तुम सर्वस्व हो !

ND

माँ,
तुम्हारी स्मृति,
प्रसंगवश नहीं
अस्तित्व है मेरा।
धरा से आकाश तक
शून्य से विस्तार तक।

कर्मठता का अक्षय दीप
मंत्रोच्चार सा स्वर
अनवरत प्रार्थनारत मन
जीवन यज्ञ में
स्वत: समिधा बन
पुण्य सब पर वार।

अवर्णनीय, अवर्चनीय
तुम सर्वस्व हो
- शैल
सृष्टि हो मेरी !



और भी पढ़ें :