मेरे भईया को कोई दे दो संदेश...

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यह पहली बार है, जब कल्पना राखी के मौके पर अपने मायके नहीं जा पाएँगी। राखी के दिन ही अपने गृह-पूजन की व्यस्तता की वजह से इस बार वह अपने भाई को अपने हाथों से राखी नहीं बाँध पाएँगी। उदासी की एक गहरी लकीर कल्पना के चेहरे पर देखी जा सकती है। घर की जिम्मेदारियों के आगे उन्हें अपने इस अरमान को दरकिनार करना पड़ रहा है। भले ही डाक से अपनी मनपसंद राखी भेज दी हो, लेकिन नेह के उस धागे को खुद अपने हाथों से न बाँध पाने का उन्‍हें गहरा दु:ख है।
(30 वर्षीय गृहिणी कल्‍पना श्रीखंडे)

नमी है आँखों में

छोटी-सी बेटी है मेरी, लेकिन जब राखी पर अपने भाई को राखी नहीं बाँध पाती तो अपनी बच्ची से भी छोटी बच्ची हो जाती हूँ और खू
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आँसू बहाती हूँ। इस बार भी मैं अपने मायके नहीं जा पाऊँगी। हर रक्षाबंधन पर मन में बड़े दार्शनिक ख्याल आते हैं। काश ! इन सारे बंधनों से मुक्त हो जाऊँ और उड़कर पहुँच जाऊँ अपने प्यारे भाई के पास। लेकिन कल्पनाओं का कोई अस्तित्व नहीं होता। मैं दुबारा उसी दुनिया में लौट आती हूँ, हताश और निराश। राखी का यह पर्व भी यूँ ही सूना बीतने वाला है।
(32 वर्षीय गृहिणी और शिक्षिका दीपिका)

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पहली बार हुआ है ऐसा
प्रस्‍तुति : नीहारिका झा



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