्ष घोषित किया गया था। तब महंत नृत्य गोपाल दास श्रीराम जन्मभूमि न्यास के उपाध्यक्ष बने थे। साल 2003 में परमहंस के गोलोकवाली होने पर नृत्य गोपाल दास न्यास के अध्यक्ष बने। इसके बाद गोपाल दास की अगुवाई में ही राम मंदिर के लिए पत्थर तराशी में तेजी आई।

आचार्य धर्मेन्द्र
आचार्य धर्मेन्द्र वे 1984 के मंदिर आंदोलन से ही सक्रिय भूमिका में रहे। वीएचपी के अध्यक्ष और मंदिर आंदोलन के नायक रहे अशोक सिंघल के करीबी थे। वह उन पर पूरा भरोसा रखते थे। इसलिए सभी महत्वपूर्ण संगठनों में उनको रखा गया था। वीएचपी के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल के सदस्य के साथ ही वे राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति और मंदिर संघर्ष समिति आदि संगठनों के भी सदस्य थे।

वे कांग्रेस, नेहरू और इंदिरा गांधी के प्रबल विरोधी थे। हर सभा में कांग्रेस के खिलाफ जरूर जहर उगलते थे। यहां तक कि मोदी जब पीएम बने और राम मंदिर का विवाद बना तो वे उनकी भी आलोचना करने में नहीं चूके। आचार्य धर्मेन्द्र हर हाल में मंदिर निर्माण देखना चाहते थे। मंदिर आंदोलन के दौरान राम जानकी रथ यात्रा के दौरान उनके भाषण जगह जगह हुए और आंदोलन गर्म हो गया।

महंत दिग्विजय नाथ
1949 में जब पहली बार अयोध्या में श्री राम मंदिर और रामलला के अस्तित्व की बात सामने आई तो तब भी तत्कालीन गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत दिग्विजय नाथ और उनके कुछ साथियों द्वारा उक्त स्थान पर भजन कीर्तन आयोजित किया गया था, जिसके मुखिया स्वयं दिग्विजय रहे। वर्ष 1984 से लेकर 86 के बीच जब पहली बार कोर्ट के आदेश पर विवादित स्थल का ताला खोला गया था, तब भी तत्कालीन महंत रहे अवैद्यनाथ वहां मौजूद थे। उनके सामने ही विवादित परिसर का ताला खोला गया था, जिसके साक्षी वह भी थे।

बाबा सत्यनारायण मौर्य
राम मंदिर आंदोलन के दौरान बाबा सत्यनारायण मौर्य ने अहम भूमिका निभाई थी। उनके दिए नारे के साथ ही राम मंदिर का आंदोलन बिना शिथिल पड़े आगे बढ़ता रहा। बाबा सत्यनारायण एक चित्रकार के रूप में दीवारों पर भगवान राम की आकृति पर बनाते थे और मंच से अपने भाषणों से कारसेवकों में एक नई ऊर्जा का प्रवाह कर देते थे। बाबा सत्यनारायण मौर्य, अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन में दीवारों पर इनके द्वारा लिखे गए नारे और इनके द्वारा गाये जाने वाले गीत प्रचलित थे। इसके बाद से बाबा सत्यनारायण राष्ट्रीय कवि बन गए और पूरे देश में राष्ट्र प्रेम की अलख जगाने लगे।

साध्वी ऋतंभरा
एक ओजस्वी वक्ता के रूप में साध्वी ऋतंभरा राम मंदिर आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन गईं। इससे पहले साध्वी ऋतंभरा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की महिला संगठन राष्ट्रीय सेविका समिति से भी जुड़ी थीं। लेकिन वीएचपी के कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने हिंदू जागृति अभियान का कमान संभाल लिया।

उमा भारती
बाबरी विध्वंस 6 दिसंबर 1992 को हुआ था। उमा भारती ने इससे सिर्फ कुछ दिन पहले संन्यास की दीक्षा ली थी। एक ट्वीट में उन्होंने बताया था, “मैंने 17 नवंबर 1992 को अमरकंटक में ही संन्यास दीक्षा ली थी। मेरे गुरु कर्नाटक के कृष्ण भक्ति संप्रदाय के उडुपी कृष्ण मठ के पेजावर मठ के मठाधीश थे। राजमाता विजयराजे सिंधिया के अनुरोध पर तब अविभाजित मध्यप्रदेश के अमरकंटक आकर उन्होंने संन्यास की दीक्षा प्रदान की। मेरा संन्यासी दीक्षा समारोह 3 दिन चला।

उमा भारती 16 साल की उम्र में भारत भ्रमण पर निकल गई थीं। इसके बाद उन्होंने अपने विचारों को व्यापक आकार देने के प्रयास में 55 देशों की यात्रा की। बचपन से ही उनका अध्यात्म के प्रति झुकाव था। कम उम्र में उन्होंने गीता और रामायण सहित धार्मिक महाकाव्यों में निपुणता हासिल की, जिससे उन्हें राम मंदिर आंदोलन के दौरान मदद मिली।
Written and Edited By : Navin Rangiyal